लगातार टूट रहे जागरण के पाठक, विज्ञापनदाता और शुभचिंतक

हमेशा रावणत्‍व की पराकाष्‍ठा पर रामत्‍व का आविर्भाव अवश्‍यंभावी होता है। यह नित्‍य नियम है। इससे कोई भी बच नहीं सकता। भले ही वह कितना भी साधन संपन्‍न अथवा शक्तिशाली हो। रावण के पास साधनों की कमी नहीं थी तो राम साधनहीन थे। इसी पर तुलसीदास जी ने लिखा- रावण रथी विरथ रघुबीरा। देखि विभीषन भयो अधीरा।। राम-रावण युद्ध में रावण को रथ पर सवार और राम को बिना रथ के देख विभीषण विचलित होने लगे। लेकिन परिणाम क्‍या हुआ—रावण का अंत हुआ और…आप सब जानते हैं।

यही स्थिति दैनिक जागरण के साथ है। हिंदी बेल्‍ट के इस बड़े अखबार के पास साधनों की कोई कमी नहीं है, लेकिन इसके अंदर रावणत्‍व आ गया है। रावणत्‍व का मतलब है-दूसरों के हक हड़पने की प्रवृत्ति। हर जगह अपना आधिपत्‍य स्‍थापित करने की प्रवृत्ति। लेकिन शास्‍त्र इसकी अनुमति नहीं देते। कहा गया है-अवश्‍यमेव भोक्‍तब्‍यं कृतं कर्मं शुभाशुभम। हर किसी को अपने उलटे-सीधे कर्मों को अवश्‍य भोगना पड़ता है। वैसे-हर कोई कर्म तो करता ही है, लेकिन ऐसे व्‍यक्तियों के कर्मों का विशेष महत्‍व होता है, जिनसे अधिक लोग प्रभावित होते हैं। 

निश्चित तौर पर दैनिक जागरण प्रबंधन के कर्मों से अधिक लोग प्रभावित हो रहे हैं। हजारों परिवारों पर उसका असर पड़ रहा है। मजीठिया वेतनमान न देने से न जाने कितने परिवारों का बजट बिगड़ गया है। एक तो चोरी, दूसरे सीनाजोरी। दैनिक जागरण प्रबंधन समझ रहा है कि बड़े-बड़े वकील हायर करके पत्रकारों का हक मार जाएगा। लेकिन यह असंभव है। यह उसकी विपरीत मति है। श्रीरामचरित मानस का ही संदर्भ लें-तव उर कुमति बसी विपरीता। रावण को समझाए जाने का प्रसंग है-रावण को समझाया जाता है कि उसके अंदर विपरीत कुमति बैठ गई है। विपरीत कुमति का मतलब है, ऐसा विचार जो खुद के लिए घातक हो। 

दैनिक जागरण का यह विचार उसके लिए ही घातक सिद्ध होगा कि मजीठिया वेतनमान किसी भी कीमत पर नहीं देंगे, भले ही उसके‍ लिए कितना भी नुकसान क्‍यों न उठाना पड़ जाए। कितने ही बड़े वकीलों को क्‍यों न हायर करना पड़ जाए। लेकिन गलत काम का गलत नतीजा। जिनके बल पर दैनिक जागरण उछल रहा है, उनका भी रिपोर्ट कार्ड यहां दिया जा रहा है।

सबसे पहले आप सतीश मिश्रा साहब को धन्‍यवाद दें। उनके द्वारा की गई उठापटक से कर्मचारियों में जो एकता आई, वह किसी भी प्रयास से नहीं आ सकती थी। आप विष्‍णु त्रिपाठी को धन्‍यवाद देना कभी न भूलें, क्‍योंकि उन्‍हीं की हरकतों का परिणाम है कि मजीठिया मंच गठित हुआ और देश भर के पीड़ित और सताए गए पत्रकार सुप्रीम कोर्ट पहुंच गए। और अब वेतन बढ़ोतरी में उन्‍होंने जो पक्षपात किया है, उसका परिणाम दैनिक जागरण प्रबंधन पर कहीं अधिक भारी पड़ने वाला है। वीरेंद्र मिश्रा और कपिल सिब्‍बल साहब को धन्‍यवाद दिए बिना इस आलेख का समापन उचित नहीं है। इनमें से एक दैनिक जागरण के धन को डुबो रहा है तो दूसरा दैनिक जागरण को कानूनी उलझनों में उलझाता जा रहा है। ये ऐसी उलझनें हैं, जो एक सुप्रतिष्ठित अखबार के लिए आत्‍मघाती कदम साबित हो रही हैं। 

दैनिक जागरण प्रबंधन की बेचैनी का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि कुछ ऐसे लोगों पर दैनिक जागरण प्रबंधन के गुर्गे दबाव बना रहे हैं, जो हिंदी अखबार न पढ़ते हैं और न पढ़ना चाहते हैं। हाकरों और दूसरे पाठकों पर भी दैनिक जागरण पढ़ने के लिए दबाव बनाया जा रहा है, जबकि हालत यह है कि दैनिक जागरण के पाठक, विज्ञापनदाता और शुभचिंतक लगातार टूट रहे हैं। क्‍योंकि दैनिक जागरण में इस समय जो कुछ भी हो रहा है, उसे शुभ तो कतई नहीं कहा जा सकता। उन सभी लोगों को धन्‍यवाद, जो जाने अनजाने दैनिक जागरण प्रबंधन की तानाशाही के विरोध में हैं। धन्‍यवाद इसलिए कि ईश्‍वर धन्‍य है, जो हमेशा अत्‍याचारियों पर नजर रखता है। 

फोर्थपिलर एफबी वॉल से साभार

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