कवि के सम्मान में…

Dinesh Choudhary

हिंदी वाले सब मिल-जुलकर अपने लिए एक ऐसा समाज रचते हैं, जहाँ जीवन की मुख्यधारा में कवि, लेखक, रंगकर्मी, रचनाकारों का हस्तक्षेप न्यूनतम या निषिद्ध हो। यहाँ भाव, अनूभूति, रस वगैरह की भी कोई जगह नहीं होती; सरोकार तो बहुत दूर की बात है। वह अपने जीवन के लिए रस प्रमुखतः बाज़ार से खींचता है, जिसका मुख्य प्रेरक तत्व अब भोग की जगह ‘स्टेटस’ हो गया है। वह ‘आत्मिक सुख’ के लिए कर्मकांड पर आश्रित होता है, जहाँ धर्म तो नहीं दिखता, पाखंड ज्यादा नजर आता है। सांस्कृतिक रूप से विपन्न, या थोड़े कटु शब्दों में कहा जाए तो तेजी से फूहड़ होता यह समाज रचनाकारों को न केवल अपने ठेंगे पर रखता है, बल्कि उन्हें सन्देह की नजर देखता है। ऐसे समय में किसी कवि के समारोहपूर्वक सम्मान का निर्णय निश्चय ही जरा जोखिमभरा है।

जबलपुर के एक सभागार में दो दिनों पहले डॉ मलय का सम्मान हुआ। वे मुक्तिबोध के समकालीन रहे हैं। हिंदी कवि और कविताई की कोई भी चर्चा मुक्तिबोध के जिक्र के बगैर पूरी नहीं हो सकती, सो मुक्तिबोध यहाँ भी उपस्थित रहे। बीज वक्तव्य रखते हुए बांदा के उमाशंकर सिंह परमार ने कवि मान बहादुर सिंह के नाम पर दिए जाने वाले इस सम्मान की पृष्ठभूमि का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि यह सम्मान या अभिनंदन है, कोई पुरस्कार नहीं है और यह सम्मान हम रचनाकार के गृह-नगर में जाकर उनके आत्मीय जनों के बीच देना चाहते हैं। हिंदी साहित्य में कुछ ऐसे गठजोड़ का चलन है जो डिजर्व करने वाले रचनाकारों को अपदस्थ करता है और हम इस चलन के विरुद्ध हैं।

कार्यक्रम के ऐन आरम्भ में ही देवेश चौधरी ने मान बहादुर सिंह और शाकिर अली ने मलय पर कविताओं का पाठ किया। बुके-माला वगैरह से बचते हुए ठेठ देहाती शैली में अतिथियों को गमछे ओढ़ाए गए। संचालन कवि-पत्रकार सुधीर सक्सेना कर रहे थे। संचालन शुरू करने से पहले मुझसे कहा कि “आज शायद ज्ञान जी भी आएं। उनका आना और न आना, दोनों महत्वपूर्ण होता है।” ज्ञान जी आए। आए तो रचनाकारों-श्रोताओं ने घेर लिया। सेल्फी वगैरह ली। सेल्फी अपने समय का राजरोग है, हालांकि कविता आमतौर पर कवि की सेल्फी ही होती है। ज्ञान जी ने कहा कि मंच पर न बुलाएं, पर उन्हें जनता की मांग पर आना पड़ा। कहा कि बोलने को न कहें। जनता की मांग पर बोलना पड़ा।

जनता सर्वोपरि होती है। उसी के लिए कविताएँ रची जाती हैं। उसी के लिए विपुल साहित्य रचा जाता है। उसी के लिए किताबें लिखीं और छापी जाती हैं और मेले में विमोचित की जाती हैं। जनता के लिए ही नाटक लिखे जाते हैं। खेले भी जाते हैं बड़े-बड़े मंचों पर। पर इनमें जनता होती कहाँ है? वह श्रोता, पाठक या दर्शक के रूप में नज़र क्यों नहीं आती?

अपने अध्यक्षीय भाषण में डॉ कर्ण सिंह चौहान ने इसी जनता को तलाशने की कोशिश की। कहा कि कवि की कविता पाठक तक चली जाए यही बड़ा सम्मान है। बड़ा सवाल यह है कि 40 करोड़ हिंदी भाषियों के बीच हमारी कविता कहाँ है? साहित्य जनता के लिए नहीं लिखा जा रहा है भले ही कहा जाता हो कि जनता का साहित्य है। यह यथार्थ मध्यमवर्ग को परोसा जाने वाला यथार्थ है, जिसमें उसकी कोई रुचि नहीं है। वह तो तीन घण्टे की फ़िल्म देखना चाहता है पर विषय यह नहीं चाहता। हम इन सवालों को कारपेट के नीचे दबाए बैठे हैं। हमें यह जानना है कि हम किस यथार्थ को चुन रहे हैं। यथार्थ बहुआयामी है और हम उसके अनेक पहलुओं को नहीं देख पा रहे हैं या जानबूझकर अनदेखा कर रहे हैं।

निर्भय दिव्यांश व रामगोपाल ने मलयजी का सम्मान किया। प्रतीक चिह्न सौंपा गया। मलय जी ने कविताएँ पढ़ीं। वरिष्ठ लेखक नीलकांत ने कविता की चर्चा मुख्यतः भाषा के संदर्भ में कई। अरुण कुमार और अजीत प्रियदर्शी ने भी अपने विचार रखे। पत्रिका ‘लहक’, ‘दुनिया इन दिनों’ और ‘ तीसरा पक्ष’ की ओर से असंग घोष ने आभार प्रदर्शन किया।

पता नहीं कविता बेहतर दुनिया बना सकती है या नहीं, पर कविताओं के बचे रहने से दुनिया के बेहतर होने की संभावनाएं बची रहती हैं। कविताएँ बची रहें, यही कवि का बड़ा सम्मान है।

रंगकर्मी और सोशल एक्टिविस्ट दिनेश चौधरी की एफबी वॉल से.

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