सच ये है कि मोदी अब एक ब्रैंड में बदल गए हैं : राणा यशवंत

उत्तर प्रदेश से जो जनादेश है उसका चाहे जितना पोस्टमार्टम कर लें, खुद बीजेपी के लिये भी ये समझ पाना मुश्किल है कि ऐसा हुआ कैसे! लेकिन सुनामी आई और इसने कई जकड़बंदियों, राजनीतिक रिवाजों, फरेब के हवाईकिलों और बेहूदगियों-बदज़ुबानियों को ध्वस्त कर दिया. सामाजिक न्याय के नाम पर जातियों को अपनी जागीर बनानेवाले नेताओं के लिये ये जनादेश एक सबक है. कानून-व्यवस्था और सड़क-बिजली जैसी बुनियादी जरुरतों की जगह एक्सप्रेस-वे और स्मार्ट फोन देने की राजनीति के लिये ये जनादेश एक सबक है.

दलितों के नाम पर लगातार मालदार-महलदार होते जाने और हाशिए पर खड़े समाज के भविष्य को बाबा साहेब और हाथियों की मूर्तियों से जकड़ देने के खतरनाक खेल के लिये ये जनादेश एक सबक है. और यही सारे सबक मोदी या फिर यूपी की नई सरकार के लिये संदेश भी है. संदेश, विरोध की बेलगाम-बदजुुबान राजनीति करनेवाले लोगों और किसी पार्टी या विचारधारा (वैसे ये बस कहने के लिये है) की पट्टी बांधे पत्रकारों के लिये भी है.

सच ये है कि मोदी अब एक ब्रैंड में बदल गए हैं. बाजार में आप कोई उत खरीदते हैं और समान तरह के उत्पादों के बीच सबसे ज्यादा अगर किसी उत्पाद पर विश्वास करते हैं तो सिर्फ इसलिए कि आप इस्तेमाल करते करते, विज्ञापनों और लोगों की बातचीत के जरिए ये भरोसा कर लेते हैं कि यही उत्पाद सबसे विश्वसनीय है. फिर वो ब्रांड हो जाता है. मोदी एक ब्रांड हो गए हैं. लोगों को उनपर भरोसा हो चला है. इसीलिए अगर वो कहते हैं कि नोटबंदी मैंने सिर्फ इसलिए की कि ये जितने कालेधन वाले और हराम की कमाई कर कोठी-अटारी भरनेवालों को सबक सिखाऊं तो लोग तालियां बजाते हैं. साठ दिन तक हलकान रहने, लाइन में खड़ा होकर परेशान रहने के बावजूद उबाल नहीं पैदा होता.

जन-धन खाते खुलवाने के पीछे गरीब से गरीब को सरकार की योजनाओं से जोड़ने और बीमा से लेकर मुआवजे तक से सीधे जोड़ने की बात मोदी कहते हैं तो लोगों को लगता है कि कुछ नया तो ये आदमी कर ही रहा है. श्मशान कब्रिस्तान की बात मोदी जब करते हैं और कहते हैं कि तुष्टिकरण की नीति नहीं चलनी चाहिए, सबके साथ बराबर का व्यवहार होना चाहिए तो सेक्लूयरिम के नाम पर बहुसंख्यकों को हाशिए पर डालने की राजनीति लोगों को समझ में आने लगती है. ऐसा नहीं कि कोई दूसरा नेता इन बातों को नहीं कहता है या फिर नही कहा है, लेकिन मोदी पर लोग भरोसा सिर्फ इसलिये कर रहे हैं कि उन्होंने खुद को एक ब्रैंड में बदल लिया है. ये एक प्रक्रिया है जो धीरे-धीरे चलती रहती है और लोगों के दिल-दिमाग में बदलाव आता रहता है.

परसेप्शन और ब्रैंडिग की फिलॉसोफी ही यही है. आप अपनी बात को किस तरह से रखते हैं, लोगों की जरुरत और उम्मीदों पर कितना खरा उतरते हैं और मुकाबले में चल रही संस्थाओं-मान्यताओं को कितना ध्वस्त करते हैं. मोदी तीनों मोर्चों पर लगातार काम करते रहे हैं. चाहे विदेशों में जाकर बड़े बड़े इवेंट खड़ा करना हो, म्यांमार में अंदर जाकर उग्रवादियों के ठिकानों को ध्वस्त करना हो, पाकिस्तान में घुसकर आतंकियों के कैंप खत्म करना हो, उज्ज्वला योजना के जरिए घर घर तक गैस सिलेंडर पहुंचाना हो, बिचौलियों का धंधा बंदकर हजारों करोड़ बचाने का एलान करना हो, जनता का पैसा लेकर बैठे नेताओं-पूजीपतियों को ना छोड़ने का शंखनाद करना हो, मैं आपका ऐसा प्रधानसेवक हूं जिसने आजतक आराम नहीं किया- ये याद दिलाना हो और ऐसी दर्जनों बातें आम, आदमी के दिमाम में मोदी के लिये एक अलग छवि तैयार करती रहीं. मोदी को फोकस कर नारे गढने और विज्ञापन तैयार करने की योजनाएं भी इस इमेज को मजबूत करती हैं. पिछले पौने तीन साल में मोदी और उनकी टीम ने नरेंद्र दामोदर दास मोदी की पूरी इमेज की जबरदस्त ब्रैंडिग कर दी.

आप क्या कहते हैं ये समझना बड़ा जरुरी है और बारीकी से समझना होगा. मोदी जब कहते हैं कि मेरा मालिक कोई नहीं है, मुझे किसी को जवाब नहीं देना है- मेरे मालिक आप हैं, मैं आपको जवाब देने के लिये हूं तो लोग गदगद हो जाते हैं. बनारस में वे कहते हैं मैं आपके दर्शन करने आया हूं तो लोगों के दिल पसीजता है. रैलियों में मोदी याद दिलाते हैं कि मैं यहां तब आया था और उस समय इतनी भीड़ थी, आज इतना बदला है भाई- कुछ होनेवाला है. ऐसी बातें चर्चा में आती है कि देखो पीएम होने के बाद भी कितना ध्यान रहता है इस आदमी को. दरअसल यह काम टीम करती है और लोगों में ऐसी ही बातों की चर्चा चलवाने के लिये बनाती है ताकि ब्रैडिंग की प्रक्रिया चलती रहे.

लोगों की नेताओं, राजनीति औऱ शासन के बारे में राय बदलती रहे. इन तमाम मोर्चों पर देश के दूसरे नेता मोदी से कोसों दूर दिखते हैं. नतीजा ये है कि आज लालू- मुलायम की लाठी, लठैतों और जाति की जहरीली राजनीति लोगों को रास नहीं आ रही क्योंकि नौजवान ६५ फीसदी हैं और ये नए नजरिए की पीढी है. अखिलेश और राहुल नौजवान जरुर हैं लेकिन नौजवानों की पसंद-जरुरतों पर मोदी ज्यादा फिट बैठते हैं. वे साफ सुथरी राजनीति, करप्शन फ्री सिस्टम, बहाली और तरक्की की पारदर्शी व्यवस्था, जवाबदेह नौकरशाही और दुनिया में हिंदुस्तान की साख मजबूत करने की जो बात करते हैं- वह नौजवानों को रास आती है.

यह पीढी हुल्लड़बाजों-लफंगो की भीड़ लेकर चलनेवाले और सनसनी पैदा करनेवाले काफिलों पर इतरानेवाले नेताओं को अब खारिज करने लगी है. अब डिलिवरी चाहिए, डेडिकेशन चाहिए और यही मोदी के लिये चुनौती है जिसका अंदाजा उन्हें बाकायदा है. मोदी के आसपास कोई नेता आज की तारीख में साख और सलीके के नजरिए से दिखता है तो वो नीतीश कुमार हैं लेकिन उनमें वो डायनामिज्म नहीं है जो मोदी में है. मोदी रिस्क लेते हैं और यह लोगों को पसंद आता है. बनारस में बीजेपी की हालत पतली थी. श्यामदेव राय चौधरी को टिकट नहीं देने का मामला जिले में बीजेपी नेतृत्व पर सवाल उठा रहा था. मोदी ने अपने गढ मे तीन दिन ताकत झोंक दी और नतीजा ये कि सभी सीटें निकाल गए. उत्तर प्रदेश में २१ रैलियों के जरिए मोदी १३२ सीटों तक पहुंचे और इनमें ९६ सीटें बीजेपी जीत ले गई.

मायावती लगातार कहती रहीं कि मुसलमान बीेएसपी को वोट दें और उन्होंने १०० मुसलमान उम्मीदवार उतारे भी. दूसरी तरफ अखिलेश ने कांग्रेस से हाथ ही इसलिए मिलाया कि मुस्लिम वोट को बीजेपी के खिलाफ लामबंद किया जा सके. लेकिन हुआ ये कि वैसी १३४ सीटें जिनपर मुस्लिम मतदाता २० फीसदी या फिर उससे ज्यादा है, बीजेपी करीब सौ सीटें जीत गई. कुछ लोगों की राय में मुस्लिम महिलाओं ने मोदी का साथ तीन तलाक पर सरकार के विरोध के चलते दिया. उनका करीब १५ फीसदी वोट बीजेपी को मिला. लेकिन वजह ये नहीं है. वजह ये है कि जहां मुस्लिम ज्यादा है, वहां मोदी और उनकी टीम ने तुष्टीकरण की नीति को हवा दी. लगे हाथ इस बात को भी मजबूती से रखा कि विरोधियों ने आजतक बहुसंख्यकों के आगे अल्पसंख्यकों को अहमियत दी. तुष्टीकरण, ऐसा हथियार है जिसको बीजेपी कथिक सेक्यूलरिज्म के खिलाफ इस्तेमाल कर बाकी दलों को बेनकाब करना चाहती है.

दूसरी तरफ वो मोदी को सबका साथ-सबका विकास के नारे-वादे के साथ समूचे हिंदुस्तान के नायक के तौर पर स्थापित करना चाहती है. मोदी का विश्वनाथ से सोमनाथ की पूजा अर्चना और गंगा से लेकर गो रक्षा के जयघोष को कवरेज देने-दिलवाने का इंतजाम, एक खास तरह की लेकिन बहुत मजबूत धार्मिक भावना से मोदी को जोड़े रखने और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के सिद्दांत को सही ठहराने की बड़ी योजना का हिस्सा है. जब आप मोदी की डिलिवरी वाले गवर्नेंस और करप्शनलेस ट्रांसपैरेंसी वाले सिस्टम के आगे किसी को खड़ा करेंगे तो वो छोटा और फीका लगेगा. यहां केजरीवाल जैसे आंदोलनकारी नेता, उनका निगेटिव कैंपेन और हर बार रोने वाली राजनीति धीरे धीरे खारिज होने लगेगी.

आज मायावती की पूरी राजनीति के सामने अंधेरा है, अखिलेश के चमकने की उम्मीदें फिलहाल धूमिल हो चुकी हैं, राहुल गांधी ५ साल में २४ चुनाव हारकर समय से पहले की खंड-खंड खंडहर हो चुके हैं. फिर होगा ये कि मोदी के सामने कोई विरोधी नेता ही नहीं होगा. इसी लिहाज से ऊपर मैंने नीतीश कुमार का नाम लिया क्योंकि उनकी ही राजनीति कहीं ना कहीं मोदी से मेल खाती है. उमर अबदुल्ला अगर कहते हैं कि अब आप २०१९ नहीं २०२४ की तैयारी कीजिए तो ये बात बेमानी भी नहीं है.

मोदी ने हिंदुस्तान में जिसतरह की राजनीति शुरु की वो परंपरागत राजनीति से अलग दिखने लगी, डिलिवरी और ट्रांसपैरेंसी के जोर से शासन की अलग इमेज खड़ा करनी शुरु की और स्वच्छता अभियान से लेकर उज्जवला योजना ने सरकार का सामाजिक-सांस्कृतिक चेतना के एक नया चेहरा गढा, जैसा पहले नहीं दिखा. ये सब मोदी को एक क्रेडिबल ब्रैंड के तौर पर खड़ा करते जा रहे हैं. लेकिन इसी के साथ मोदी के सामने लोगों की उम्मीदों पर खरा उतरने की चुनौती भी बहुत बढ गई है. अगर मोदी खरा नहीं उतर पाए तो राजनीति की नई संस्कृति का मिसकैरिज ठीक वैसे ही हो जाएगा जैसा केजरीवाल के जरिए पैदा हुई विकल्प की राजनीति का हुआ।

इंडिया न्यूज चैनल के मैनेजिंग एडिटर राणा यशवंत की एफबी वॉल से.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

सरेआम ब्रांडेड धोखाधड़ी, अमूल के चार सौ ग्राम के पैक में दही सिर्फ 272 ग्राम

 

मेरठ : तरह तरह के ब्रांडेड प्रोडक्ट्स आजकल बाजार पटे पड़े हैं। ग्राहक प्रायः खुली आंखों से ऐसे सामान खरीदते समय सावाधानियां नहीं बरतते हैं। हर शहर में डेयरी फार्म खुले हुए हैं। वे ब्रांडेड रैपर चिपकाकर नकली माल ऊंचे दाम पर ठिकाने लगा रहे हैं। दुग्ध उत्पादित सामानों में तो तरह तरह की धोखाधड़ी सामने आने लगी हैं। अमूल मस्ती दही का तो अजब हाल है। वह जितना पैकेट पर लिखा है, उससे आधे वजन की निकल रही है।  

रोज़ की तरह जब मयंक ने अमूल मस्ती दही खरीदी तो उन्हें कुछ शक हुआ। तौला तो पता चला कि वजन 400 ग्राम के स्थान पर मात्र 272 ग्राम है। इस पैक की एक्सपॉयरी डेट 29 मई 2015 थी। अमूल कॉस्ट्युमर केयर पर भी चार घंटे तक प्रयास करने के बाद शिकायत दर्ज करा दी गई। अब मयंक बड़ी कंपनी की धोखेबाज़ी की शिकायत उपभोक्ता फोरम में करने का मन बना रहे हैं।

रेलवे जंक्शनों, बस अड्डों पर नकली दुग्ध उत्पाद आज कल गर्मियो में ग्राहकों को खूब चपत लगा रहे हैं। ब्रांडेड दुग्ध उत्पाद निर्माता कंपनियों अमूल एवं वेरका के उत्पादों की आड़ में सरेआम दोयम दर्जे की मिलावटी पैटियां, पेस्ट्रियां और बर्गर को भी बेंचा जा रहा है। यह सब अधिकारियों के ‘आशीर्वाद’ से हो रहा है। कोई देखने-सुनने वाला नहीं कि कौन क्या बेच रहा है। 

स्टालों पर वेरका एवं अमूल ब्रांड के दूध, खट्टी-मीठी लस्सी, घी, मैंगो जूस आदि सजे धजे से मिलते हैं। नामी ब्रांडों की आड़ में लोकल माल बेचा जा रहा है। पारस व क्वालिटी कंपनी के लोकल ब्रांड के फ्रूट केक की बिक्री भी धड़ल्ले से हो रही है। इन स्टालों पर चाय तक मुहैया कराई जाती है जोकि वेरका अथवा अमूल का उत्पाद ही नहीं है। ट्रेनों से उतरे यात्री इन ब्रांडों के धोखे में आकर खाद्य सामग्री खरीद लेते हैं, वे जल्दबाजी में कतई गौर नहीं कर पाते कि आखिर जो वे खा रहे हैं, क्या वह अमूल एवं वेरका के ही उत्पाद हैं। यही ‘अनदेखी’ उन्हें नुकसान पहुंचा रही है, इन स्टालों पर बिकने वाले कई उत्पाद तो एक्सपायरी डेट भी पूरी कर चुके हैं, इनके सेवन से यात्रियों को उल्टियां भी लग चुकी हैं।

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

गोएबल्स की संतानें बनाम ब्रांड मोदी का शोर

इतिहास अपने आपको दोहराने के साथ कुछ समानताएं भी लाता है। भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को अमूमन उन्हीं की पार्टी के लोगों से लेकर मीडिया और तमाम विश्लेषकों द्वारा तानाशाह भी निरुपित किया जाता रहा है। हालांकि इसमें भी कोई शक नहीं कि भारत में जो कुव्यवस्थाएं हैं उसके लिए किसी आपातकाल या तानाशाह की जरूरत ही महसूस की जाती रही है। वैसे तो दुनिया भर में तानाशाह के रूप में जो व्यक्ति कुख्यात रहा उसका नाम अडोल्फ हिटलर है, जिसका प्रचार मंत्री गोएबल्स हुआ करता था। उसका कहना यह था कि किसी भी झूठ को 100 बार अगर जोर से बोला जाए तो वह अंतत: सच लगने लगता है…

कमोवेश यही स्थिति आज भारत में नजर आ रही है। अच्छे दिनों का धुआंधार नारा देकर सरकार बनाने वाली भाजपा ने किसी जादूगर हुडनी की तरह ही जनता की समस्याएं छूमंतर कर देने का दावा और वायदा 56 इंच के सीने के साथ ठोंका था। यह बात अलग है कि अभी तक जनता को वे अच्छे दिन महसूस नहीं हो रहे हैं जिसे करवाने के लिए पूरी भाजपा और उसकी केन्द्र सरकार इन दिनों फिर पब्लिसिटी मोड में नजर आ रही है। तमाम पत्रकार वार्ताओं, रैलियों, जनसभाओं और विज्ञापनों तथा प्रायोजित मीडिया कवरेज के जरिए यह साबित किया जा रहा है कि अच्छे दिन शुरू हो चुके हैं। यह भी विचारणीय प्रश्न है कि देश की जनता को यह फील गुड यानि अच्छा अनुभव करवाने के लिए पूरी भाजपा ब्रिगेड मैदान में उतर गई है… अरे भाई अगर अच्छे दिन आ गए तो वे खुद ब खुद जनता को महसूस हो ही जाएंगे, उसके लिए इतना शोर मचाने की जरूरत क्यों पड़ रही है? ब्रांड मोदी का जलवा अभी भी नि:संदेह कायम है मगर उस ब्रांड की नींव में दरारें भी पडऩे लगी हैं और इस सच को शोर मचाने वाली गोएबल्स की संतानों को नहीं भूलना चाहिए… 

आज से ठीक एक साल पहले नरेन्द्र मोदी ने प्रधानमंत्री पद का कार्यभार संभाला और इसमें कोई शक नहीं कि वे भारत के अत्यंत लोकप्रिय प्रधानमंत्री के रूप में स्थापित भी हुए और चुनाव प्रचार अभियान का कुशल और आक्रामक नेतृत्व भी उन्होंने किया। ये देश के इतिहास में किसी भी राजनीतिक पार्टी के लिए अध्ययन का विषय हो सकता है कि किस तरह जबरदस्त मार्केटिंग की बदौलत किसी एक व्यक्ति विशेष को इस तरह सबसे बड़े ब्रांड के रूप में स्थापित किया जा सकता है। इसमें भी कोई शक नहीं कि नरेन्द्र मोदी में क्षमताएं नहीं हैं और वे भारत को एक विकसित राष्ट्र नहीं बना सकते, बल्कि सच यह है कि वर्तमान राजनीति में जितने भी सक्रिय चेहरे हैं उनमें श्री मोदी ना सिर्फ अव्वल हैं, बल्कि काबिल भी। मगर दिक्कत यह है कि उन्हें अपने लगातार प्रवचन देने और खुद को ही श्रेष्ठ बताने के अहंकार से बाहर निकलना पड़ेगा। आजादी के इन 68 वर्षों में देश की हालत इतनी जर्जर और बदतर हो चुकी है कि उसका कायाकल्प 365 दिन तो क्या आने वाले कई वर्षों में भी नहीं किया जा सकता, क्योंकि भारत विविधताओं वाला अजीब से लोकतंत्र का देश है। विदेशों से इसकी तुलना नहीं की जा सकती और खासकर चीन के साथ तो कतई नहीं, जहां पर लोकतंत्र की बजाय तानाशाही है। इसके उलट भारत में हर चीज का विरोध जोर-शोर से शुरू हो जाता है। नरेन्द्र मोदी के एक साल के कार्यकाल का आंकलन करते हुए फिलहाल तो यही नजर आता है कि देश में पहले चुप रहने वाला प्रधानमंत्री 10 साल तक देखा और भोगा, तो अब सिर्फ बोलने और बोलने वाला ही प्रधानमंत्री दिख रहा है। मोदी के पास विजन और काम करने की मेहनत – दृढ़ता में कोई कमी नहीं है मगर असल दिक्कत देश के राजनीतिक ढांचे से लेकर मीडिया तक की है। इसमें भी कोई दो मत नहीं कि मोदीजी ने देश और दुनिया में भारत के नाम का डंका जोर-शोर से बजाया और लोगों को ये भरोसा भी दिलाया कि आज नहीं तो कल अच्छे दिन आ ही जाएंगे। हालांकि उन्हें एक बड़ी सुविधा यह मिली हुई है कि विपक्ष अत्यंत लचर व कमजोर है। आज भले ही कांग्रेसी राहुल गांधी के कथित नए अवतार को लेकर तालियां पीटे या मीडिया भी कंधे पर उठाए फिरे, बावजूद इसके राहुल गांधी में वो क्षमता सिरे से ही नदारद है जिसके चलते वे तमाम अन्य मुद्दों पर मोदी सरकार को तार्किक  तरीके से घेर सकें। गरीबों या किसानों की बात करते हुए सूट-बूट की सरकार का नारा भी ज्यादा दिन तक नहीं चलेगा। अगर वे महंगाई से लेकर अन्य तमाम मोर्चों पर मोदी सरकार को घेरने में सफल साबित नहीं हुए तो यह भी तय मानिये कि आने वाले चुनावों में भी कांग्रेस का भविष्य बहुत अधिक उज्ज्वल नजर नहीं आता। अरविंद केजरीवाल ही नरेन्द्र मोदी को कड़ी चुनौती देने का माद्दा रखते हैं तो पहले तो उनके घर में ही फूट डलवा दी और प्रशांत भूषण से लेकर योगेन्द्र यादव को बाहर करवाया और अब नई दिल्ली में भी नित नए हथकंडे अपनाकर केजरीवाल को परेशान किया जा रहा है। दरअसल राहुल की तुलना में केजरीवाल को मुद्दों की कई गुना अधिक समझ है। जिस तरह मनरेगा पर बोलते हुए श्री मोदी ने संसद में छाती ठोंककर कहा था कि उन्हें राजनीति की जबरदस्त समझ है, लेकिन कांग्रेस के राहुल गांधी के पास इस समझ का जबरदस्त अभाव है और तुलनात्मक तरीके से यह समझ अरविंद केजरीवाल में कई गुना अधिक नजर आती है। यही कारण है कि उनके खिलाफ मीडिया से लेकर पूरी केन्द्र सरकार ने मोर्चा सुनियोजित तरीके से खोल रखा है। फिलहाल तो मोदी सरकार का एक साल वैसे ही बीत गया, जैसे एक अस्त-व्यस्त घर की बिखरी हुई चीजों को उसका मुखिया जैसे-तैसे समटने का प्रयास करता है। अब बचे 4 साल में अगर मोदीजी संत-महात्माओं की तरह प्रवचन देना बंद कर ठोस मैदानी काम पर अधिक जोर देंगे तो इन 5 सालों के बाद के अगले 5 साल भी उन्हीं के रहेंगे।

सूट-बूट की सरकार में आखिर क्या है आपत्ति?

भारत की राजनीति नारों और बयानों में ही चलती है। अब तो महामारी की तरह यह बीमारी फैल गई है। कोई भी राजनेता एक बयान देता है और फिर विपक्षी उस पर पलटवार करते हैं और इन बयानों को ब्रेकिंग न्यूज के रूप में 24 घंटे के फुर्सतिया न्यूज चैनल दिखाया करते हैं। यह अलग बात है कि दिन-दिन भर इन बयानों पर चर्चा करने के बाद भी देश को कुछ हासिल नहीं हो पाता, सिवाय सुर्खियों के। अभी भूमि अधिग्रहण व अन्य मुद्दों पर कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी ने मोदी सरकार को सूट-बूट की सरकार बताया है। अब देशभर में घूमकर भाजपाई इस बयान का रोजाना खंडन करते नजर आ रहे हैं, लेकिन यह समझ नहीं आता कि आखिर सूट-बूट की सरकार कहलाने में आपित्त क्या है? ये तो प्रगति और स्मार्टनेस का प्रतीक ही है। सूट-बूट सफल और आर्थिक रूप से सम्पन्न व्यक्ति ही पहनता है और तमाम सरकारों का यह पहला कर्तव्य है कि वह अपने नागरिकों को सफल और सम्पन्न बनाएं। क्या कांग्रेस यह चाहती है कि देश की जनता अभी भी चीथड़ों में ही नजर आए? भाजपा को बजाय इस पर सफाई देने के डंके की चोट पर इसे स्वीकार करना चाहिए, क्योंकि सूट-बूट की सरकार ही नागरिकों को सूट-बूट पहना सकती है।

जो बोया वही तो काट रही है अब भाजपा

आज भाजपा यह आरोप लगाती है कि कांग्रेस सहित अन्य विपक्षी दल देश की प्रगति में रोड़ा बने हुए हैं और खासकर राज्यसभा में चूंकि भाजपा के पास बहुमत नहीं है इसलिए हर अच्छे विधेयक को मंजूर करने से रोका जा रहा है। भूमि अधिग्रहण से लेकर कई मुद्दों पर भाजपा को सड़क से संसद तक तीखा विरोध सहना पड़ रहा है और उस पर गरीब तथा किसान विरोधी होने का ठप्पा अलग लग गया, मगर इसके लिए आज भाजपा को कपड़े फाडऩे की कतई जरूरत नहीं है, क्योंकि विपक्ष में रहकर उसने भी कमोबेश यही किया। हर मुद्दे पर उसने तत्कालीन प्रधानमंत्री से लेकर मंत्रियों पर तीखे हमले बोले और उनसे इस्तीफे भी मांगते रहे। इसी भूमि अधिग्रहण कानून का भाजपा ने विपक्ष में रहते हुए समर्थन किया था और एफडीआई सहित अन्य मुद्दों पर भी भाजपा ने यू-टर्न मार लिया। विदेशों में जमा काले धन के मामले में तो भाजपा पूरी तरह एक्सपोज हो ही गई, वहीं राम मंदिर, धारा 370, समान नागरिक संहिता जैसे अपने बुनियादी मुद्दों पर भी बात नहीं कर रही है, जबकि इन तमाम मुद्दों पर विपक्ष में रहते हुए वह अत्यंत मुखर रही है और अपने एक साल के कार्यकाल को भ्रष्टाचार मुक्त और पारदर्शी भी बता रही है, जबकि मनमोहन सिंह का कार्यकाल भी 5 साल का बेदाग था इसलिए जनता ने दूसरी बार कांग्रेस की सरकार केन्द्र में बनवाई। वो तो सातवें-आठवें साल में कोयला, स्पैक्ट्रम और राष्ट्रमंडल खेलों जैसे तमाम घोटाले सामने आए, जिसको भाजपा ने जमकर भुनाया और इसमें अन्ना हजारे के जन लोकपाल आंदोलन का भी बड़ा हाथ रहा। आज भाजपा वही फसल काट रही है जो उसने विपक्ष में रहते हुए बोई थी यानि सिर्फ विरोध करने के लिए ही विरोध करना।

कांग्रेस को किसने रोका मार्केटिंग करने से

पिछले कई सालों से कांग्रेस यह रोना रोती रही है कि भाजपा और उससे जुड़े संगठन जोरदार मार्केटिंग करते हैं। बात सही भी है और जमाना पब्लिसिटी तथा मार्केटिंग का ही है। तमाम विधानसभा चुनावों और लोकसभा चुनाव में भी भाजपा ने आक्रामक मार्केटिंग की, जिसकी बदौलत जनता ने उसे पूर्ण बहुमत भी दे डाला। सोशल मीडिया पर भी भाजपा सक्रिय रही और कांग्रेस को जबरदस्त तरीके से बदनाम किया गया, लेकिन कांग्रेस के तमाम मठाधीशों को इसकी समझ आज तक नहीं आई। परम्परागत प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के अलावा सोशल मीडिया का इस्तेमाल करना कांग्रेस को अभी भी नहीं आया और बार-बार वह मार्केटिंग का आरोप खिसयानी बिल्ली खम्भा नोंचे की तर्ज पर भाजपा पर लगाती है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि भाजपा से बड़ी और पुरानी पार्टी कांग्रेस रही है। उसे आखिर मार्केटिंग करने से किसने रोका है?

कारोबारियों को एक इंच भी जमीन नहीं तो फिर मेक इन इंडिया कैसे?

अभी भूमि अधिग्रहण कानून के चलते मोदी सरकार पर गरीब और किसान विरोधी होने का ठप्पा लग गया है और इसे लगवाने में खुद मोदी सरकार भी कम दोषी नहीं है। यह अजीब विरोधाभास है कि एक तरफ भाजपा मेक इन इंडिया का नारा देती है और दूसरी तरफ यह भी खुलेआम घोषणा करती है कि देश के किसी भी कारोबारी को एक इंच जमीन अधिग्रहित करके नहीं दी जाएगी। अब यहां पर सवाल यह है कि क्या कारोबारी हवा में उद्योग धंधे स्थापित करेंगे और मेक इंडिया का सपना साकार कैसे होगा? भाजपा को उलटे मोदीजी वाले 56 इंच के सीने का कम से कम इस मामले में इस्तेमाल कर लेना चाहिए था और छाती ठोंककर बोलना था कि कारोबारियों को जमीन प्रोजेक्ट की जरूरत के मुताबिक उपलब्ध करवाई जाएगी और कांग्रेस का भूमि अधिग्रहण कानून अत्यंत अव्यवहारिक और जटील था, जिसके चलते जनहित के अलावा निजी प्रोजेक्टों के लिए भी जमीनें नहीं ली जा सकती इसीलिए इस कानून की ऐसी कमियोंं को दूर किया गया है। देश भर में तमाम राज्य और केन्द्र सरकारें ही कारोबारियों को तमाम साधन-संसाधन, सुविधाएं और जमीनें मुहैया कराती रही है। आज अगर गुजरात में रिलायंस से लेकर टाटा और अडानी के विशाल कारोबार स्थापित हैं तो वे हवा में नहीं चल रहे, बल्कि उन्हें हजारों एकड़ जमीनें गुजरात सरकार ने आवंटित की है और यह बिना अधिग्रहण के नहीं हो सकता। इसलिए भाजपा को बजाय यह कहने कि किसी कारोबारी को एक इंच जमीन नहीं देंगे, उल्टा यह बोलना चाहिए कि मेक इन इंडिया को साकार करने के लिए अधिग्रहण जरूरी है, बल्कि भाजपा के इन बयानों से तो देश का कारोबारी जगत् खुद भौंचक है और यही कारण है कि तमाम आर्थिक जानकार और कारोबारी भी एक साल के सुधारों से खुश नहीं हैं और भूमि अधिग्रहण को लेकर चल रहे विरोध के तमाशे से तो कारोबारी और हताश ही होंगे।

राजेश ज्वेल संपर्क – 9827020830, jwellrajesh@yahoo.co.in

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें: