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जीएसटी से बेरोजगारी की कगार पर खड़े एक पत्रकार की डायरी : जीएसटी का सच (पार्ट 1 से 12 तक)

जीएसटी का सच (पार्ट 1) : जीएसटी यानि छोटे और नए कारोबारों का दुश्मन

संजय कुमार सिंह
[email protected]

जीएसटी के बारे में बातें तो बड़ी-बड़ी की गईं पर यह छोटे और नए कारोबारों का दुश्मन है। मेरे कुछ ग्राहकों ने कहा कि अंतरराज्यीय “कारोबार” करने वालों के लिए जीएसटी पंजीकरण आवश्यक है और कायदे से वे काम कराना तो दूर जो काम करा चुके उसका भुगतान भी नहीं कर सकते। शुरू में तो मुझे यकीन ही नहीं हुआ पर अब लगता है कि वे सही ही कर रहे हैं। वैसे भी नौकरी करने वाले क्यों जोखिम उठाएं। वे काम नहीं कराएंगे, गलत हो तो क्यों करें। तनख्वाह तो मिलनी ही है। पर यह सब कितने दिन कैसे चलेगा भविष्य बताएगा।

जीएसटी का सच (12) : हम फिर सन 2000 में पहुंच गए

संजय कुमार सिंह
[email protected]

यह सही है कि सरकार का खर्च टैक्स से चलता है और टैक्स चोरी होती रही है। भ्रष्टाचार भी है और टैक्स देने वालों की संख्या जितनी होनी चाहिए उससे कम लगती है। इसकी अलग जांच कराई जा सकती थी, जीरो रिटर्न फाइल करने का नियम बनाने से क्या होगा? यह सही है कि टैक्स चोरी होती है इसलिए टैक्स की दर ज्यादा है। जैसे ही टैक्स देने वाले बढ़ेंगे टैक्स की दर कम की जा सकेगी। इसके लिए ज्यादा से ज्यादा लोगों को टैक्स की जद में लाना होगा और चोरी की गुंजाइश कम करनी होगी। मुमकिन है जीएसटी से यह सब करने की कोशिश की गई होगी। इस चक्कर में टैक्स के नियम ऐसे बन गए हैं कि कारोबार करना ही मुश्किल है और हर कोई तकनीकी रूप से टैक्स चोर ठहराया जा सकता है।

मैं 1990 से बहुत छोटे पैमाने पर फ्रीलांसिग कर रहा हूं और तब कोई टैक्स वैक्स के बारे में सोचता भी नहीं था। मैं नियमों का पालन करने और जानने में यकीन रखता हूं इसलिए मैंने टैक्स चोरी के बारे में कभी सोचा भी नहीं। इसे ऐसे भी कह सकते हैं कि कभी इतनी कमाई ही नहीं हुई कि टैक्स चोरी कर कुछ बचता। मुझे लगता है कि जोर इस बात पर दिया जाना चाहिए था टैक्स देने के फायदे हैं जबकि टैक्स वसूलने के नियम ही जानलेवा बना दिए गए हैं। इसमें लालफीताशाही और भ्रष्टाचार की संभावना भी बढ़ रही है। जीरो रिटर्न फाइल कराने की मजबूरी इसी श्रेणी में है।

आम आदमी की रोजी रोटी की व्यवस्था सरकार का काम है। जो नौकरी करते या पाते हैं उन्हें निश्चित तनख्वाह मिलती है और उसमें से निश्चित राशि टैक्स के रूप में कट जाती है। दूसरे शब्दों में नौकरी पेशा लोगों के लिए टैक्स चोरी की संभावना ही नहीं है। वो जो थोड़ा बहुत इधर-उधर काम करते हैं उसी से कुछ बचा सकते हैं वरना सामान्य वेतन के बारे में यही कहा जाता है कि उससे खर्चा ही चलता है। नौकरी करने वाला वेतन से तो टैक्स देता ही था जो अतिरिक्त कमाता था (मेहनत या योग्यता से, मैं रिश्वत की बात नहीं कर रहा) उसपर कुछ लोग टैक्स देते थे ज्यादातर नहीं देते होंगे। जीएसटी से इस कमाई पर टैक्स चुराना तो मुश्किल हो ही गया है ऐसी कमाई करना भी संभव नहीं रह गया है। कंप्यूटर, संचार के साधन और तकनालाजी की उपलब्धता के बावजूद।

तकनालाजी का उपयोग टैक्स चोरी के लिए किया जाता तो एक बात थी पर इससे कमाना संभव हो तो उसे क्यों रोकना? मैंने पहले लिखा है कि मैं हाथ से लिखकर मैनुअल टाइपराइटर पर किसी और से, कहीं और जाकर टाइप करवाता था फिर अनुवाद देने जाता था या भेजता था। यह बहुत मुश्किल था। अब यह सब झंझट नहीं रहा। जो बिल होता है उसपर टीडीएस कटता था और उसे वापस लेने के लिए आयकर रिटर्न फाइल करना जरूरी था और रिटर्न भी फाइल करता ही था। जीएसटी के बाद सरकार के लिए टैक्स भी वसूलूं या तकनीक का फायदा न उठाऊं। घर बैठे काम करना संभव है, पर न करूं?

यह स्थिति तब है जब 1990-95 में मैं जिन कंपनियों के लिए काम करता था उनके दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, चेन्नई, बंगलूर कार्यालयों से अलग काम आता था अलग बिल जाता था अलग पैसे (चेक) आते थे। रोज उन्हें बैंक में जमा कराना होता था आदि। तकनीक की उपलब्धता का असर यह हुआ कि एक केंद्र से लगभग एक आदमी काम कराता था और महीने में एक बार खाते में पैसे आ जाते थे। इसके बाद जीएसटी लागू होने का असर यह हुआ कि हर जगह से पर्चेज ऑर्डर अलग आएगा। इसलिए बिल और भुगतान सब अलग होगा। हम फिर सन 2000 में पहुंच गए। यह सब तब हो रहा है जब खाते में लेने-देन पर आयकर और दूसरे टैक्स लगाकर सारा मामला आसान किया जा सकता था और डिजिटल भुगतान को ही प्रेरित किया जाता। नोटबंदी के बाद जीएसटी देश की अर्थव्यवस्था की हत्या है। 

पूरे प्रकरण को समझने के लिए इसे जरूर पढ़ें…

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