इलेक्ट्रॉनिक मीडिया वाकई अब आखिरी सांसें ले रहा है!

Vikas Singh Dagar

मीडिया (इलेक्ट्रॉनिक, प्रिंट, वेब) को लेकर मैंने कई ब्लॉग लिखे हैं। 5 साल पहले लिखे एक ब्लॉग मैं मैंने जिक्र किया था कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया अपनी आखिरी सांसें ले रहा है। सारा मॉस मोबाइल ( वेब ) पर शिफ्ट हो चुका है।

लेकिन डिजिटली होने के बाद सबसे ज्यादा नुकसान फील्ड में काम करने वाले पत्रकारों को हुआ है। उनकी जरूरत ना के बराबर रह गयी है।

जिन रिपोर्टर्स – स्टिंगर्स को न्यूज़ चैनल्स की रीढ़ की हड्डी माना जाता था वो अब चैनलों को गले की हड्डी नजर आने लगे। आप को बता दूं बड़े बड़े चैनल आज अपने रिपोर्टर- स्टिंगर से फ्री बराबर काम करवा रहे है । एंकर को चैनल का फेस बना दिया गया है।

आप देखते होंगे कि आजकल फील्ड में भी एंकर ही रिपोर्टिंग कर रहे होते है , लेकिन ज्यादातर को ग्राउंड की , धाराओं की , संवेदनाओं तक कि समझ नही होती । वो चैनल द्वारा पकड़ाया गया एजेंडा लेकर पहुँचते है और उसी चश्मे से रिपोर्टिंग करते है।

रेप की घटनाएं हो , या बड़े मर्डर केस , बाढ़ या अन्य आपदा हो , कर्फ्यू या दंगे , कोई राजनीतिक घोटाला हो या अन्य कोई बड़ा इवेंट , उसकी शुरुआत तो स्टिंगर – रिपोर्टर करता है लेकिन कुछ घण्टो बाद उस खबर , उस कांड का हाईजैक एंकर द्वारा कर लिया जाता है ।

जो स्टिंगर्स रिस्क लेकर , अपनी बुद्धि लगाकर , अपनी काबलियत द्वारा मामले को उठाता है या उजागर करता है , उसको ऐसे निकाल फिये जाता है जैसे दूध से मक्खी ।

अब उसका काम रह जाता है कि के फलाना एंकर आ रहा है या आ रही है , चाय पानी का इंतज़ाम रखना , जो भी अपडेट हो वो उन्हें देते रहना , ठहरने की व्यवस्था देख लेना ।

ऐसे में लोकल का रिस्क , माफियाओं की दुश्मनी लेना वाला रिपोर्टर ठगा महसूस करता है , वो खड़ा होकर तमाशा देखने के अलावा कुछ करने लायक नही रह जाता , परिचित लोग पूछते है कि तुम कहे रिपोर्टिंग नही कर रहे तो उसके पास देने के लिए जवाब नही रह जाता ।

मुम्बई से लेकर हाथरस तक आपने यही देखा होगा , एंकरों की फौज सड़को पर उतार दी जाती है । और फ्री बराबर काम कर रहे रिपोर्टर – स्टिंगर्स को मौका तक नही मिलता । ना टीवी पर आने का ना अपनी काबलियत दिखाने का ।

क्योंकि एक रिपोर्टर को अगर मौका नही मिलेगा तो वो आगे कैसे बढ पायेगा , सुधीर चौधरी हो या रविश कुमार ये लोग रिपोर्टिंग से एंकरिंग में आये है । इनकी मेहनत का प्रमोशन हुआ है । लेकिन अभी किताबी ज्ञान के साथ एंकर ही रिपोर्टिंग कर रहे है ।

ये बहुत खतरनाक प्रचलन है , जैसे राजा के खाने से पहले नोकर या अन्य प्राणी को खाना ( कोर ) खिलाकर चेक़ कराया जाता था कि जहर तो नही है ।
जैसे पुरानी फिल्मों में विलेन खतरा जांचने के लिए अपने एक एक गुर्गे को आगे भेजता था ।

उसी तरह का इस्तेमाल एक स्ट्रिंगर – रिपोर्टर का रह गया है । शरुआती रिस्क आपका , बाकी मलाई ( फेम ) हमारी।

विकास सिंह डागर

ठगा “पत्रकार”

7 साल का अनुभव , सुदर्शन न्यूज़ (स्टिंगर) , इंडिया न्यूज (स्टिंगर) , नेशनल वॉइस ( रिपोर्टर ) , न्यूज़ 1 इंडिया ( सीनियर रिपोर्टर ) , हिंदी खबर ( एसोसिएट एडिटर )

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