स्त्री को मनुष्य के रूप में देखा जाना चाहिए, जैसे पुरुष को देखा जाता है : अष्टभुजा शुक्ल

अलवर, राजस्थान। सोमवार, 27 जुलाई 2020 को नोबल्स स्नातकोत्तर महाविद्यालय, रामगढ़, अलवर (राज ऋषि भर्तृहरि मत्स्य विश्वविद्यालय, अलवर से संबद्ध) एवं भर्तृहरि टाइम्स पाक्षिक समाचार पत्र, अलवर के संयुक्त तत्वावधान में एक दिवसीय राष्ट्रीय स्वरचित काव्यपाठ/ मूल्यांकन ई-संगोष्ठी- 4 का आयोजन किया गया; जिसका विषय ‘समकालीन यथार्थ’ था। इस ई-संगोष्ठी में 23 राज्यों एवं 3 केंद्र शासित प्रदेशों से संभागी जुड़े, जिनमें 22 कवि-कवयित्रियों ने अपना काव्य-पाठ प्रस्तुत किया।

इस ई-संगोष्ठी में मूल्यांकनकर्ता वरिष्ठ कवि एवं साहित्य मर्मज्ञ अष्टभुजा शुक्ल (बस्ती, उत्तर प्रदेश) थे। कार्यक्रम की शुरुआत में डॉ. सर्वेश जैन, प्राचार्य, नोबल्स स्नातकोत्तर महाविद्यालय, रामगढ़, अलवर ने अतिथि का स्वागत करते हुए कहा कि अष्टभुजा शुक्ल हमारे समय के ऐसे महत्वपूर्ण कवि हैं जो व्यवहार और कविताओं में एक समान दिखते हैं। उनका परिचय देते हुए उन्होंने बताया कि शुक्ल जी के पांच कविता संग्रह राजकमल प्रकाशन, दिल्ली से आए हैं एवं दो ललित निबंध संग्रह भारतीय ज्ञानपीठ, दिल्ली से प्रकाशित हुए हैं। डॉ. जैन ने सभी कवि-कवयित्रियों और श्रोताओं का भी स्वागत किया।

काव्य पाठ के उपरांत कवि अष्टभुजा शुक्ल ने प्रत्येक कविता पर अलग अलग टिपण्णी की तथा बाद में समवेत समीक्षा प्रस्तुत की। अपने विस्तृत व्यक्तव्य में उन्होंने कहा कि यह मेरे लिए खुशी की बात है कि सुदूरवर्ती प्रदेशों से लेकर लगभग समूचे भारत से कवियों ने सहभागिता की है। इससे यह बात प्रमाणित होती है कि अन्य भारतीय भाषाओं के साथ-साथ हिंदी पूरे देश में चल रही है। बल्कि, चल ही नहीं रही है; उसमें कवियों की संवेदना व्यक्त हो रही है, उनकी धड़कनें सुनाई दे रही हैं।

संगोष्ठी के एक संभागी कवि की स्त्री-सम्बन्धी कविता पर प्रतिक्रिया करते हुए अपने विद्वत्तापूर्ण व्यतव्य में आगे उन्होंने कहा कि कि स्त्री को मनुष्य के रूप में देखा जाना चाहिए; जिस तरह पुरुष को देखा जाता है। उन्होंने कहा कि वह अपनी कमान अपने हाथों में चाहती है। वह मनु भी होना चाहती है; श्रद्धा तो वह है ही। आगे उन्होंने कहा कि मां का जो अंश बेटा है, वह भी मां को टोकता है कि कहां जा रही हो? तो, वह पुरुष की जमात में शामिल हो गया है! जिस तरह से अभी तक ‘मनुस्मृति’ में स्त्री की रखवाली कौमार्य अवस्था में पिता करता है, पति यौवन काल में रखवाली करता है, बुढ़ापे में पुत्र उसकी रक्षा करता है; यानी स्त्री को स्वाधीन नहीं होना चाहिए! उन्होंने प्रश्न किया कि ये लोग रक्षा किससे करते हैं? पिता भी पुरुष है, पति भी पुरुष है, पुत्र भी पुरुष है! ये तीनों ही स्त्री की रक्षा आखिर किससे करते हैं? मेरा सवाल यही है। और कविता का भी यही सवाल है।

लगभग 3 घंटे तक चली इस ई-संगोष्ठी में काव्य-पाठ करने वालों में सर्वश्री अंजनी शर्मा (गुरुग्राम, हरियाणा) ने ‘हाय! इंसान तू पाषाण हो गया’, जे. डी. राणा (अलवर, राजस्थान) ने ‘इंस्पेक्टर विष्णु दत्त विश्नोई’, अंचल कुमारी राय (नगांव, असम) ने ‘प्रकृति का आक्रोश’, के. इंद्राणी (तमिल नाडु) ने ‘यह भी गुजर जाएगा’, संजय (पंचकूला, हरियाणा) ने ‘अक्ल’, अनीता वर्मा (कच्छ, गुजरात) ने ‘दिखावा’, तूलिका (भुवनेश्वर, ओडिशा) ने ‘पुरानी चादर’, आचार्य सुरेश शर्मा भारद्वाज (सिरमौर, हिमाचल प्रदेश) ने ‘आज’, रेणु अग्रवाल (रायसेन, मध्य प्रदेश) ने ‘जब बात देश में युद्ध की हो’, प्रदीप कुमार माथुर (अलवर, राजस्थान) ने ‘डोल न बाहर घर में रह’ एवं ‘अदृश्य है शत्रु’, डॉ. अनीता सिंह (वाराणसी, उत्तर प्रदेश) ने ‘निर्लज्ज कौन’, डॉ. बिभा कुमारी (मधुबनी, बिहार) ने ‘मां का अंश’, मोहनदास (सोनितपुर, असम) ने ‘हमारी समस्याएं भी देखिए’, डॉ. अनुपम सक्सैना (आगरा, उत्तर प्रदेश) ने ‘वसुधैव कुटुंबकम्’, डॉ. इंद्रजीत कौर (दमोह, मध्य प्रदेश) ने ‘कोविड-19’, विकास कुमार (मुजफ्फरपुर, बिहार) ने ‘टंगी रह जाएगी’, ‘मेरे कटने के बाद’ एवं ‘पुलिस’, डॉ. श्रीकांता अवस्थी (जबलपुर, मध्य प्रदेश) ने ‘मानवता के सूत्रधार’, नवनीता चौरसिया (रतलाम, मध्य प्रदेश) ने ‘हम लिखेंगे गीत नया’, अमित कुमार मिश्रा (मधेपुरा, बिहार) ने ‘समाज और समाजवाद’, सरिता पांडे (कटनी, मध्य प्रदेश) ने ‘मानवता सोती है’, संजय कुमार (लालगंज, आजमगढ़, उत्तर प्रदेश) ने ‘प्रिय संदेशा’ तथा के. कविता (पुडुचेरी) ने ‘मनु हो तुम, श्रद्धा भी तुम’ कविता पढ़ी।

इस ई-संगोष्ठी का संचालन करते हुए कादम्बरी, संपादक, भर्तृहरि टाइम्स, पाक्षिक समाचार पत्र, अलवर ने कहा श्रेष्ठ कवि वही है जो समय के साथ चले। उन्होंने कहा कि अन्य कवियों को भी लगातार पढ़ते रहना चाहिए। धन्यवाद ज्ञापन डॉ. मंजू, सहायक प्राध्यापक, नोबल्स स्नातकोत्तर महाविद्यालय, रामगढ़, अलवर ने किया।

रिपोर्टिंग- कादम्बरी

संपादक, भर्तृहरि टाइम्स, पाक्षिक समाचार-पत्र, अलवर

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One comment on “स्त्री को मनुष्य के रूप में देखा जाना चाहिए, जैसे पुरुष को देखा जाता है : अष्टभुजा शुक्ल”

  • मुझे आज तक समझ नहीं मीडिया एक झूठ क्यों फैलाता है की पुरुष से नहीं पूछा जाता कहाँ जा रहे हो?? किस घर में नहीं पूछा जाता ?? मेरी उम्र 33 वर्ष है आज तक मेरी माँ घर से निकलते ही पूछती हैं कि कहां जा रहा है??कब तक आएगा?? अगर यकीन ना हो तो स्वागत है आपका मेरे घर आएं और मेरी माँ से पूछे कि आज तक मैं कभी घर से बिना बताए कहीं गया हूँ ?? क्यों मीडिया केवल पुरुष को बदनाम करने में लगा रहता है?? दूसरा सवाल जो आपने नहीं कहा लेकिन अक्सर पुरुषों को बदनाम कर कहा जाता है पुरूष जो मर्जी पहने उन्हें कोई कुछ नहीं कहता अरे भाई क्यों नहीं कहा जाता मैंने खुद एक शेरवानी में दूल्हे की ड्रेस ट्रॉय कर उसकी फेसबुक में फ़ोटो लगा दी,हालांकि पीछे दुकान दिख रही था,साफ था कि किसी दुकान पर खड़ा हूँ लेकिन रिश्तेदारों ने बाते बना दी,हारकर सब रिश्तेदारों को ही ब्लॉक कर दिया, इसका एक उदाहरण आफिस भी है,मीडिया में तो कोई कुछ भी पहन कर आ जाता है ,लेकिन कॉरपोरेट में क्या लड़का जीन्स पहन सकता है,ज्यादातर ऑफिस में लड़कों को फॉर्मल पैंट कमीज पहनने का नियम है जिसके बार बार तोड़ने पर कड़ी कार्रवाई भी होती है,लेकिन लड़की उसी आफिस में शॉर्ट्स से लेकर सब पहनती हैं फिर लड़कों को ही क्यों बदनाम किया जाता है?? यदि लड़का शर्ट के बटन या पेंट की चेन खोलकर बाजू चढ़ाकर आये तो आप जैसे सभ्य लोग उसे छिछोरा कहते हैं, घर में उसके पिता उसकी अच्छे से इज्जत उतारते हैं कि ये ही करना ज़िन्दगी में,लेकिन फिर भी कह दिया जाता है कि लड़का कुछ भी पहने कोई नहीं कुछ कहता। कहाँ नहीं कहता??
    अरे भाई क्यों बदनाम करते हो लड़के को,लड़का भी किसी का बाप,भाई,बेटा है लिंग,धर्म,जात से ना नफरत करो सोच गलत होती है लिंग नहीं। आनेवाले वक़्त में कहीं पुरुष शोषित वर्ग में न आ जाये। हमेशा पुरुष को फेमिनिज्म के नाम पर टारगेट करना छोड़े । जिस तरह स्त्री के बिना ज़िन्दगी अधूरी है उसी तरह पुरुष की भी इज्जत करना सीखें।

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