कोरोना और लाकडाउन में फंसे एक टीवी पत्रकार की व्यथा

मैं नोएडा स्थित एक न्यूज़ चैनल का संवाददाता हूं. मार्च महीने में छुट्टी लेकर अपने गांव चला गया था और लॉकडाउन के कारण घर पर ही फंस गया.

कई बार ऑफिस ने फोन करके हालचाल लिया और दफ्तर आने के लिए कहा गया. जब ट्रेन चलने लगी तब 76 दिन के बाद मैं अपनी ड्यूटी ज्वाइन करने के लिए दिल्ली पहुंचा. सरकार के दिशा निर्देश के मुताबिक एक हफ्ते तक होम क्वारंटीन रहना पड़ा.

चूंकि अकेला रहने वाला व्यक्ति खुद को कैसे क्वारंटीन करता इसलिए मकान मालिक को थोड़े पैसे देकर 7-8 दिन पका-पकाया भोजन उपलब्ध कराने को कहा. इस प्रकार होम क्वारंटीन के दौरान बिना मार्केट गए और खाना पकाये भोजन मिलता रहा.

पांचवें दिन मकान मालिक की पत्नी को अचानक अस्पताल में भर्ती कराया गया. अस्पताल में भर्ती होने की सूचना के बाद मैंने एक दिन के भीतर ही कमरा चेंज करके दूसरे मकान में चला गया. दूसरे ही दिन मरीज़ इस दुनिया से चल बसी. मौत के चौबीस घंटे के बाद मकान मालिक की पत्नी का कोरोना रिपोर्ट पाज़िटिव आया जिसके बाद हड़कंप मच गया.

चूंकि मैंने उसी के हाथ से पका भोजन खाया था इसलिए मैं सबसे ज्यादा घबरा गया. जिसके बाद मैंने तत्काल कई जाने-माने डॉक्टरों से बातचीत की उन्होंने मुझे राय दिया घबराने की जरूरत नहीं है. डॉक्टर ने कहा है हॉस्पिटल में जाने से बिल्कुल परहेज करें और संभव हो सके तो गांव की तरफ निकल जाएं और कम से कम 15 दिन तक होम क्वारंटीन रहें. इसलिए अब मैं गांव होम क्वारंठीन होने के लिए निकल चुका हूं.

खुद मीडियाकर्मी हूं इसलिए पता है कि सरकार के आंकड़े और दावों में कितनी हक़ीक़त है. संस्था ने अप्रैल की सैलरी रोक रखी है 2 महीने के बाद जून में मार्च महीने की सैलरी मिली जो मकान मालिक को किराया देने में ही खत्म हो गई अभी इस स्थिति में माली हालात भी अच्छी नहीं है और परिवार भी चलाना है. इसके साथ ही बगैर ड्यूटी ज्वाइन किए वापस उसी मंजिल की तरफ भागना पड़ा जहां से एक हफ्ते पहले वापस आए थे.

परिमल दीक्षित
(बदला हुआ नाम).



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