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गांवों में शिक्षा की खराब हालत पर खबर को हिन्दी अखबारों ने ही महत्व नहीं दिया

रुपया डॉलर के ‘बराबर’ था आज 83.14 पर है, ऐसे में राम आएंगे के अखंड कवरेज को भी समझिये

संजय कुमार सिंह

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जो 2014 का चुनाव जीतने से पहले देश के प्रधानसेवक और चौकीदार होने की बात करते थे अब मंदिर-मंदिर कर रहे हैं। हिन्दुस्तान टाइम्स में आज की लीड बताती है कि उन्होंने केरल के गुरुवयूर मंदिर का दौरा किया, परियोजनाएं शुरू कीं। दूसरी ओर, सरकार के काम के नाम पर आप कल डिग्री लेने के लिए ड्रेस कोड तय करने की खबर पढ़ चुके हैं। देश भर में जब लोगों से हनुमान चालीसा और वंदेमात्ररम सुनाने के लिए कहा जाता रहा है तब देश में शिक्षा के सर्वेक्षण की रिपोर्ट आई है जो आज कई अखबारों में पहले पन्ने पर नहीं है। एनुअल स्टेटस ऑफ एजुकेशन रिपोर्ट (एएसईआर) बुधवार को जारी हुई और इसके अनुसार 14 से 18 साल के ज्यादातर ग्रामीण बच्चे कक्षा तीन का गणित नहीं जानते हैं,  25 प्रतिशत से ज्यादा पढ़ नहीं सकते हैं और आधे से ज्यादा को सामान्य भाग देना नहीं आता है।

आज ही खबर है कि, सरकारी थिंक टैंक, नीति आयोग के सीईओ ने कहा है कि सरकारी बजट में सच्चाई छिपाई जाती है और हिन्डबर्ग के खुलासे के लिए उपयुक्त मामला है। दिलचस्प यह है कि रिपोर्टर्स कलेक्टिव ने इसपर पीएमओ का पक्ष जानने के लिए संपर्क किया तो वीडियो हटा दिया गया। खबर कहती है कि प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेन्द्र मोदी ने गुप्त रूप से राज्यों की कमाई कम करने की कोशिश की है।

ऐसे में देश का नंबर वन न्यूज चैनल (न्यूज नहीं होता तो मुझे कोई दिक्कत नहीं थी) अखंड कवरेज में लगा है। बता रहा है, राम आयेंगे। कहने की जरूरत नहीं है कि राम आएंगे यह खबर नहीं, आस्था है पर न्यूज चैनल उसका अखंड कवरेज कर रहे हैं यानी अपना काम नहीं कर रहे हैं या ठीक से नहीं कर रहे हैं अथवा पूरा नहीं कर रहे हैं। मेरी चिन्ता यही है और यहां मैं यही बताने की कोशिश करता हूं और इसके जरिये यह बताना चाहता हूं कि सरकार भी अपना काम ठीक से नहीं कर रही है। आज ही खबर है कि सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अधिकारी हिंसा फैलाने और घृणा फैलाने वाले भाषणों के मामले में सख्त कार्रवाई करे। कहने की जरूरत नहीं है कि अखबार और चैनल भी अपना काम नहीं कर रहे हैं और सरकार उन्हें भी नहीं देख रही है। पर बात इतनी ही नहीं है।

सरकार चैनल के खिलाफ कार्रवाई कर रही है। उनपर रोक की खबरें आती हैं। पत्रकारों के खिलाफ भी कार्रवाई अब ज्यादा हो रही है। पर जो आस्था को खबर बना रहा है वह अखंड कवरेज का प्रचार भी कर रहा है। अव्वल तो ऐसा होना ही नहीं चाहिये और कोई करे तो कम से कम प्रचार से तो बचे। और प्रचार ही कर रहा है तो खबरें भी दे। एएसईआर की खबर के अनुसार डिजिटल पढ़ाई में लड़कों और लड़कियों का अंतर ज्यादा है और गांवों में टेक्नालॉजी तक लड़कियों की पहुंच कम है। यह बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ के नारे के बावजूद है। तथ्य यह है कि नारे के बावजूद बलात्कार होते रहे, यौन शोषण के आरोपियों को बचाया जाता रहा और लड़कियों की उपेक्षा होती रही। अखंड कवरेज राम आएंगे का हो रहा है। उसका प्रचार भी। अफसोस यह कि हिन्दी के मेरे दोनों अखबारों में शिक्षा की हालत से संबंधित खबर पहले पन्ने पर नहीं है। अंग्रेजी के कई अखबारों में लीड है।

हमेशा की तरह मैं फिर कहूंगा कि आम लोगों को यह समझ नही हो सकती है कि उनके लिए पढ़ाई जरूरी है या राम आएंगे की खबर। लेकिन जिन अखबारों ने पहले पन्ने पर मंदिर और भगवान की कई-कई खबरों को जगह दी है उनकी जिम्मेदारी थी कि वे अपने पाठकों को बताते कि मंदिर तो बना है पर शिक्षा की हालत क्या और क्यों है? सरकार अपना काम ठीक कर रही होती और उसके साथ मंदिर भी बना रही होती तो किसी को शिकायत का कोई कारण नहीं था। सरकार की प्राथमिकताएं बिल्कुल अलग है। वह सिर्फ चुनाव जीतने और सत्ता में बने रहने के उपाय कर रही है। संभव है, आम लोगों को यह बात समझ में नहीं आती हो। लेकिन संपादकों को क्यों नहीं समझ आनी चाहिये। वे ऐसी सरकार का समर्थन करके कोई देशभक्ति नहीं कर रहे हैं और राम भक्ति से राम राज्य नहीं आया जो आया उसमें क्या मिल रहा है या क्या नहीं मिल रहा है उसे बताना उनका काम है।

उदाहरण के लिए आज ही खबर है, सरकार ने सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च (सीपीआर) को विदेशी चंदा लेने  पर रोक लगा दी है। खबर की चर्चा करने से पहले यह बताना जरूरी है कि अमर उजाला में इसका शीर्षक है, मणिशंकर (अय्यर) की बेटी के एनजीओ के विदेशी चंदा देने पर रोक लगी। मुझे लगता है कि सीपीआर ऐसा एनजीओ नहीं है कि उसे मणिशंकर अय्यर की बेटी का एनजीओ कहा जाये। जो जानते हैं उसके लिए इस जानकारी का कोई मतलब नहीं है और जो नहीं जानते हैं वो यही समझेंगे कि कांग्रेस नेता की बेटी का एनजीओ है इसलिए कार्रवाई हुई। खबर और कार्रवाई में दिलचस्पी इसके अनुसार होगी जबकि सीपीआर का मामला किसी छोटे-मोटे एनजीओ की तरह नहीं है। यह इतना बड़ा है कि द टेलीग्राफ ने आज इस खबर को लीड बनाया है। टाइम्स ऑफ इंडिया में भी यह सिंगल कॉलम की खबर है। हालांकि, शायद इसी कारण यह खबर हिन्दुस्तान टाइम्स में और छोटी है। जो भी हो, मेरा मानना है कि विदेशी चंदा मुफ्त में देश में आता है इससे काम होता है, नौकरी मिलती है आदि आदि।

सीपीआर 50 साल पुराना अग्रणी थिंक टैंक है संस्थान का कहना है कि उसकी रिसर्च ऑन पॉलिसी एंड पब्लिकेशन रिपोर्ट को करंट अफेयर्स प्रोग्रामिंग के बराबर माना जा रहा है। वेबसाइट के अनुसार, सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च (सीपीआर) के गवर्निंग बोर्ड और इसके अध्यक्ष एरिक गोंसाल्वेस ने 29 अगस्त 2017 को घोषणा की थी नए अध्यक्ष और मुख्य कार्यकारी के रूप में यामिनी अय्यर का चयन किया गया है और वे 1 सितंबर, 2017 से इस पद पर हैं। उनसे पहले प्रताप भानु मेहता 13 साल इस पद पर थे। यामिनी लंदन स्कूल ऑफ इकनॉमिक्स, कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी और सेंट स्टीफंस कॉलेज, नई दिल्ली की पूर्व छात्रा हैं। वह एक टीईडी फेलो और ओपन गवर्नमेंट पार्टनरशिप के अंतर्राष्ट्रीय विशेषज्ञ पैनल की संस्थापक सदस्य हैं। यामिनी विश्व आर्थिक मंच की सुशासन पर वैश्विक परिषद की सदस्य भी रही हैं।

ऐसे में मीडिया इसे मणिशंकर अय्यर की बेटी के एनजीओ के रूप में पेश कर रहा है तो यह उल्लेखनीय है कि सरकार ने योजना आयोग को अपना थिंक टैंक बनाया है और नाम बदलकर उसे नीति आयोग कर दिया है। उसपर मैं यहां पहले लिख चुका हूं। वैसे भी विदेशी चंदे से सरकार का विरोध करना कानूनन गलत हो अनैतिक नहीं है। कानूनन गलत हो तो कार्रवाई की जानी चाहिये पर कार्रवाई चंदा रोकने के लिए की गई है। गैर कानूनी काम के लिए नहीं। सरकार का विरोध लोकतंत्र में जरूरी है और इस सरकार ने भी मनमाने कानून लागू किये जिसे विरोध के बाद वापस लिया गया है। वरना सरकार ने तो कानून लागू कर ही  दिये थे। ऐसे में विरोध गलत नहीं था और अक्सर गलत नहीं होता है। लेकिन उसकी गंजाइश लगातार कम हो रही है। अगर विदेशी पैसे से विरोध हो भी रहा है तो लोगों को काम (विरोध का ही) मिल रहा है और विरोध गलत है तो विरोध के लिये कार्रवाई की जा सकती है जो होती नजर नहीं आ रही है। और सिर्फ चंदा लेना रोक कर असल में विरोध रोकने का उपाय किया जाता है।

अखबार यहां मणिशंकर की बेटी का एनजीओ होने की बजाय उसका पक्ष बताते तो ज्यादा लोकतांत्रिक होते। सरकारी विज्ञापनों पर चलना और सरकार का समर्थन करना अखबारों का काम नहीं है। अगर ऐसा हो रहा है तो अखबारों को सरकारी विज्ञापन तुरंत बंद होने चाहिये। पर कौन करेगा? जहां तक खबरों की बात है, आज अखबारों में एक बड़ी खबर सेनसेक्स क्रैश करने की भी है। इस गिरावट का नुकसान बैंकों को ज्यादा हुआ है। उधर, रुपया दो पैसे गिरकर एक डॉलर के लिए 83.14 पर है (नवोदय टाइम्स) होने की भी खबर है। लेकिन खबर दिखी, चिन्ता या चर्चा सुनी? आपको याद होगा कि जब एक डॉलर 59 रुपये के बराबर था, तब नरेंद्र मोदी ने विपक्ष के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था। स्वर्गीय सुषमा स्वराज का मानना था कि जैसे-जैसे देश की करेंसी गिरती है, वैसे-वैसे देश की प्रतिष्ठा भी कम होती है। हालांकि, करंसी नोटबंदी के कारण भी गिरी। नुकसान हुआ व्यापारियों और बैंकों का। कई बैंक बंद हो गये। जो व्यापारी कर्ज नहीं लौटा पाये उनमें कुछ विदेश भाग गये कुछ जेल पहुंच गये।

दोनों स्थितियों में नुकसान व्यापार का हुआ और सरकार विदेशी चंदे से विरोध रोकने में लगी है। तो पैसे और कम होंगे, रुपया हो या डॉलर। फिर भी, देश का नंबर वन न्यूज चैनल जब राम आएंगे के अखंड कवरेज का प्रचार कर रहा हो और उसकी (आजतक डॉट इन) पुरानी खबर इस प्रकार है, “जुलाई 2013 में भाजपा नेता के तौर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यह ट्वीट किया था कि आजादी के समय 1 रुपया 1 डॉलर के बराबर था। एक बार फिर रुपये में गिरावट का दौर शुरू हो गया है। आज रुपया फिर डॉलर के मुकाबले 69 रुपये के स्तर पर पहुंच गया है। ऐसे में एक बार‍ फिर 1 रुपया 1 डॉलर के बराबर के दावे की चर्चा होने लगी है। लेकिन क्या सच में ऐसा था? पहले तो इस दावे की पुष्ट‍ि के लिए कोई डाटा मौजूद नहीं है। दूसरी बात यह है कि आजादी से लेकर 1966 तक भारतीय रुपये की वैल्यू डॉलर नहीं, बल्क‍ि ब्रिट‍िश पाउंड के मुकाबले आंकी जाती थी।  सेंटर फॉर सिव‍िल सोसायटी की तरफ से रुपये के डिवैल्यूवेशन (मुद्रा की वैल्यू कम करना) पर एक पेपर तैयार किया गया है। इस पेपर के मुताबिक ब्रिटिश करंसी 1949 में डिवैल्यू हुई थी। इसके बाद 1966 में भारतीय मुद्रा यानी रुपया की वैल्यू यूएस डॉलर के मुकाबले आंकी जाने लगी। इस दौरान ड‍िवैल्यूवेशन के बाद रुपया 1 डॉलर के मुकाबले 7.50 रुपये के स्तर पर पहुंच गया था। 1947 में 1 रुपया एक डॉलर के बराबर था। इस दावे पर इसलिए भी विश्वास करना संभव नहीं है क्योंकि 1947 में जब भारत आजाद हुआ, तो उसने दूसरे देशों से कोई कर्ज नहीं लिया था। ट्रेड भी ना के बराबर था। ऐसे में ये सभंव ही नहीं है कि 1 रुपये 1 डॉलर के बराबर रहा हो। फिर भी खबर तो खबर है और जब ऐसी खबरें नहीं करनी हो तो राम आएंगे ही खबर है।

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