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सुख-दुख

कोरोना पीड़ित आगरा के वरिष्ठ पत्रकार डॉ भानु प्रताप सिंह की आपबीती पढ़िए

डॉ. भानु प्रताप सिंह-

वैक्सीन लगवाने के बाद निमोनिया और मुश्किल ही मुश्किल

आगरा। मैंने और मेरी पत्नी इन्दु सिंह ने एक अप्रैल, 2021 को प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र सुनारी पर कोरोना वैक्सीन कोविशील्ड लगवाई। दूसरे दिन से शरीर में हरारत शुरू हो गई। फिर बुखार आ गया। हल्की खांसी शुरू हो गई। इसका मतलब है कि वैक्सीन असर कर रही थी। वैसे मैं कोरोना के प्रति शुरू से ही सावधान हूँ। कार्यालय में भी मुखावरण (मास्क) लगाकर रखता हूँ। इस दौरान शिव पैलेस, पश्चिमपुरी में हो रही भागवत कथा में भी जाना हुआ। अंतिम विश्राम स्थल श्मशान घाट भी गया। पत्नी को हल्का सा बुखार लगा। वे स्वयं को स्वस्थ बता रही थीं।

एक दिन अचानक ही खांसी ने हिलाकर रख दिया। फिर चिन्ता हो गई। कार्यालय जाना बंद कर दिया। 12 अप्रैल को डॉ. पार्थसारथी शर्मा के पास गया। उन्होंने दवा दी और कोविड-19 परीक्षण के लिए लिख दिया। मैंने अपना दिमाग चलाया और कोविड-19 परीक्षण नहीं कराया। उसी दिन छह-सात बार शौच जाना पड़ा लेकिन अतिसार नहीं था। शरीर स्वयं को कमजोर महसूस करने लगा। मस्तिष्क ने संकेत दिया कि कहीं कोविड-19 का प्रकोप तो नहीं है?

13 अप्रैल, 2021 को मैंने डॉ. सुनील बंसल से बात की। उन्होंने वॉट्सएप पर दवा लिखकर भेजी और दो तरह के एक्स-रे की सलाह दी। एक्स-रे से कुछ पता नहीं चला तो सीटी स्कैन की सलाह देते हुए कहा- इससे पता चल जाएगा कि कोविड है या नहीं।

मैंने सीटी स्कैन के बारे में जानकारी की तो पता चला कि 4500-5000 रुपये खर्च होंगे। मेरे लिए यह नई आफत थी। इत्तिफाक से आगरा विकास मंच के अध्यक्ष राजकुमार जैन का फोन आ गया। मैंने उन्हें खर्चा की समस्या बताई। कुछ देर बात उनका फोन आया कि एक्सेस इमेजिंग सेंटर, खंदारी पर चले जाओ, 2500 रुपये में सीटी हो जाएगा। मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई। सीटी हो गया परन्तु समस्या यह थी कि रिपोर्ट अगले दिन शाम छह बजे मिलनी थी।

डॉ. सुनील बंसल को मैंने पूरी जानकारी दी। वे बोले कि इमरजेंसी में तत्काल रिपोर्ट मिल जाती है। मैंने राजकुमार जैन से बात की। उनके प्रयासों से यह पता चला कि सीटी का स्कोर 25×8 है। मतलब लघुस्तर पर फेंफड़ों में संक्रमण है। अगले दिन वॉट्सएप पर रिपोर्ट आ गई। स्कोर 10 था। डॉ. सुनील बंसल को रिपोर्ट भेजी। न्यूमोनिया से ग्रसित पाया गया। उन्होंने कहा कि एसएन मेडिकल कॉलेज में तत्काल भर्ती हो जाओ। सीटी की रिपोर्ट पर भर्ती हो जाओगे। मेरे मन में कोरोना का भय हावी हो गया।

एसएन मेडिकल कॉलेज की इमरजेंसी में ऐसी प्रताड़ना कि मन रो उठा

14 अप्रैल, 2021 को रोजगार कार्यालय में कोविड परीक्षण कराया। इसमें पत्रकार करनवेन्द्र मल्होत्रा ने काफी मदद की। वे लगातार साथ में बने रहे। खांसी और बुखार की समस्या उत्तरोत्तर बढ़ती जा रही थी। मैं चाहता था कि जल्दी से जल्दी अस्पताल में भर्ती हो जाऊँ। मैंने मुख्य चिकित्सा अधिकारी को फोन किया। फोन नहीं लगा। फिर मुझे कोविड प्रभारी डॉ. अंशुल पारीक का फोन मिला। उन्होंने फोन नहीं उठाया। मैंने सीएमओ कार्यालय में डॉ. अभिषेक यादव को फोन किया। उन्होंने सांत्वना दी और आश्वासन दिया। हुआ कुछ नहीं।

चिन्ता बढ़ गई कि भर्ती कैसे हुआ जाए। आगरा विकास मंच के अध्यक्ष राजकुमार जैन ने पत्रकार धर्मेन्द्र त्यागी (जो स्वयं कोरोना संक्रमित हैं और एसएन मेडिकल कॉलेज में भर्ती हैं) से बात करके कहा- आप इमरजेंसी में भर्ती हो जाओ, वहां से कोविड हॉस्पिटल में शिफ्ट हो जाओगे। मेरी पत्नी की चिन्ता बढ़ गई। वे घर के मंदिर में ले गई। माथे पर टीका लगाया और प्रार्थना की- हे बंशी वाले, हमारी जोड़ी बनाए रखना।

मैं अपने पुत्र रजत प्रताप सिंह के साथ जरूरत का सारा समान लेकर एसएन मेडिकल कॉलेज की इमरजेंसी में पहुंचा। घुसते ही देखा कि लाश के साथ कुछ लोग रो रहे थे। मुझे लगा कि शुरुआत ही मौत से हो रही है, आगे न जाने क्या होगा। इमरजेंसी में फार्मासिस्ट राजीव उपाध्याय के सहयोग से तत्काल पर्चा बन गया। भर्ती के कागज बन गए। मुझसे कहा गया कि आइसोलेशन वार्ड में ऊपर जाओ। मैं सीढ़ियां चढ़ता हुआ ऊपर पहुंचा।

आइसोलेशन वार्ड में कुछ भी आइसोलेशन नहीं था। हाहाकार मचा हुआ था। मरीज कराह रहे थे। तीमारदार हो रहे थे। मैंने पर्चा दिया। पर्चा देखकर डॉक्टरनी बोली- ये तुम कहां से बनवा लाए।

मैंने कहा- मुझे बहुत समस्या हो रही है। यहां तक आते-आते मेरी सांस फूल गई है। भर्ती कर लें।
डॉक्टरनी- यहां कोई भर्ती नहीं होगा।
फिर एक डॉक्टर आया। उन्होंने मेरा ऑक्सीजन स्तर चेक किया। बोला- ऑक्सीजन ठीक है। घर जाओ। आराम करो।
मैंनै फिर कहा- मुझसे चला नहीं जा रहा है, लगातार खांसी आ रही है और आप कह रहे हैं घर जाओ।
डॉक्टर- हमारे पास बेड नहीं है। हर कोई भर्ती होना चाहता है। तुम क्या पॉजिटिव हो?
मैंने कहा- हां।

फिर तो डॉक्टरनुमा तीन-चार लोग हावी हो गए। कहने लगे- दूर हटकर बात कर।

सबके सब अभद्रता पर उतर आए। ऐसा लगा कि मारपीट हो जाएगी। मेरा पुत्र रजत भी गुस्से में आ गया। उसने एक डॉक्टर को फटकारा कि आपको बात करने की तमीज नहीं है।
मैंने कहा- यहीं बैठ जाऊँगा।
डॉक्टर बोला- बैठ जा।

मैं वार्ड से बाहर आ गया। बरामदे में बैठ गया क्योंकि खड़ा नहीं हुआ जा रहा था। मैंने वहीं से पत्रकार विनीत दुबे को फोन किया। इत्तिफाक से वे जिला चिकित्सालय के प्रमुख चिकित्सा अधीक्षक डॉ. सतीश वर्मा के पास बैठे थे। उनसे बात कराई। उन्होंने कहा कि जब तक सीएमओ लिखकर नहीं देंगे, हम भर्ती नहीं कर सकते। उनसे लिखवा लाओ।

उधर, धर्मेन्द्र त्यागी ने प्राचार्य डॉ. संजय काला से बात की। मेरे पर उनका फोन आया। उन्हें समस्या बताई। उन्होंने डॉ. पीयूष से बात करने के लिए कहा। मैं फिर से आइसोलेशन वार्ड में गया। वहां फिर से वही डॉक्टरनी मिल गई।

मैंने पूछा- डॉ. पीयूष जी कौन हैं?
डॉक्टरनी- मुझे क्या पता, ढूँढ लो।
मैंने कहा- आपको बताने में समस्या हो रही है?
डॉक्टरनी- हां। चलो यहां से।

फिर एक डॉक्टर आ गया। वह मुझे भर्ती करने की गाइडलाइन बताने लगा। बोला- तुम पढ़े-लिखे नजर आ रहो हो, इसलिए बता रहा हूँ। फिर मुझे लगा कि डॉक्टर और मरीज के बीच बातचीत की गाइड लाइन भी जारी होनी चाहिए।

मैं फिर नीचे आ गया। सीढ़ियों पर बैठ गया। डॉ. संजय काला का फिर फोन आया। मैंने उन्हें पूरी बात बताई। वे बोले कि अभी फोन करता हूँ। उन्होंने एक और डॉक्टर का नाम बताया। मैं फिर आइसोलेशन वार्ड में गया। उस डॉक्टर के बारे में भी वहां बताने वाला कोई नहीं था। मैं सीढ़ियों पर बैठा हुआ था। असहाय। सांस फूल रही थी। खांसी आ रही थी। किसी भी डॉक्टर ने पर्चे पर दवा तक नहीं लिखी। तभी एक महिला डॉक्टर आई और कहा कि कोविड वार्ड में जाकर भर्ती हो जाओ और चलती बनी।

धर्मेन्द्र त्यागी लगातार दबाव बनाए हुए थे। उन्हें अवगत कराया गया था कि भानु प्रताप सिंह को भर्ती कर लिया गया है, लेकिन यह सफेद झूठ था। डॉ.संजय काला से फिर बात हुई। वे बोले- कल सुबह साढ़े नौ बजे इमरजेंसी में आ जाना। मैंने जिला अस्पताल में डॉ. सतीश वर्मा से बात की। फिर वही जवाब मिला। अब आप बताइए, समस्या अभी है और अगले दिन बुलाया जा रहा है।

मैंने अपने पत्रकारीय जीवन में इमरजेंसी में अनेक मरीजों का इलाज कराया है। इमरजेंसी में मेरे साथ क्या हुआ, यह आपके समक्ष यथावत है। इसमें तनिक भी नमक-मिर्च नहीं लगाया गया है।

हां, इस दौरान एक और वाकया देखने को मिला। एक युवक रोता हुआ एक फार्मासिस्ट के पास आया और कहने लगा- मेरी मां मर जाएगी। ऑक्सीजन खत्म हो गई है। यह सुनकर फार्मासिस्ट आपे से बाहर हो गया और गालियां देने लगा। यह सुनकर दो गार्ड टोपी संभालते हुए आए और उसी युवक को गालियां देने लगे। उसके आँसू कोई देखने वाला नहीं था। मुझे ऐसा लगा कि अभी पिटाई होने वाली है। युवक रोता हुआ ऊपर चला गया।

यह सब देखकर मेरा मन रो उठा। यह कैसा सरकारी अस्पताल है, यहां कैसे डॉक्टर हैं जिनमें मानवीयता, संवेदनशीलता छटांक भर भी नहीं है। पुरुष तो पुरुष महिला डॉक्टर्स का भी अमानवीयतापूर्ण व्यवहार। इस तरह से व्यवहार तो फ्री सेवा करने वाले भी नहीं करते। जिस इमरजेंसी पर सरकार इतना खर्चा कर रही है, वहां हो क्या रहा है। बड़े अधिकारी एक राउंड लगाते होंगे तो उन्हें सब ठीक मिलता होगा। किसी दिन रोगी बनकर आवें तो दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा। सवाल ये है कि यह सब करे कौन?

हमारे जनप्रतिनिधि तो कभी इमरजेंसी में भर्ती होने जाते नहीं हैं। मीडिया का भी ध्यान नहीं है। एक आम आदमी के रूप में वास्ता पड़ा तो इस बात का अहसास हुआ कि कि इमरजेंसी वास्तव में मरीजों और तीमारदारों का प्रताड़नाघर है। आज लगता है अच्छा हुआ भर्ती नहीं हुआ, क्या पता जीवित वापस आता या नहीं। शायद पत्नी का टीका काम कर गया।

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