क्या दागी आईएएस महेश गुप्ता के आगे न्यायपालिका, विधायिका व पत्रकारिता नतमस्तक हैं?

दागी आईएएस महेश गुप्ता पर शिकंजा कसने वाले हाईकोर्ट जज का तबादला, न्यायजगत आक्रोशित, अखबारों से खबर गायब

दानवता को मिला अमित उल्लास है,
मानवता का चेहरा किन्तु उदास है।
नवयौवन का रंग चढ़ा अन्याय पर,
चौराहे पर पड़ी न्याय की लाश है….

मी लार्ड! न्यायपालिका को लोकतंत्र के सबसे मजबूत स्तम्भ का दर्जा प्राप्त है। भले सुप्रीम कोर्ट के चार वरिष्ठ न्यायमूर्ति पत्रकारवार्ता करके खुद के लिए न्याय मांग कर तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश पर सवाल उठाए, बावजूद इसके आज भी देश के गरीब तबके की आस्था न्याय के मंदिर पर अटूट है। इनमें से एक न्यायमूर्ति श्री रंजन गोगोई तो वर्तमान में देश के प्रधान न्यायाधीश की कुर्सी पर ससम्मान विराजमान हैं फिर भी न्यायमूर्तियों की गरिमा को ठेस पहुंचे तो इससे ज्यादा शर्मनाक और क्या हो सकता है। न्याय के मंदिर की आस्था को खुद पुजारी रूपी न्यायमूर्ति ही आहत करें तो ह्रदय कचोटता है। न्याय के जिस हथौड़े से नौकरशाही थर थर कांपती थी। आज उसी नौकरशाही के कुख्यात भ्रष्ट अफसर मानो न्याय के मंदिर के सामने खड़े होकर अपनी विजय का अट्टहास कर रहे हैं।

ये अट्टहास किसी और का नहीं बल्कि उत्तरप्रदेश की नौकरशाही के महाभ्रष्टतम चेहरे के रूप में वर्षों से सुविख्यात महेश कुमार गुप्ता का है। जो आज बीते एक दशक से ज्यादा समय से सभी दलों की सरकारों के पसंदीदा आईएएस हैं। योगी राज में भी आईएएस महेश कुमार गुप्ता अपर मुख्य सचिव का दर्जा लेकर करीब आधा दर्जन विभागों के मुखिया बने बैठे हैं। हज़ारों करोड़ के घोटालों के आरोप लगे, सीबीआई ने चार्जशीटेड भी किया। सुना है सम्पत्तियां तो पूछिये ही मत। लेकिन ‘समरथ को नहीं दोष गुसाईं’ की तर्ज पर आज तक बाल बांका करने की हिम्मत न किसी जांच एजेंसी की हुई और न ही किसी सत्ताधीश मुख्यमंन्त्री या सरकार की। पहली बार उम्मीद जगी तो इलाहाबाद हाईकोर्ट के उन न्यायमूर्ति विवेक चौधरी से। जिनकी पहचान न सिर्फ ईमानदारी है बल्कि न्याय की देवी के तराजू को हमेशा बराबर रखने वाली कार्यशैली के फैसले भी हैं।

दागी आईएएस महेश गुप्ता

ये वही न्यायमूर्ति हैं जिनके पिता आज भी मेरठ में एक वरिष्ठ सक्रिय अधिवक्ता की भूमिका पूरी सत्यनिष्ठा से निभा रहे हैं। जिन्हें बेहद आदर और ईमानदारी की निगाहों से देखा जाता है सिर्फ यही नहीं न्यायमूर्ति विवेक चौधरी के पिता के पास इतनी पुश्तैनी सम्पत्ति है कि लोग उन्हें राजा साहब तक कहते हैं। लेकिन इससे न्यायमूर्ति विवेक चौधरी को तनिक भी सरोकार नहीं। उनका जीवन तो न्याय के मंदिर के पुजारी के रूप में बेहद साधारण ढंग से कट रहा है। इस पुजारी ने एक भ्रष्ट आईएएस के अहंकार को अपने एक फैसले से चकनाचूर कर दिया। जो सहायक समीक्षा अधिकारियों की प्रोन्नति से जुड़ा था। हाईकोर्ट के आदेश की नाफरमानी पर न्यायमूर्ति चौधरी ने न सिर्फ आईएएस महेश गुप्ता को दोषी करार दिया बल्कि घण्टो अपनी कोर्ट में खड़ा रख न सिर्फ एक दिन की सजा सुना डाली बल्कि 25 हजार का जुर्माना भी लगा दिया। फिर तो यूपी की नौकरशाही को मानो 440 वोल्ट का करंट सा लग गया।

उसके बाद जो हुआ, उससे न सिर्फ न्याय के मंदिर की गरिमा का चीरहरण हुआ बल्कि खुद पूरा न्याय जगत हतप्रभ हो गया। अब तक आप सुनते आए होंगे कि फलां अफसर ने सत्ताधीशों के फैसले पर अपनी मुहर न लगाई तो उसे तबादला/निलंबित करके नए अफसर की तैनाती करके मनमाफिक फैसले कराए गए । ऐसी ही फ़िल्म की पटकथा इलाहाबाद हाईकोर्ट में लिखी गयी या नहीं, इसका फैसला आप खुद कीजिये। बस एक बार तथ्यों पर जरूर गौर फरमाइए। जिससे एक ऐसा सन्देश निकल रहा। जिसने न्यायपालिका की अस्मिता जरूर आहत हुई होगी। इलाहाबाद हाईकोर्ट के विद्वान मुख्य न्यायमूर्ति का विशेषाधिकार है कि वो किसी भी न्यायमूर्ति को एक खंडपीठ से दूसरी में स्थानांतरित कर सकते हैं सामान्यतः ऐसा होने पर किसी भी प्रकार के सवाल नहीं उठते (न्यायमूर्ति एपी शाही प्रकरण पर बात फिर कभी)। हालांकि मी लार्ड पर बोलने की आज़ादी और हैसियत भी किसी की नहीं।

जस्टिस विवेक चौधरी

लेकिन जब एक महाभ्रष्टम आईएएस महेश गुप्ता के ऊपर माननीय न्यायालय की अवमानना पर शिकंजा कसने के नौ दिन के भीतर ही ईमानदार न्यायमूर्ति विवेक चौधरी की खंडपीठ लखनऊ से बदलकर सीधे इलाहाबाद कर दी जाए तो मी लार्ड सवाल तो उठेंगे और जरूर उठेंगे। एक कहावत है कि जब कहीं आग लगेगी धुंआ भी तभी उठेगा। जिसकी नजीर ये प्रकरण है। 4 अप्रैल 2019 को न्यायमूर्ति विवेक चौधरी का स्थानांतरण लखनऊ खंडपीठ से इलाहाबाद हो गया। अब जरा आप भी कुछ तथ्य जानिए और आत्मविवेक से निर्णय कीजिये कि आखिर सवाल क्यों न उठाएं जाएं। न्यायमूर्ति चौधरी के समक्ष सरकार के बेहद वरिष्ठ अधिवक्ताओं की एक अर्जी 1 अप्रैल को आती है जिसमे अपर मुख्य सचिव सचिवालय प्रशासन महेश गुप्ता की सजा माफी पर सोमवार को ही विशेष सुनवाई की अपील न्यायपालिका से की जाती है। जिस पर हाईकोर्ट के विद्वान न्यायाधीश श्री विवेक चौधरी अपने मौखिक आदेश में विशेष सुनवाई से न सिर्फ साफ इनकार कर देते हैं बल्कि प्रकरण को बाकी सामान्य मामले की तरह सुनने की बात भी कह डालते हैं।

भई आपने न्याय के मंदिर की गरिमा से खिलवाड़ किया तो आपको वीआईपी की तरह ट्रीट किया भी क्यों जाए। अब एक तो करेला, ऊपर से नीम चढ़ा जैसी कहावत चरितार्थ हो गयी। मामला 3 अप्रैल को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध था। लेकिन बेहद आश्चर्यजनक ढंग से नियत सुनवाई के दिन 3 अप्रैल को कंटेम्प्ट नम्बर 786/2018 के मामले में कोर्ट संख्या 8 में विपक्षी अपर मुख्य सचिव सचिवालय प्रशासन महेश गुप्ता की ओर से कोई भी हाईकोर्ट न्यायमूर्ति विवेक चौधरी के समक्ष पेश ही नहीं हुआ। नतीजतन प्रकरण स्थगित होकर आगे बढ़ गया। लेकिन बेहद आश्चर्यजनक ढंग से ठीक 3 अप्रैल के दिन ही सरकारी पक्ष राहत के लिए हाईकोर्ट की दो सदस्यीय खण्डपीठ में शामिल न्यायमूर्ति पंकज कुमार जायसवाल और न्यायमूर्ति रजनीश कुमार के सामने कंटेम्प्ट अपील संख्या 2/2019 में पेश हो गया। जहां न्यांयमूर्तियों ने मामले को नॉटबिफोर करते हुए दूसरी खण्डपीठ के सामने मामला ले जाने का आदेश दिया।(जिसमे न्यायमूर्ति रजनीश कुमार न हों)। अब सवाल लाजिमी है कि एक ही दिन न्यायमूर्ति चौधरी की अदालत में पेश क्यों नहीं हुए और अवमानना के दोषी करार देने वाले 26 मार्च के फ़ैसले के खिलाफ पहले ही कंटेम्प्ट अपील में बड़ी खण्डपीठ के समक्ष मामले को क्यों नहीं ले जाया गया। मुद्दा ये भी है कि भले बड़ी खण्डपीठ अपील के जरिये महेश गुप्ता को फौरी राहत दे देती, लेकिन मामले की मूल सुनवाई होती न्यायमूर्ति विवेक चौधरी की अदालत में ही।

इसलिए राहत मिलने की उम्मीद भी शून्य के बराबर ही थी। लेकिन जब सरकार की तरफ़ से बेहद आलादर्जे के लम्बी पहुंच वाले अधिवक्ताओं की पूरी सेना लगी हो तो आगे आप समझदार हैं। खैर अगले ही दिन बड़े ही अप्रत्याशित तरीके से 4 अप्रैल को न्यायमूर्ति विवेक चौधरी को हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ से इलाहाबाद स्थानांतरित कर दिया जाता है। बस इस फैसले से जो सन्देश गया, उसने पूरे न्याय जगत को सोचने पर मजबूर कर दिया कि क्या ये विधायिका द्वारा न्यायपालिका पर हावी होने की साज़िश मात्र है कुछ समय के बाद अगर स्थानांतरण होता तो एक सवाल न उठता। हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के इस अचंभित करने वाले फैसले के खिलाफ अधिवक्ताओं ने दबे सुर में आवाज़ भी उठानी शुरू कर दी। कुछ ने सोशल मीडिया पर भी लिखा। अब स्थानांतरण करना चूंकि मुख्य न्यायाधीश का विशेषाधिकार है ऐसे में खुल्लमखुल्ला विरोध सीधे न्यायालय की अवमानना के दायरे में आ सकता था।

हालांकि लखनऊ बार एसोसिएशन ने बाकायदा एक प्रस्ताव 5 अप्रैल को ही पारित करके न्यायमूर्ति विवेक चौधरी के अकस्मात स्थानांतरण को रोकने की गुहार मुख्य न्यायाधीश से लगाई। इस प्रस्ताव में साफ तौर पर महेश गुप्ता प्रकरण का नाम तो नहीं लिया गया लेकिन आदरणीय न्यायमूर्ति चौधरी द्वारा न्यायजगत में अतुलनीय योगदान को जरूर याद दिलाया गया। प्रतिष्ठित लखनऊ बार संघ ने कम से कम प्रस्ताव पारित करके न सिर्फ एक शानदार कार्य किया बल्कि विधायिका को भी खुली चेतावनी अप्रत्यक्ष रूप से दी कि न्यायपालिका की गरिमा पर तनिक भी आंच नहीं आने दी जाएगी। मेरा ह्रदय भी न्यायमूर्ति चौधरी के स्थानांतरण से बेहद द्रवित था क्योंकि वर्तमान दौर में यूपी की भ्रष्ट नौकरशाही के खिलाफ सिर्फ न्यायपालिका से ही उम्मीदें बाकी रह गयी हैं कई वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने कहा कि कोई भी अदालती मामला किसी न्यायाधीश का नहीं बल्कि न्यायपालिका का होता है इसलिए कोई फर्क पड़ेगा नहीं, लेकिन कुछ ने साफ आशंका जताई कि अब राहत इस प्रकरण में मिलना तय है। बस फिर क्या था स्थानांतरण के अगले दिन ही 5 अप्रैल को अपर मुख्य सचिव सचिवालय प्रशासन महेश कुमार गुप्ता को न्यायालय की अवमानना मामले में दी गयी सजा से फौरी राहत कंटेम्प्ट अपील के जरिये दो सदस्यीय हाईकोर्ट की खंडपीठ से मिल गयी।

अब न्यायमूर्ति विवेक चौधरी भी नहीं हैं इसलिए अवमानना मामले की मूल सुनवाई भी दूसरे न्यायमूर्ति ही करेंगे। इसलिए यहां भी निश्चित रूप से राहत ही मिलना तय माना जा रहा है। खैर अगले दिन सभी प्रमुख अखबारों ने भी अपना सबसे बड़ा फर्ज निभाते हुए भ्रष्ट आईएएस की शान में लम्बा लम्बा राहतनामा लिख दिया। आखिर 27 मार्च को समाचारपत्रों में प्रकाशित बड़ी बड़ी खबरों के जरिये हुई फजीहत की भरपाई भी तो करनी ही थी। लेकिन योगी, मोदी क्या खा रहे हैं क्या पहन रहन रहे हैं ये तक देखने और प्रथम पृष्ठ की सुर्खियां बनाने वाले लखनऊ के शीर्ष अखबारों को खबर के तौर पर न्यायमूर्ति विवेक चौधरी का न ही स्थानांतरण दिखा और न ही लखनऊ बार असोसिएशन द्वारा पारित प्रस्ताव।

दिखता भी कैसे, जब मामला एक महाभ्रष्ट रसूखदार आईएएस महेश गुप्ता से सीधे जुड़ा हो। जबकि इन अखबारों में बकायदा न्यायालय से जुड़ी खबरों के संकलन के लिए मोटी पगार पर विधि संवाददाताओं की नियुक्ति है। मैंने दो दिन तक इंतजार किया कि शायद कोई एक अखबार तो इस मुद्दे को खबर के तौर पर प्रकाशित करे, लेकिन खबर तो सिर्फ महेश गुप्ता को राहत देने वाली छपी, जबकि ईमानदार न्यायमूर्ति विवेक चौधरी का स्थानांतरण मीडिया में एक लाइन न पा सका। आज के दौर की यही पत्रकारिता भी है। खैर न्यायपालिका द्वारा महाभ्रष्टम आईएएस महेश कुमार गुप्ता पर दरियादिली दिखाने का ये कोई पहला मामला भी नहीं था जो हम सब छाती पीटते रहें।

करीब सात से आठ वर्ष पहले सूचना भर्ती घोटाले जैसे भ्रष्टाचार के बेहद संगीन मामले में सीबीआई की लोवर कोर्ट की विद्वान महिला न्यायाधीश(मौजूदा हाईकोर्ट न्यायमूर्ति) ने दागी आईएएस महेश गुप्ता को उसी दिन खड़े खड़े मिनटों में जमानत दे दी थी। अब नियमों में होगा तभी दी भी होगी। यहां भावनाओं से अदालतें थोड़े ही न फैसले लेती हैं। हालांकि सीबीआई के प्रकरणों में जांच और जमानत की जटिलता का अंदाजा आप स्वयं लगा सकते हैं ऐसे में दो दिन पहले सहायक समीक्षा अधिकारियों के प्रमोशन से जुड़े न्यायालय की अवमानना के मामले में आदरणीय न्यायमूर्तियों ने स्वविवेक और परिस्थितजन्य दस्तावेजों को देख ही आईएएस महेश गुप्ता को राहत देने वाला फैसला दिया होगा। लेकिन अब आगे भी अवमानना का प्रकरण खत्म ही समझा जा रहा है।

लेकिन मेरे जैसे गरीब गुरबे तो इस फैसले में न्यायहित कम एक महाभ्रष्ट आईएएस के इकबाल की झलक जरूर देख रहे हैं मेरा सीधे देश के प्रधान न्यायाधीश श्री रंजन गोगोई से अनुरोध है कि वो इस बेहद संवेदनशील प्रकरण को संज्ञान में लें क्योंकि इस प्रकरण से एक ईमानदार न्यायमूर्ति विवेक चौधरी के मनोबल पर भी निश्चित रूप से असर पड़ेगा और अगर ऐसा हुआ तो न्याय के मंदिर के रक्षक बने अन्य पुजारी रूपी न्यायमूर्ति निकट भविष्य में विधायिका से जुड़े किसी भी महाभ्रष्ट अफसर के ऊपर अवमानना की कार्रवाई का हंटर चलाने से पहले सौ बार सोचेंगे कि कहीं उनका भी अकस्मात स्थानांतरण जैसा हश्र न हो जाए। बाकी मैं हाईकोर्ट के विद्वान मुख्य न्यायाधीश से भी सिर्फ इतनी ही गुजारिश करूँगा कि हे! न्याय के भगवान, इस प्रकरण में जब एक महाभ्रष्ट आईएएस ने खुद देश के शीर्ष न्यायालय अर्थात सुप्रीम कोर्ट में दिए शपथपत्र के बावजूद दो महीने में आदेशों का अनुपालन सुनिश्चित नहीं किया, उसकी नजर में हाईकोर्ट की अहमियत का अंदाज़ा आप सहज ही लगा सकते हैं। बाकी आप शिरोधार्य हैं परम शक्तिमान है कल को मुझे भी जेल की सीखचों के पीछे डाल सकते हैं फिर मेरे जैसा अदना सा निकृष्ट और निस्तेज व्यक्ति कर भी क्या पायेगा।

लेकिन बतौर पत्रकार मेरी जुबाँ अंतिम सांस तक सत्य बोलेगी और कलम सत्य ही लिखेगी। अब सत्य से किसी की अवमानना होती है तो मैं जेल जाने को भी सहर्ष तैयार हूं, सिर्फ ये जरूर स्मरण रखियेगा कि आपको भी सत्य की रक्षा के लिए ही माननीय इलाहाबाद उच्च न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश के सिंहासन पर बिठाया गया है। अंत में सिर्फ चन्द पंक्तियां पेश हैं..

इतना भी गुमान न कर,
अपनी जीत पर ऐ बेखबर,
शहर में तेरे जीत से ज्यादा,
चर्चे तो मेरी हार के है…

लखनऊ के तेजतर्रार पत्रकार मनीष श्रीवास्तव की रिपोर्ट.

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