उत्तर प्रदेश, पंजाब और उत्तराखंड विधानसभा चुनाव में प्रत्याशी उतार सकता है किसान संयुक्त मोर्चा!

CHARAN SINGH RAJPUT-

राजनीतिक दलों के लिए खतरे की घंटी है किसानों का ऐलनाबाद उप चुनाव लडऩा

नई दिल्ली। कहने को तो हमारा देश कृषि प्रधान देश है पर सबसे अधिक दुर्गति भी किसानों की ही हो रही है। यदि चौधरी चरण सिंह को छोड़ दिया जाए तो लगभग हर नेता और हर पार्टी ने सत्ता में आकर किसानों को ठगा ही है। विपक्ष में भी रहकर राजनीतिक दलों का ध्यान किसानों की समस्याओं को उठाने, उनके लिए लडऩे के बजाय किसानों को वोटबैंक में तब्दील करने में ज्यादा रहता है। यही वजह है कि मोदी सरकार द्वारा बनाये गये नये तीन कृषि कानूनों के खिलाफ चल रहे किसान आंदोलन में किसान मोदी सरकार के साथ ही विपक्ष पर भी हमलावर हैं। इस आंदोलन में कई बार किसानों द्वारा अपनी पार्टी बनाने की बात सामने आ चुकी है।

हरियाणा के किसान नेता गुरनाम सिंह चढ़ूनी तो खुलेआम किसानों को चुनाव में उतारने की बात कर रहे हैं। हालांकि किसान आंदोलन की पहचान बन चुके राकेश टिकैत किसानों की पार्टी बनाने से साफ इनकार कर रहे हैं पर कई बार उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा सामने आ चुकी है। हालांकि किसान विभिन्न राज्यों के नाम लेकर मिशन की बात कर रहे हैं। यूपी मिशन की बात प्रमुखता से ली जा रही है। किसान पार्टी बनाएंगे या नहीं यह तो समय ही बताएगा पर किसानों ने चुनाव लडऩे का मन बना लिया है।

हरियाणा में किसान आंदोलन के पक्ष में इनेलो नेता अभय चौटाला के इस्तीफे के बाद खाली हुई ऐलनाबाद विधानसभा सीट पर हो रहे उप चुनाव में किसानों ने बाकायदा अपना प्रत्याशी उतार दिया है।
ऐलनाबाद उप चुनाव में मोर्चे की तरफ से किसान नेता विकल पचार चुनावी समर में उतार दिया गया है। हरियाणा संयुक्त किसान मोर्चा के किसान नेता जगबीर घसौला, संयोजक प्रदीप धनखड़ ने बाकायदा पत्रकार वार्ता प्रत्याशी घोषित किया है। हालांकि इन किसान नेताओं ने यह भी कहा है कि अगर मोर्चा गुरनाम सिंह चढूनी या किसी बड़े किसान नेता को मैदान में उतारेगा तो वे विकल पचार का नाम वापस ले लेंगे।

किसान नेताओं का कहना है कि ये किसान धर्म युद्ध है। उन्होंने कहा कि अभय सिंह ने किसानों के पक्ष में अपना इस्तीफा देते हुए कहा था कि कृषि कानून लागू होने पर जनप्रतिनिधि बने रहने का अधिकार नहीं है। अब उन्हें चुनाव न लड़कर किसानों को समर्थन देना चाहिए। उन्होंने कहा कि किसान मोर्चा में कोई भी किसान नेता ऐसा नहीं है जिसका किसी राजनीतिक पार्टी से संबंध हो। किसान नेताओं ने यह भी कहा कि किसान आंदोलन में भाजपा जजपा नेताओं का बहिष्कार जारी रहेगा।

विकल पचार वर्ष 2019 में भी ऐलनाबाद विधानसभा सीट से प्रत्याशी के तौर पर चुनाव लड़ चुके हैं। विकल पचार अखिल भारतीय स्वामीनाथन संघर्ष समिति के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं। पचार ने फसलों के मुआवजे को लेकर अनेक आंदोलन किए हैं और किसान नेता के रूप में उनकी अपनी पहचान है।

अगले साल होने जा रहे उत्तर प्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड विधानसभा चुनाव में किसान आंदोलन का बड़ा असर पडऩे वाला है। यदि किसानों ने इन तीन राज्यों में अपने प्रत्याशी उतार दिये तो न केवल सत्तापक्ष बल्कि विपक्ष के लिए राजनीतिक खतरा पैदा हो सकता है। जगजाहिर है कि इस आंदोलन के बाद किसान एकजुट हुआ है। किसानों में अपने हक के लिए एक जागरूकता आई है। किसान को अपने वोट की अहमियत पता चली है। किसान अब न केवल सत्तापक्ष बल्कि विपक्ष के लिए भी महत्वपूर्ण हो गया है। सत्ता पक्ष को जहां किसानों की नाराजगी का डर सता रहा है वहीं ऐलनाबाद उप चुनाव में किसान प्रत्याशी के उतरने से अब विपक्ष को भी किसानों का डर सताने लगा है।

अब तक विपक्ष यह मानकर चल रहा था कि चुनाव में किसानों की भाजपा से नाराजगी का फायदा उन्हें मिलेगा। किसानों के अपने प्रत्याशी उतारने की रणनीति बनने पर किसान जितना नुकसान सत्ता पक्ष को पहुंचाएंगे, उससे कम नुकसान विपक्ष को नहीं होगा। यदि किसानों ने अपने प्रत्याशी उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में उतार दिये तो भाजपा की हालत तो खराब होगी ही साथ ही सपा और रालोद को भी बड़ा झटका लगेगा। विधानसभा चुनाव में होने जा रहा सपा और रालोद का गठबंधन तो किसानों को अपना वोटबैंक मानकर चल रहा है। वैसे भी भले ही राकेश टिकैट पार्टी बनाने से इनकार करते रहे हैं पर कई बार उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा सामने आ चुकी है। वह रालोद के टिकट पर अमरोहा से लोकसभा चुनाव भी लड़ चुके हैं। एक अनौपचारिक बातचीत में वह पश्चिमी उत्तर प्रदेश को अलग राज्य बनाने का लेकर वह अमरोहा को राजधानी बनाने का अपना पक्ष रख चुके हैं।

उत्तर प्रदेश में जिस तरह से हालात उभरे हैं उसको देखते हुए उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में किसान संयुक्त मोर्चा के अपने प्रत्याशी उतारने की पूरी संभावना है। सबसे अधिक चिंता तो पंजाब में कांग्रेस और आम आदमी पार्टी को सता रही होगी, क्योंकि किसान आंदोलन का सबसे अधिक असर पंजाब में पडऩे वाला है और वहां पर किसानों का वोट कांग्रेस और आम आदमी पार्टी को मिलने की उम्मीद जताई जा रही थी। यही वजह है कि गुरनाम सिंह चढ़ूनी पंजाब में किसान प्रत्याशी उतारने की लगातार पैरवी कर रहे हैं।

लखीमपुर कांड में सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद जगी न्याय की उम्मीद

उच्चतम न्यायालय के लखीमपुर खीरी कांड में गिरफ्तारी पर सवाल पूछने पर बढ़ी योगी सरकार की मुश्किलें

भले ही सुप्रीम कोर्ट ने नई दिल्ली जंतर मंतर पर बैठने की अनुमति की याचिका पर किसानों को फटकार लगाई हो पर जिस तरह से लखीमपुर खीरी कांड में उसने स्वत: संज्ञान लेते हुए योगी सरकार को फटकार लगाई है उससे अब लखीमपुर खीरी मामले में मरे 8 लोगों के परिजनों को न्याय मिलने की कुछ उम्मीद जगी है। सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद अब योगी सरकार की मुश्किलें बढ़ गइ हैं। मामले के आरोपी केंद्रीय गृह राज्य मंत्री के बेटे की अभी तक गिरफ्तारी न होने से योगी सरकार की नीयत पर सवाल उठ रहे हैं।

इस कांड से पहले एक कार्यक्रम में गृह राज्यमंत्री अजय मिश्रा के किसानों को ‘सुधर जाओ वरना सुधार दिया जाओगे’ बयान पर भाजपा का चुप्पी साध लेना भी लोगों को अखर रहा है। वैसे भी अजय मिश्रा का रिकार्ड आपराधिक प्रवृत्ति का रहा है। वह खुद उस कार्यक्रम में सांसद बनने के अपने रिकार्ड का जिक्र कर रहे हैं। उधर योगी सरकार ने केंद्रीय मंत्री के पुत्र के कांड में कोई साक्ष्य न मिलने की बात कहकर एक तरह से आशीष को क्लीन चिट दे दी है। दरअसल लखीमपुर मामला अब देशभर में चर्चा का विषय बन चुका है। इस मसले पर सियासत अपने चरम पर है और बीजेपी के लिए ये मामला गले की फांस सा हो गया है। देशभर में गरमाए इस मामले पर अब सुप्रीम कोर्ट ने खुद संज्ञान लेते हुए सरकार से सवाल किया है।

सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से पूछा कि इस पूरे मामले में अब तक क्या कार्रवाई हुई है और कितनी गिरफ्तारी हुई है। कोर्ट ने रिपोर्ट पेश करने को कहा है। दरअसल लखीमपुर कांड पर पूरा विपक्ष एकजुट हो गया है। लगातार तमाम विपक्षी दल लखीमपुर खीरी पहुंच रहे हैं और बीजेपी को घेरने की कोशिश कर रहे हैं। प्रियंका गांधी वाड्रा ने तो पूरी तरह से मोर्चा खोलते हुए गृह राज्य मंत्री के इस्तीफे तक की मांग कर दी है। मामला इतना तूल पकड़ चुका है कि कांग्रेस के वरिष्ठ नेता कपिल सिब्बल ने ट्वीट कर सुप्रीम कोर्ट पर ही सवाल उठा दिये थे। कपिल सिब्बल ने मामले पर सुप्रीम कोर्ट के स्वत: संज्ञान लेने की बात कही थी। अगले साल होने वाले उत्तर प्रदेश चुनाव को ध्यान में रखकर कोई भी विपक्षी दल इस मुददे को ठंडा होने नहीं देना चाहता है। ऐसे में कोर्ट का यूं सरकार से सवाल और रिपोर्ट की पेशकश निश्चित ही योगी सरकार और बीजेपी के लिए परेशानी का सबब है।

लखीमपुर खीरी में किसानों को कार से कुचल देने के मामले में ठीक से कार्रवाई न होने से सुप्रीम कोर्ट खफा है। सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई करते हुए यूपी सरकार से सवाल किया कि क्या आप देश में हत्या के अन्य मामलों में भी आरोपियों के साथ ऐसा ही व्यवहार करते हैं? सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वह लखीमपुर खीरी हिंसा मामले में उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा उठाए कदमों से संतुष्ट नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने लखीमपुर खीरी हिंसा मामले में आरोपियों को गिरफ्तार न करने को लेकर उत्तर प्रदेश सरकार से कहा कि आप क्या संदेश दे रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट योगी सरकार पर इतना नाराज है कि उसने एक किसान की मां की गंभीर हालात का हवाला देते हुए उसका इलाज कराने का भी आदेश योगी सरकार को दे दिया। लखीमपुर खीरी विपक्ष के लिए संजीवनी साबित हो सकता है। इसलिए विपक्ष ने इस मामले में पूरी जान झोंक दी है। प्रियंका गांधी और राहुल गांधी के बाद अब सपा मुखिया अखिलेश यादव भी मरे किसानों के परिजनों से मिले हैं।

पंजाब से नवजोत सिंह सिद्धू के लखीमपुर खीरी दौरे से सियासत और गरमा गई । ज्ञात हो कि लखीमपुर खीरी में किसानों पर थार जीप चढ़ा देने का आरोप केंद्रीय मंत्री अजय मिश्रा के बेटे पर है। अजय मिश्रा के बेटे के खिलाफ मुकदमा तो दर्ज किया गया है, लेकिन अब तक गिरफ्तारी नहीं हुई है। उसके नेपाल भाग जाने की खबरें भी चल रही हैं। हालांकि योगी सरकार ने किसान नेता राकेश टिकैत को विश्वास में लेकर मामले को काफी हद तक मैनेज करने का प्रयास किया था। मारे गये किसानों के परिजनों को 45-45 लाख रुपये एक-एक व्यक्ति को नौकरी की बात कही गई थी। घायल किसानों को 10-10 लाख रुपये देने की बात कही गई थी। मामले ने फिर से सियासती जोर पकड़ा है।

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