गोएबल्स की संतानें बनाम ब्रांड मोदी का शोर

इतिहास अपने आपको दोहराने के साथ कुछ समानताएं भी लाता है। भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को अमूमन उन्हीं की पार्टी के लोगों से लेकर मीडिया और तमाम विश्लेषकों द्वारा तानाशाह भी निरुपित किया जाता रहा है। हालांकि इसमें भी कोई शक नहीं कि भारत में जो कुव्यवस्थाएं हैं उसके लिए किसी आपातकाल या तानाशाह की जरूरत ही महसूस की जाती रही है। वैसे तो दुनिया भर में तानाशाह के रूप में जो व्यक्ति कुख्यात रहा उसका नाम अडोल्फ हिटलर है, जिसका प्रचार मंत्री गोएबल्स हुआ करता था। उसका कहना यह था कि किसी भी झूठ को 100 बार अगर जोर से बोला जाए तो वह अंतत: सच लगने लगता है…

कमोवेश यही स्थिति आज भारत में नजर आ रही है। अच्छे दिनों का धुआंधार नारा देकर सरकार बनाने वाली भाजपा ने किसी जादूगर हुडनी की तरह ही जनता की समस्याएं छूमंतर कर देने का दावा और वायदा 56 इंच के सीने के साथ ठोंका था। यह बात अलग है कि अभी तक जनता को वे अच्छे दिन महसूस नहीं हो रहे हैं जिसे करवाने के लिए पूरी भाजपा और उसकी केन्द्र सरकार इन दिनों फिर पब्लिसिटी मोड में नजर आ रही है। तमाम पत्रकार वार्ताओं, रैलियों, जनसभाओं और विज्ञापनों तथा प्रायोजित मीडिया कवरेज के जरिए यह साबित किया जा रहा है कि अच्छे दिन शुरू हो चुके हैं। यह भी विचारणीय प्रश्न है कि देश की जनता को यह फील गुड यानि अच्छा अनुभव करवाने के लिए पूरी भाजपा ब्रिगेड मैदान में उतर गई है… अरे भाई अगर अच्छे दिन आ गए तो वे खुद ब खुद जनता को महसूस हो ही जाएंगे, उसके लिए इतना शोर मचाने की जरूरत क्यों पड़ रही है? ब्रांड मोदी का जलवा अभी भी नि:संदेह कायम है मगर उस ब्रांड की नींव में दरारें भी पडऩे लगी हैं और इस सच को शोर मचाने वाली गोएबल्स की संतानों को नहीं भूलना चाहिए… 

आज से ठीक एक साल पहले नरेन्द्र मोदी ने प्रधानमंत्री पद का कार्यभार संभाला और इसमें कोई शक नहीं कि वे भारत के अत्यंत लोकप्रिय प्रधानमंत्री के रूप में स्थापित भी हुए और चुनाव प्रचार अभियान का कुशल और आक्रामक नेतृत्व भी उन्होंने किया। ये देश के इतिहास में किसी भी राजनीतिक पार्टी के लिए अध्ययन का विषय हो सकता है कि किस तरह जबरदस्त मार्केटिंग की बदौलत किसी एक व्यक्ति विशेष को इस तरह सबसे बड़े ब्रांड के रूप में स्थापित किया जा सकता है। इसमें भी कोई शक नहीं कि नरेन्द्र मोदी में क्षमताएं नहीं हैं और वे भारत को एक विकसित राष्ट्र नहीं बना सकते, बल्कि सच यह है कि वर्तमान राजनीति में जितने भी सक्रिय चेहरे हैं उनमें श्री मोदी ना सिर्फ अव्वल हैं, बल्कि काबिल भी। मगर दिक्कत यह है कि उन्हें अपने लगातार प्रवचन देने और खुद को ही श्रेष्ठ बताने के अहंकार से बाहर निकलना पड़ेगा। आजादी के इन 68 वर्षों में देश की हालत इतनी जर्जर और बदतर हो चुकी है कि उसका कायाकल्प 365 दिन तो क्या आने वाले कई वर्षों में भी नहीं किया जा सकता, क्योंकि भारत विविधताओं वाला अजीब से लोकतंत्र का देश है। विदेशों से इसकी तुलना नहीं की जा सकती और खासकर चीन के साथ तो कतई नहीं, जहां पर लोकतंत्र की बजाय तानाशाही है। इसके उलट भारत में हर चीज का विरोध जोर-शोर से शुरू हो जाता है। नरेन्द्र मोदी के एक साल के कार्यकाल का आंकलन करते हुए फिलहाल तो यही नजर आता है कि देश में पहले चुप रहने वाला प्रधानमंत्री 10 साल तक देखा और भोगा, तो अब सिर्फ बोलने और बोलने वाला ही प्रधानमंत्री दिख रहा है। मोदी के पास विजन और काम करने की मेहनत – दृढ़ता में कोई कमी नहीं है मगर असल दिक्कत देश के राजनीतिक ढांचे से लेकर मीडिया तक की है। इसमें भी कोई दो मत नहीं कि मोदीजी ने देश और दुनिया में भारत के नाम का डंका जोर-शोर से बजाया और लोगों को ये भरोसा भी दिलाया कि आज नहीं तो कल अच्छे दिन आ ही जाएंगे। हालांकि उन्हें एक बड़ी सुविधा यह मिली हुई है कि विपक्ष अत्यंत लचर व कमजोर है। आज भले ही कांग्रेसी राहुल गांधी के कथित नए अवतार को लेकर तालियां पीटे या मीडिया भी कंधे पर उठाए फिरे, बावजूद इसके राहुल गांधी में वो क्षमता सिरे से ही नदारद है जिसके चलते वे तमाम अन्य मुद्दों पर मोदी सरकार को तार्किक  तरीके से घेर सकें। गरीबों या किसानों की बात करते हुए सूट-बूट की सरकार का नारा भी ज्यादा दिन तक नहीं चलेगा। अगर वे महंगाई से लेकर अन्य तमाम मोर्चों पर मोदी सरकार को घेरने में सफल साबित नहीं हुए तो यह भी तय मानिये कि आने वाले चुनावों में भी कांग्रेस का भविष्य बहुत अधिक उज्ज्वल नजर नहीं आता। अरविंद केजरीवाल ही नरेन्द्र मोदी को कड़ी चुनौती देने का माद्दा रखते हैं तो पहले तो उनके घर में ही फूट डलवा दी और प्रशांत भूषण से लेकर योगेन्द्र यादव को बाहर करवाया और अब नई दिल्ली में भी नित नए हथकंडे अपनाकर केजरीवाल को परेशान किया जा रहा है। दरअसल राहुल की तुलना में केजरीवाल को मुद्दों की कई गुना अधिक समझ है। जिस तरह मनरेगा पर बोलते हुए श्री मोदी ने संसद में छाती ठोंककर कहा था कि उन्हें राजनीति की जबरदस्त समझ है, लेकिन कांग्रेस के राहुल गांधी के पास इस समझ का जबरदस्त अभाव है और तुलनात्मक तरीके से यह समझ अरविंद केजरीवाल में कई गुना अधिक नजर आती है। यही कारण है कि उनके खिलाफ मीडिया से लेकर पूरी केन्द्र सरकार ने मोर्चा सुनियोजित तरीके से खोल रखा है। फिलहाल तो मोदी सरकार का एक साल वैसे ही बीत गया, जैसे एक अस्त-व्यस्त घर की बिखरी हुई चीजों को उसका मुखिया जैसे-तैसे समटने का प्रयास करता है। अब बचे 4 साल में अगर मोदीजी संत-महात्माओं की तरह प्रवचन देना बंद कर ठोस मैदानी काम पर अधिक जोर देंगे तो इन 5 सालों के बाद के अगले 5 साल भी उन्हीं के रहेंगे।

सूट-बूट की सरकार में आखिर क्या है आपत्ति?

भारत की राजनीति नारों और बयानों में ही चलती है। अब तो महामारी की तरह यह बीमारी फैल गई है। कोई भी राजनेता एक बयान देता है और फिर विपक्षी उस पर पलटवार करते हैं और इन बयानों को ब्रेकिंग न्यूज के रूप में 24 घंटे के फुर्सतिया न्यूज चैनल दिखाया करते हैं। यह अलग बात है कि दिन-दिन भर इन बयानों पर चर्चा करने के बाद भी देश को कुछ हासिल नहीं हो पाता, सिवाय सुर्खियों के। अभी भूमि अधिग्रहण व अन्य मुद्दों पर कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी ने मोदी सरकार को सूट-बूट की सरकार बताया है। अब देशभर में घूमकर भाजपाई इस बयान का रोजाना खंडन करते नजर आ रहे हैं, लेकिन यह समझ नहीं आता कि आखिर सूट-बूट की सरकार कहलाने में आपित्त क्या है? ये तो प्रगति और स्मार्टनेस का प्रतीक ही है। सूट-बूट सफल और आर्थिक रूप से सम्पन्न व्यक्ति ही पहनता है और तमाम सरकारों का यह पहला कर्तव्य है कि वह अपने नागरिकों को सफल और सम्पन्न बनाएं। क्या कांग्रेस यह चाहती है कि देश की जनता अभी भी चीथड़ों में ही नजर आए? भाजपा को बजाय इस पर सफाई देने के डंके की चोट पर इसे स्वीकार करना चाहिए, क्योंकि सूट-बूट की सरकार ही नागरिकों को सूट-बूट पहना सकती है।

जो बोया वही तो काट रही है अब भाजपा

आज भाजपा यह आरोप लगाती है कि कांग्रेस सहित अन्य विपक्षी दल देश की प्रगति में रोड़ा बने हुए हैं और खासकर राज्यसभा में चूंकि भाजपा के पास बहुमत नहीं है इसलिए हर अच्छे विधेयक को मंजूर करने से रोका जा रहा है। भूमि अधिग्रहण से लेकर कई मुद्दों पर भाजपा को सड़क से संसद तक तीखा विरोध सहना पड़ रहा है और उस पर गरीब तथा किसान विरोधी होने का ठप्पा अलग लग गया, मगर इसके लिए आज भाजपा को कपड़े फाडऩे की कतई जरूरत नहीं है, क्योंकि विपक्ष में रहकर उसने भी कमोबेश यही किया। हर मुद्दे पर उसने तत्कालीन प्रधानमंत्री से लेकर मंत्रियों पर तीखे हमले बोले और उनसे इस्तीफे भी मांगते रहे। इसी भूमि अधिग्रहण कानून का भाजपा ने विपक्ष में रहते हुए समर्थन किया था और एफडीआई सहित अन्य मुद्दों पर भी भाजपा ने यू-टर्न मार लिया। विदेशों में जमा काले धन के मामले में तो भाजपा पूरी तरह एक्सपोज हो ही गई, वहीं राम मंदिर, धारा 370, समान नागरिक संहिता जैसे अपने बुनियादी मुद्दों पर भी बात नहीं कर रही है, जबकि इन तमाम मुद्दों पर विपक्ष में रहते हुए वह अत्यंत मुखर रही है और अपने एक साल के कार्यकाल को भ्रष्टाचार मुक्त और पारदर्शी भी बता रही है, जबकि मनमोहन सिंह का कार्यकाल भी 5 साल का बेदाग था इसलिए जनता ने दूसरी बार कांग्रेस की सरकार केन्द्र में बनवाई। वो तो सातवें-आठवें साल में कोयला, स्पैक्ट्रम और राष्ट्रमंडल खेलों जैसे तमाम घोटाले सामने आए, जिसको भाजपा ने जमकर भुनाया और इसमें अन्ना हजारे के जन लोकपाल आंदोलन का भी बड़ा हाथ रहा। आज भाजपा वही फसल काट रही है जो उसने विपक्ष में रहते हुए बोई थी यानि सिर्फ विरोध करने के लिए ही विरोध करना।

कांग्रेस को किसने रोका मार्केटिंग करने से

पिछले कई सालों से कांग्रेस यह रोना रोती रही है कि भाजपा और उससे जुड़े संगठन जोरदार मार्केटिंग करते हैं। बात सही भी है और जमाना पब्लिसिटी तथा मार्केटिंग का ही है। तमाम विधानसभा चुनावों और लोकसभा चुनाव में भी भाजपा ने आक्रामक मार्केटिंग की, जिसकी बदौलत जनता ने उसे पूर्ण बहुमत भी दे डाला। सोशल मीडिया पर भी भाजपा सक्रिय रही और कांग्रेस को जबरदस्त तरीके से बदनाम किया गया, लेकिन कांग्रेस के तमाम मठाधीशों को इसकी समझ आज तक नहीं आई। परम्परागत प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के अलावा सोशल मीडिया का इस्तेमाल करना कांग्रेस को अभी भी नहीं आया और बार-बार वह मार्केटिंग का आरोप खिसयानी बिल्ली खम्भा नोंचे की तर्ज पर भाजपा पर लगाती है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि भाजपा से बड़ी और पुरानी पार्टी कांग्रेस रही है। उसे आखिर मार्केटिंग करने से किसने रोका है?

कारोबारियों को एक इंच भी जमीन नहीं तो फिर मेक इन इंडिया कैसे?

अभी भूमि अधिग्रहण कानून के चलते मोदी सरकार पर गरीब और किसान विरोधी होने का ठप्पा लग गया है और इसे लगवाने में खुद मोदी सरकार भी कम दोषी नहीं है। यह अजीब विरोधाभास है कि एक तरफ भाजपा मेक इन इंडिया का नारा देती है और दूसरी तरफ यह भी खुलेआम घोषणा करती है कि देश के किसी भी कारोबारी को एक इंच जमीन अधिग्रहित करके नहीं दी जाएगी। अब यहां पर सवाल यह है कि क्या कारोबारी हवा में उद्योग धंधे स्थापित करेंगे और मेक इंडिया का सपना साकार कैसे होगा? भाजपा को उलटे मोदीजी वाले 56 इंच के सीने का कम से कम इस मामले में इस्तेमाल कर लेना चाहिए था और छाती ठोंककर बोलना था कि कारोबारियों को जमीन प्रोजेक्ट की जरूरत के मुताबिक उपलब्ध करवाई जाएगी और कांग्रेस का भूमि अधिग्रहण कानून अत्यंत अव्यवहारिक और जटील था, जिसके चलते जनहित के अलावा निजी प्रोजेक्टों के लिए भी जमीनें नहीं ली जा सकती इसीलिए इस कानून की ऐसी कमियोंं को दूर किया गया है। देश भर में तमाम राज्य और केन्द्र सरकारें ही कारोबारियों को तमाम साधन-संसाधन, सुविधाएं और जमीनें मुहैया कराती रही है। आज अगर गुजरात में रिलायंस से लेकर टाटा और अडानी के विशाल कारोबार स्थापित हैं तो वे हवा में नहीं चल रहे, बल्कि उन्हें हजारों एकड़ जमीनें गुजरात सरकार ने आवंटित की है और यह बिना अधिग्रहण के नहीं हो सकता। इसलिए भाजपा को बजाय यह कहने कि किसी कारोबारी को एक इंच जमीन नहीं देंगे, उल्टा यह बोलना चाहिए कि मेक इन इंडिया को साकार करने के लिए अधिग्रहण जरूरी है, बल्कि भाजपा के इन बयानों से तो देश का कारोबारी जगत् खुद भौंचक है और यही कारण है कि तमाम आर्थिक जानकार और कारोबारी भी एक साल के सुधारों से खुश नहीं हैं और भूमि अधिग्रहण को लेकर चल रहे विरोध के तमाशे से तो कारोबारी और हताश ही होंगे।

राजेश ज्वेल संपर्क – 9827020830, jwellrajesh@yahoo.co.in

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