अखबार ने नौकरी से निकाला तो 34 साल बाद कोर्ट से जीत सके दुबे जी!

कुछ लोगों का कहना है कि यह जीत कोई जीत नहीं है. 34 साल बाद किसी कंपनी से निकाले गए आदमी का जीतना बताता है कि दरअसल कंपनी जीत गई, आदमी हार गया. बावजूद इसके, कई पत्रकार साथी खुश हैं कि चलो, जीते हुए साथी को समुचित पैसा, बकाया, वेज बोर्ड और मुआवजा तो मिल ही जाएगा जिससे उसके परिवार को आगे कोई आर्थिक दिक्कत नहीं आएगी.

वरिष्ठ पत्रकार दिनेश दुबे को 1984 में दैनिक नवज्योति अखबार के प्रबंधकों ने नौकरी से निष्कासित कर दिया था. इसके विरूद्ध वरिष्ठ पत्रकार दिनेश दुबे ने स्थानीय श्रम न्यायालय में केस कर दिया. पूरे 34 साल चले मुकदमे का कल फैसला आया. इस फैसले में न्यायालय ने दिनेश दुबे को श्रमिक मानते हुए उनके निष्कासन को गलत ठहराया और दैनिक नवज्योति पर हर्जाना लागू किया. कुछ मीडियाकर्मियों का कहना है कि इस न्यायिक निर्णय से न्यायालयों में श्रमिकों की जीत का एक नया इतिहास लिखा गया है. साथ ही प्रबंधकों की हठधर्मिता को परास्त करने का यह अनूठा उदाहरण साबित हुआ है.

मीडियाकर्मी आलोक लिखते हैं-

”वरिष्ठ पत्रकार दिनेश दुबे ने दैनिक नवज्योति के प्रबंधन को न्यायालय के फैसले के बाद धरातल पर लाकर खड़ा कर दिया है। हालांकि फैसला आने में 34 साल लग गए, यह हमारी न्यायपालिका की कमजोरी ही दिखती है, वरना किसी आदमी को जब नौकरी से हटाया जाता है, उस समय उसके सामने रोजगार का गंभीर संकट खड़ा हो जाता है। लेकिन दिनेश दुबे ना डरे ना हारे, बल्कि चट्टान की तरह खड़े रहे। आज उन्होंने यह सिद्ध कर दिया है कि हमारी न्यायपालिका जो बड़े अखबार मालिकों के सामने झुकती है, वहां भी यदि डटकर मुकाबला किया जाए तो फैसला देर सवेर श्रमिक के पक्ष में ही आता है। ये एक उदाहरण है मजीठिया क्रांतिकारियों के लिये, जो दुबे जी की तरह अब भी मैदान में अपने जायज हक के लिये खड़े हैं। एक बार फिर वरिष्ठ पत्रकार दुबे जी को मुकदमा जीतने पर बधाई।”

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One comment on “अखबार ने नौकरी से निकाला तो 34 साल बाद कोर्ट से जीत सके दुबे जी!”

  • madan kumar tiwary says:

    पहले तो लेबर। कोर्ट के पीठासीन पदाधिकारी पर कार्रवाई होनी चाहिए, श्रम न्यायालय को तीन माह में फैसला देना है, अगर किसी कारण से उस 3 माह के समय को बढ़ाते हैं तो न्यायालय को कारण का उल्लेख करते हुए बढाना पड़ेगा, पंकज कुमार के मामले में डे टू डे सुनवाई का आदेश है, तीन गवाहों की सूची दैनिक जागरण ने दी थी परन्तु एक गवाह विनोद शुक्ला एजीएम कार्मिक का 3 घण्टे प्रति परीक्षण मैंने किया ,उसके बाद जागरण ने लिखकर दे दिया कि बाकी दो गवाह आनन्द त्रिपाठी एंव एस एम पाठक की गवाही नही करवाना चाहता है , बहस भी जागरण ने पूरा कर लिया परन्तु मैंने आवेदन दिया आनन्द त्रिपाठी को बुलाने के लिए , मतलब इस केस का निर्णय तुरन्त हो सकता है परन्तु इसबार हमलोग ही जिद्द पर हैं ,देर भले हो, त्रिपाठी को आना पड़ेगा अन्यथा अभीतक फैसला हो गया रहता ।

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