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अगर आरोप लगना ही हटाने का आधार है तो CVC चेयरमैन केवी चौधरी सबसे पहले हटाए जाएं!

Girish Malviya 

सीवीसी : एन इनसाइड स्टोरी…. अरुण जेटली ने जो सीबीआई में चल रहे मौजूदा विवाद के बारे में कहा कि, सीबीआई निदेशक आलोक वर्मा और विशेष निदेशक राकेश अस्थाना को हटाने का निर्णय केंद्र सरकार ने केंद्रीय सर्तकता आयोग (सीवीसी) की सिफारिशों के आधार पर लिया है.

ये बात सही है. केंद्रीय सतर्कता आयोग एक वैधानिक निकाय है, जिसका काम सरकारी अधिकारियों पर लगने वाले भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच करना है. लोकपाल अभी तक गठित नही हो पाया है इसलिए भ्रष्टाचार के मामलों में CVC ही सर्वोच्च है.

अरुण जेटली का कहना है कि आलोक वर्मा और अस्थाना दोनों ने ही परस्पर आरोप लगाए गए थे. लेकिन क्या आरोप लगाना ही पद से हटाने के लिए पर्याप्त है? चलिए इसी आधार पर जरा केंद्रीय सतर्कता आयुक्त के वी चौधरी को भी परख लेते है. प्रसिद्ध वकील प्रशांत भूषण ने आरोप लगाया था कि पूर्व सीबीआई निदेशक रंजीत सिन्हा की विवादास्पद विजिटर्स डायरी में चौधरी की चार बार एंट्री है. बतौर सीबीडीटी चेयरमैन चौधरी हवाला कारोबारी मोइन कुरैशी के खिलाफ जांच में शामिल थे.

मोइन कुरैशी वही शख्स है जिसका नाम वर्मा वाले केस में भी खूब उछाला गया है. कुरेशी ने सिन्हा से कई बार उनके निवास पर जाकर मुलाकात की थी. विजिटर्स डायरी में कुरैशी के नाम की भी एंट्री भी कई बार है. प्रशांत भूषण का कहना था कि रंजीत सिन्हा के कार्यकाल के दौरान सीबीआई ने स्टॉक गुरु घोटाले में चौधरी की भूमिका की जांच की थी. साथ ही चौधरी हवाला कारोबारी मोइन कुरैशी के खिलाफ इनकम टैक्स की जांच टीम के सदस्य रहे थे. चौधरी जब डीजीआईटी, दिल्ली थे, उसी दौरान राडिया टेप लीक मामला सामने आया था. लेकिन उपलब्ध साक्ष्यों पर उन्होंने कोई कार्रवाई नहीं की.

भूषण ने यह भी कहा कि सीबीडीटी के तीन वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा चौधरी की परफॉरमेंस अप्रेजल रिपोर्ट में प्रतिकूल टिप्पणी की गई थी. उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि चौधरी ने पोंटी चड्ढा की कंपनी की अघोषित संपत्ति को गलत तरीके से 200 करोड़ रुपये कम कर दिया था. यानी बहुत गंभीर आरोप तो चौधरी जी पर भी लगे हैं. चलिए प्रशांत भूषण को छोड़िए. वह तो वकील ठहरे उनका तो काम ही आरोप लगाना.

लेकिन कुछ समय पूर्व भ्रष्टाचार के मामलों के खुलासे के लिए रेमन मैग्सेसे अवॉर्ड से नवाज़े जा चुके भारतीय वन सेवा (आईएफएस) के चर्चित अधिकारी और ह्विसिलब्लोअर संजीव चतुर्वेदी ने भी केंद्रीय सतर्कता आयुक्त केवी चौधरी के ख़िलाफ़ जांच की मांग की थी. संजीव चतुर्वेदी ने सतर्कता आयोग पर यह आरोप लगाया कि उसने नई दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में हुए भ्रष्टाचार के कई ऐसे मामले बंद कर दिए जिनमें कई वरिष्ठ अधिकारी कथित तौर पर शामिल थे. संजीव ने अपने दावे के समर्थन में करीब 1,000 पन्नों के दस्तावेज़ हाल ही में राष्ट्रपति कार्यालय को भेजे थे. लेकिन कोई कार्यवाही नही हुई.

के वी चौधरी ऐसे पहले सीवीसी चेयरमैन हैं जिन्हें नॉन आईएएस होते हुए भी सतर्कता आयुक्त बनाया गया है. अब ऐसे व्यक्ति को जिन पर इतने आरोप हैं, उन पर क्यों इतना भरोसा किया जा रहा है. या कहीं ऐसा तो नहीं उन्हें जानबूझकर उस जगह बैठाया गया है ताकि वक्त जरूरत पर एक मोहरे की तरह ही इस्तेमाल किया जा सके. और, वह वक्त आ गया है.

राजनीतिक और आर्थिक मामलों के विश्लेषक गिरीश मालवीय की एफबी वॉल से.

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