एक राष्ट्र-एक भाषा का समाधान गांधी दर्शन में

डॉ अर्पण जैन ‘अविचल’

भारत विभिन्नताओं में एक एकता के सूत्र से संचालित राष्ट्र है, जहाँ बोली, खानपान, संस्कृति, समाज एवं जातिगत व्यवस्थाओं का जो ताना-बाना बना हुआ है वह अनेकता में एकता के दर्शन करवाता हैं। ऐसे में हिंदी दिवस के दिन विज्ञान भवन से भारत के वर्तमान गृहमंत्री अमित शाह द्वारा एक राष्ट्र-एक भाषा के महत्व को दर्शाते हुए एक राय रखी जिसकी आज आवश्यकता भी है और अनिवार्यता भी। क्योंकि आज विश्व में भारत एक ऐसा देश है जिसकी एक प्रतिनिधि भाषा नहीं हैं। और भाषा के रूप में हिन्दी जनमानस की स्वीकार्य भाषा है यह भी कटु सत्य हैं।

एक देश – एक भाषा की मांग एक लम्बे समय से इस भारत भूमि पर उठाई जा रही है किन्तु तथाकथित राजनैतिक कारणों के चलते हमेशा ही ठन्डे बस्ते में इस मांग को डाल दिया जाता हैं। जबकि भाषा के समावेशी संघर्ष को अपना स्थान दिलाने के लिए प्रतिबद्धता से यदि किसी लड़ाई की शुरुआत हुई तो वह सन १९१८ के मार्च की २८ तारीख थी जब मोहनदास करमचंद गाँधी यानी महात्मा गाँधी ने मध्यप्रदेश के इंदौर में हिंदी साहित्य समिति भवन की नींव रखते हुए इसे राष्ट्रभाषा बनाने का संकल्प लिया था।

स्वाधीनता संघर्ष के दौरान ही भारतीय जनता यह चाहने लगी थी कि हमारा राष्ट्र स्वतंत्र हो और हमारा अपना, खुद का शासन हो। तब उसके साथ-साथ अपनी भाषा को उचित स्थान देने के लिए भी वह जागृत होने लगी। उसे यह विदित होने लगा कि शारीरिक दासता की अपेक्षा मानसिक गुलामी अधिक भयंकर एवं घातक होती है। इस अनुभूति के कारण ही आधुनिक काल में अहिन्दी-भाषियों ने हिन्दी को राष्ट्रभाषा के रूप में प्रतिष्ठापित करने में अपना जीवन स्वाहाकर दिया। क्या इस बात का कोई महत्त्व नहीं है कि बह्म समाज के नेता बंगला-भाषी केशवचंद्र सेन से लेकर गुजराती भाषा-भाषी स्वामी दयानंद सरस्वती ने जनता के बीच जाने के लिए ‘जन-भाषा’, ‘लोक- भाषा’ हिन्दी सीखने का आग्रह किया और गुजराती भाषा-भाषी राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने मराठी-भाषा-भाषी चाचा कालेलकर जी को सारे भारत में घूम-घूमकर हिन्दी का प्रचार-प्रसार करने का आदेश दिया।

सुभाषचंद्र बोस की ‘आजाद हिन्द फौज’ की राष्ट्रभाषा हिन्दी ही थी। श्री अरविंद घोष हिन्दी-प्रचार को स्वाधीनता-संग्राम का एक अंग मानते थे। नागरी लिपि के प्रबल समर्थक न्यायमूर्ति श्री शारदाचरण मित्र ने तो ई. सन् 1910 में यहां तक कहा था – यद्यपि मैं बंगाली हूं तथापि इस वृद्धावस्था में मेरे लिए वह गौरव का दिन होगा जिस दिन मैं सारे भारतवासियों के साथ, ‘साधु हिन्दी’ में वार्तालाप करूंगा। बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय और ईश्वरचंद्र विद्यासागर ने भी हिन्दी का समर्थन किया था। इन अहिन्दी-भाषी-मनीषियों में राष्ट्रभाषा के एक सच्चे एवं सबल समर्थक हमारे पोरबंदर के निवासी साबरमती के संत राष्ट्रपिता महात्मा गांधी थे।

हमारे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को इस बात का अत्यधिक सदमा था कि भारत जैसे बड़े और महान राष्ट्र की कोई राष्ट्रभाषा नहीं है। अत: राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने विखंडित पड़े संपूर्ण भारत को एकसूत्र में बांधने के लिए, उसे संगठित करने के लिए एक राष्ट्रभाषा की आवश्यकता का अहसास करते हुए कहा था – ‘राष्ट्रभाषा के बिना राष्ट्र गूंगा है।’ उन्होंने भारत वर्ष के इस गूंगेपन को दूर करने के लिए भारत के अधिकतम राज्यों में बोली एवं समझी जाने वाली हिन्दी भाषा को उपयुक्त पाकर संपूर्ण भारत की राष्ट्रभाषा के रूप में प्रतिष्ठित, स्थापित किया। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के समान बंगाल के चिंतक आचार्य श्री केशवचंद्र सेन ने भी ‘सुलभ-समाचार’ पत्रिका में लिखा था- ‘अगर हिन्दी को भारतवर्ष की एकमात्र भाषा स्वीकार कर लिया जाय तो सहज में ही यह एकता सम्पन्न हो सकती है।’ अर्थात् हिन्दी ही खंड़ित भारत को अखंड़ित बना सकती है।

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी विखंडित भारत राष्ट्र को अखंडित बनाने के लिए राष्ट्रभाषा के सच्चे एवं प्रबल समर्थक तो थे लेकिन पराधीनता के समय में, अंग्रेजी के प्रचार-प्रसार के युग में उनके दिमाग में राष्ट्रभाषा की संकल्पना निश्चित थी। अपने इसी दर्शन के कारण ही राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने गुजरात-शिक्षा-सम्मेलन के अध्यक्षीय-पद से राष्ट्रभाषा के प्रसंग में प्रवचन देते हुए राष्ट्रभाषा की व्याख्या स्पष्ट की थी। दूसरे शब्दों में कहें तो राष्ट्रभाषा का लक्षण स्पष्ट किया था। राष्ट्रपिता गांधीजी के शब्दों में देखिए – ‘राष्ट्रभाषा वही हो सकती है जो सरकारी कर्मचारियों के लिए सहज और सुगम हो। जो धार्मिक, आर्थिक और राजनीतिक क्षेत्र में माध्यम भाषा बनने की शक्ति रखती हो। जिसको बोलने वाला बहुसंख्यक समाज हो, जो पूरे देश के लिए सहज रूप से उपलब्ध हो। अंग्रेजी किसी तरह से इस कसौटी पर खरी नहीं उतर पाती।’ इस प्रकार राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने तत्कालीन अंग्रेजी-शासनकाल की अंग्रेजी-भाषा की तुलना में एकमात्र हिन्दी-भाषा में ही राष्ट्रभाषा, संपर्क भाषा (लिंक लेंगवेज) एवं राजभाषा होने के सामर्थ्य का दर्शन किया था।

महात्मा गांधी ने राष्ट्रभाषा के इस सामर्थ्य- राष्ट्र के जन-जन को एक करने की शक्ति, बहुजन समाज की ‘जनभाषा’ होने के कारण ही दक्षिण अफ्रिका के प्रवास दौरान ही राष्ट्रभाषा-समस्या पर व्यवस्थित रूप से सोच लिया था और उन्होंने घोषणा भी कर दी थी- स्वराज करोड़ों भूखे मरने वालों का, करोड़ों निरक्षरों का, निरक्षर बहनों और दलितों और अन्त्यजों का हो और उनके लिए तो हिन्दी ही एकमात्र राष्ट्रभाषा हो सकती है, करोड़ों लोगों को अंग्रेजी की शिक्षा देना उन्हें गुलामी में डालने जैसा है। मैकाले ने शिक्षा की जो बुनियाद डाली थी वह सचमुच गुलामी की बुनियाद थी।

गाँधी जी के अनुसार राष्ट्रभाषा राष्ट्र की अखंडितता की तो नींव है लेकिन वे उसे स्वतंत्रता प्राप्ति का माध्यम भी समझते थे। मैकाले ने ही अंग्रेजी-शिक्षा के प्रचार के द्वारा भारतीयों को मानसिक स्तर पर परतंत्र बनाने का श्री गणेश किया था। भारतीयों को इस वैचारिक परतंत्रता में से बाहर निकालने के लिए हमारे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने ई. सनॅ 1918 में हिन्दी साहित्य-सम्मेलन के अध्यक्ष बनकर ही अहिन्दी-भाषी प्रदेशों में हिन्दी-भाषा के प्रचार-प्रसार की एक विस्तृत आयोजना की। जिसके कार्यान्वय की शुरुआत उन्होंने अपने घर से करते हुए बेटे देवदास को ई.सन् 1918 में शिक्षकों के एक दल के साथ दक्षिण भारत भेजा था। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने स्वयं दक्षिण-भारत का प्रवास करके, वहां के लोगों में राष्ट्रभाषा के प्रति जागृति लाने के अनेक प्रयत्न किये थे। दूसरे शब्दों में कहें तो संपूर्ण दक्षिण-भारत प्रदेश में राष्ट्रभाषा-आंदोलन चलाया था।

इस राष्ट्रभाषा-आंदोलन में सफलता की कम संभावना देखते हुए उन्होंने खुद अपने प्रचारक को ढाढ़स बंधाते हुए एक पत्र में लिखा था – ‘जब तक तमिल प्रदेश के प्रतिनिधि सचमुच हिन्दी के बारे में सख्त नहीं बनेंगे, तब तक महासभा में से अंग्रेजी का बहिष्कार नहीं होगा। मैं देखता हूं कि हिन्दी के बारे में करीब-करीब खादी के जैसा हो रहा है। वहां जितना संभव हो, आंदोलन किया करो। आखिर में तो हम लोगों की तपस्या और भगवान की जैसी मरजी होगी वैसा ही होगा।’ इस प्रकार राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का दक्षिण भारत के राज्यों में राष्ट्रभाषा के आंदोलन में सफलता की कम संभावना रहने पर वे निरुत्साहित नहीं हुए।

लेकिन उन्होंने बड़े उत्साह, आदर और गौरव से ई. सन्. 1920 में ‘गुजरात विद्यापीठ’ की स्थापना अहमदाबाद में की थी। इस राष्ट्रीय संस्था द्वारा हिन्दी को राष्ट्रभाषा के रूप में प्रतिष्ठापित करने के लिए अनेक रचनात्मक कार्य किये गये थे। संपूर्ण भारत में स्नातक-स्तर पर अनिवार्य विषय हिन्दी का प्रारंभ इस राष्ट्रीय विश्वविद्यालय से हुआ था। आज भी यह विश्वविद्यालय हिन्दी की विभिन्न परीक्षाएं, बी.ए., एम.ए., बी.एड., एम.फील., पीएच.डी. के शोधकार्य के द्वारा गुजरात जैसे अहिन्दी भाषी प्रदेश में हिन्दी का प्रचार-प्रसार कर रहा है। इतना ही नहीं, यहां डॉ. अम्बाशंकर नागरजी की अध्यक्षता में हिन्दी के साथ-साथ अन्य भारतीय-भाषाओं के विषय में अध्ययन-अध्यापन-शोध-कार्य हो रहा है। लगता है कि अकेली राष्ट्रभाषा सभी भारतीय भाषाओं को यहां खींचकर लायी है। इस प्रकार कह सकते हैं कि गुजरात विद्यापीठ के स्थापक के रूप में एवं उसमें वर्तमान में हो रहे राष्ट्रभाषा के कार्य को लेकर कुलपति महात्मा गांधीजी आज भी हमारे मध्य विद्यमान, प्रस्तुत हैं।

गाँधी जी ने पराधीन भारत में हिन्दू-मुस्लिम में भाषा-भेद (हिन्दी-उर्दू) मिटाकर ऐक्य स्थापित करने के लिए ‘राष्ट्रभाषा’ के लिए ‘हिन्दुस्तानी’ शब्द का प्रयोग किया था। आपका ‘हिन्दुस्तानी’ शब्द-प्रयोग से अभिप्राय हिन्दुस्तान के जन-जन को जोड़ने वाली भाषा से ही था। इस ‘हिन्दुस्तानी’ के द्वारा ही उन्होंने जातिगत समन्वय का, हिन्दू-मुस्लिम ऐक्य का जबरदस्त प्रयत्न किया था। इस प्रकार राष्ट्रभाषा के प्रचार-प्रसार में, राष्ट्रभाषा की राष्ट्रीय समस्या के समाधान में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का अपूर्व योगदान रहा है। वे हमेशा राष्ट्रभाषा को राष्ट्रीय-गौरव, सांस्कृतिक समन्वय, राष्ट्रीय-अखंडितता की परिचायक मानते थे।

हिन्दी के सवाल को गांधी जी केवल भावनात्मक दृष्टि से ही महत्वपूर्ण नहीं मानते थे, अपितु उसे एक राष्ट्रीय आवश्यकता के रूप में भी देखने पर जोर देते थे। 10 नवम्बर, 1921 के ‘यंग इण्डिया’ में उन्होंने लिखा हिन्दी के भावनात्मक अथवा राष्ट्रीय महत्व की बात छोड़ दें तो भी यह दिन प्रतिदिन अधिकाधिक आवश्यक मालूम होता जा रहा है कि तमाम राष्ट्रीय कार्यकर्ताओं को हिन्दी सीख लेनी चाहिए और राष्ट्र की तमाम कार्यवाही हिन्दी में ही की जानी चाहिए। इस प्रकार असहयोग आंदोलन के दौरान गांधी जी ने पूरे देश में हिन्दी का राष्ट्रभाषा के रूप में प्रचार काफी जोरदार ढंग से किया और उसे राष्ट्रीय एकता, अखण्डता, स्वाभिमान का पर्याय-सा बना दिया।

उन्होंने अपने पुत्र देवदास गांधी को हिन्दी-प्रचार के लिए दक्षिण भारत भेजा था। दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा की स्थापना उन्हीं की परिकल्पना का परिणाम है। उन्होंने वर्धा में राष्ट्रभाषा प्रचार समिति की स्थापना हिन्दी के प्रचार-प्रसार के उद्देश्य से ही की थी तथा जन-नेताओं को भी हिन्दी में कार्य करने के लिए प्रेरित और प्रोत्साहित किया था। उनकी प्रेरणा के ही परिणाम स्वरूप हिन्दीतर भाषा-भाषी प्रदेशों के स्वतंत्रता संग्राम के ने हिन्दी को सीख लिया था और उसे व्यापक जन-सम्पर्क का माध्यम बनाया था।

जब भारत को स्वतंत्रता मिली ही थी। देश-विदेश के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं के पत्रकार इस महत्वपूर्ण घटना के प्रकाशन हेतु भारतीय नेताओं के वक्तव्य, संदेश आदि के लिए आ रहे थे। ऐसे माहौल में एक विदेशी पत्रकार महात्मा गांधी से मिला। उसने बापू से अपना संदेश देने को कहा। किंतु वह इस बात पर अड़ रहा था कि बापू अपना संदेश अंग्रेजी में दें। गांधीजी इसके लिए सहमत नहीं हो रहे थे। मगर पत्रकार था कि लगातार जिद कर रहा था। उसका कहना था कि संदेश भारतीयों के लिए नहीं, पूरी दुनिया के लिए है, इसलिए वह अंग्रेजी में ही बात कहें। उन दिनों बापू हिन्दी का राष्ट्रभाषा के रूप में प्रचार भी कर रहे थे। थोड़ी देर तक वह शांत बने रहे, मगर अंततः पत्रकार की बात पर महात्मा गांधी ने उसे दो टूक उत्तर देते हुए कहा- दुनिया से कह दो कि गांधी अंग्रेजी नहीं जानता।

गांधी के अभियान का नतीजा यह हुआ कि उत्तर प्रदेश, बिहार और अन्य क्षेत्रों के साहित्यकार जनपदीय भाषा को भूलकर राष्ट्रभाषा के रूप में हिन्दी के विकास में अपनी कलम चलायी। प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद, सुमित्रानंदन पंत, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, आचार्य रामचंद्र शुक्ल, हजारी प्रसाद द्विवेदी आदि ने हिन्दी को राष्ट्रीय धर्म के रूप में अपनाया। बिहार में भी आचार्य शिवपूजन सहाय, राधिकारमण सिंह, रामवृक्ष बेनीपुरी, लक्ष्मी नारायण सुधांशु, नार्गाजुन, फणीश्वरनाथ रेणु आदि ने भी अपनी क्षेत्रीय बोलियों के मोह से उपर उठकर हिन्दी के विकास मंी योगदान देना अपना राष्ट्रीय धर्म समझा।

वर्तमान युग के राष्ट्रीय जनजीवन के व्यावहारिक एवं शैक्षिक स्तर के संदर्भ में सोचा जाय कि – क्या हिन्दी हमारी राष्ट्रभाषा है? इस प्रश्न के उत्तर के रूप में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी द्वारा दिये गये राष्ट्रभाषा के लक्षण के संदर्भ में कह सकता हूं कि इसे बोलने वाले लोग भारत के एक तिहाई हिस्से में बसते हैं। लेकिन हर प्रदेश के लोग अपनी प्रादेशिक-भाषा में व्यवहार करते हैं। हिन्दी राष्ट्रभाषा के स्थान पर उसी समय आसीन होगी जब जनता के स्तर पर वह सम्पर्क, व्यावहारिक भाषा बन जाय। अर्थात् एक प्रदेश का निवासी दूसरे प्रदेश से मिले तो वह अंग्रेजी आदि का प्रयोग न कर हिन्दी का प्रयोग करे। तामिल-भाषी बंगाली से मिलने पर या पंजाबी मलयाली से मिलने पर या मराठी गुजराती से मिलने पर आपसी व्यवहार, विचार-विनिमय हिन्दी में करे। इस प्रकार राष्ट्रीय जीवन में हिन्दी व्यावहारिक-संपर्क की महत्त्वपूर्ण कड़ी बनने पर ही राष्ट्रभाषा बन सकती है और इससे ही राष्ट्रपिता को सच्ची श्रद्धांजलि अर्पित हो सकती है।

लेखक डॉ अर्पण जैन ‘अविचल’ इंदौर के पत्रकार और स्तंभकार हैं. संपर्क : ०७०६७४५५४५५ : arpan455@gmail.com

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