रहस्यमय कोरोना, विधि का विधान और विज्ञान : हानि-लाभु, जीवनु-मरनु, जसु-अपजसु विधि हाथ!

डॉ दिनेश चंद्र सिंह, आईएएस

किसी भी सभ्यता व संस्कृति का विकास, समय-समय पर उसके लोगों के समक्ष आए संकट और उससे उतपन्न परिस्थितियों से जूझने की उनकी व्यक्तिगत-सामूहिक क्षमता पर निर्भर करता है। वर्तमान वैश्विक महामारी कोरोना वायरस के प्रकोप से उपजी हुई चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों से निपटने के क्रम में भी हमें विधि के विधान के साथ साथ वैज्ञानिक अवदानों का भी कायल रहना चाहिए।

प्रसंगवश, लोक महाकाव्य रामचरितमानस की एक चौपाई को यहां उद्धृत करना चाहूंगा। वह यह कि “सुनहु भरत भावी प्रबल, बिलिख कहेउ मुनिनाथ। हानि-लाभु, जीवनु-मरनु, जसु-अपजसु विधि हाथ।।” सच कहूं तो काफी समय से मन इसी अंतर्द्वंद में उलझा हुआ था कि क्या यह जो ऊपर लिखित पंक्तियां हैं, उसमें जीवन का बहुत बड़ा सार छिपा हुआ है अथवा नहीं।

वास्तव में, ये पंक्तियां सदियों से दु:खी, पीड़ित व वेदनायुक्त समाज में पुनः शक्ति धारण कर आगे बढ़ने की प्रेरणा देने का कार्य करती आई हैं। उनका मार्ग सदा से ही प्रशस्त करती आई हैं, लेकिन यह यक्ष प्रश्न मेरे समक्ष समुपस्थित है कि क्या आज भी इसकी प्रासंगिकता है अथवा नहीं! विचलित मन से ऐसा अनेकों बार सोचा और कभी-कभी सहसा विश्वास भी नहीं होता है। किंतु वर्तमान कोविड-19 की वैश्विक महामारी ने तो यह विश्वास और गहन कर दिया कि ऊपर की पंक्तियां सच नहीं हैं!

वजह यह कि कोरोना संक्रमण से कुछ ऐसे व्यक्तियों की अकाल मृत्यु हुई है जिनकी जीवन की यात्रा का यदि निकट से अध्ययन करेंगे तो पाएंगे कि वह किसी भी प्रकार के व्यसन से कोसों दूर थे। वे खान-पान की उच्च स्तरीय प्रवृत्ति का अनुसरण अपने जीवन में करते आये थे। स्वास्थ्यगत मानकों पर भी काफी हद तक ठीक थे। परंतु कोरोना के संक्रमण के प्रभाव से उनकी लड़ने की प्रतिरोधक क्षमता यकायक जवाब दे गई और अकाल मृत्यु का ग्रास बनकर उनकी जीवन लीला भी समाप्त हो गई।

यद्यपि, यह वैज्ञानिकों द्वारा तथा अनुभवी चिकित्सकों द्वारा प्रमाणित रुप से सिद्ध किया जा चुका है कि जिनको एक से अधिक प्रकार के विभिन्न रोग हैं, जैसे- शुगर, फेफड़ों की बीमारी, कैंसर, न्यूरो, हार्ट से संबंधित डिजीज, जिन्हें चिकित्सकीय भाषा में कोमोरबिलि कोमोरबीडीटी कहा जाता है, उन्हें बचाना बेहद मुश्किल है। वहीं, यह भी पाया जा रहा है कि मधुमेह, हाइपरटेंशन, रक्त संबंधी रोग एचआईवी पॉजिटिव, कैंसर इत्यादि जैसे एक से अधिक रोग से प्रभावित व्यक्ति भी समुचित इलाज एवं देखभाल से कोरोना को मात देकर स्वस्थ भी हुए हैं।

कहने का अभिप्राय यह है कि भले ही समुचित चिकित्सा सुविधाएं एवं बेहतर प्रबंधन किसी भी व्यवस्था का कारगर हथियार होते हैं, जिसके बल पर किसी भी चुनौती का मुकाबला करके उसे हराया जा सकता है। लेकिन कहीं-कहीं सामान्य नागरिकों की सोच दो हिस्सों में बंट जाती है। पहला यह कि बेहतर प्रबंधन व उत्कृष्ट चिकित्सा व्यवस्था के अलावा अन्य कोई ईश्वरीय अनुकंपा से व्यक्ति इस संक्रामक रोग से ठीक नहीं हुआ। दूसरा यह कि कुछ ऐसे वर्ग भी हैं जिनको समुचित चिकित्सा के अभाव में भी होम आइसोलेशन में घरेलू एवं पुरानी चिकित्सकीय व्यवस्था, योग, प्राणायाम आयुर्वेदिक काढ़ा इत्यादि के सेवन से घर पर ही ठीक हो रहे हैं। ऐसे लोग अपनी जीवन शैली एवं ईश्वर की कृपा को अपने ठीक होने का कारण मानते हैं।

वास्तव में, हम किसी भी दशा में उत्कृष्ट प्रबंधन एवं बेहतर चिकित्सकीय व्यवस्था, समुचित निगरानी तंत्र और उत्तर प्रदेश सरकार की टेस्ट, ट्रेस व ट्रीट की वैज्ञानिक पद्धति को कोरोना को हराने एवं संक्रमण से प्रभावित व्यक्तियों को ठीक करने की व्यवस्था को ही उत्कृष्ट मान रहे हैं और मानना भी चाहिए। क्योंकि कर्म एवं मेधा के बल पर किया गया प्रयास सदैव विजयी बनाता है। बावजूद इसके, कहीं न कहीं कतिपय युवकों, बच्चों एवं स्वस्थ व्यक्तियों की मृत्यु के रहस्य की तलाश करते हुए इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता है कि हानि-लाभ, जीवन-मरण, यश-अपयश, यह सब विधि यानी प्रकृति के हाथ में ही है।

इस बात की प्रमाणिकता के लिए यह अवगत कराना चाहूंगा कि देश एवं दुनिया की 9 प्रतिष्ठित कम्पनियों व उसके लोगों ने, कंपनी से जुड़े वैज्ञानिकों ने रात-दिन प्रयास करके अपने परिश्रम एवं कर्तव्य परायणता से बेहद जटिल कोरोना महामारी की वैक्सीन की खोज की, जिससे इनकी कंपनियों को लाभ-यश के साथ मानवता की रक्षा का पुरस्कार व प्रशंसा मिली। लेकिन यह सवाल उठना लाजिमी है कि जब अन्य तमाम कंपनी इस क्षेत्र में कार्य कर रही थीं, हैं तो फिर लाभ एवं यश इन्हीं 9 कंपनियों व उसके कर्ताधर्ता लोगों को ही क्यों मिला। यहीं से प्रकृति, पौरुषता व प्रारब्ध की चर्चा जगह हासिल करने लगती हैं। उपर्युक्त बातों से स्पष्ट है कि कहीं न कहीं रामचरितमानस की उपरोक्त उपदेशात्मक पंक्तियां सार्थक प्रतीत होती है।

पीपुल्स एलायंस की रिपोर्ट के आधार पर 9 लोग इस संक्रमण काल में भी नए अरबपति बने। पहला, मॉडर्न के सीईओ स्टीफन बैंसल, दूसरा बायोनेट के सीईओ और संस्थापक उगुर साहीन, तीसरा इम्यूनोलॉजिस्ट और मॉडर्ना के संस्थापक निदेशक टिमोथी स्प्रिंगर, चौथा मॉडर्ना के चेयरमैन नौबार अफेयान, पांचवा मॉडर्ना के वैक्सीन के पैकेज व निर्माण के लिए कार्य करने वाली कंपनी आरओवीआई के चेयरमैन जुआन लोपेज वेलमोंट, छठा मॉडर्ना के संस्थापक निदेशक एवं विज्ञानी रॉबर्ट लैंगर, सातवां कैनसिनो बायोलॉजिक्स के मुख्य वैज्ञानिक झू ताओ, आठवां कैनसिनो बायोलॉजिक्स के सीनियर वी सी किउ डोंगकसू और नवम कैनसिनो बायोलॉजिक्स के वरिष्ठ उपाध्यक्ष व माओ हुइंहोआ।

इसी प्रकार, सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया के संस्थापक सारस पूनावाला, कैडिला हेल्थकेयर के प्रमुख पंकज पटेल व कई ऐसी संस्था है, जिनको इस काल में लाभ ही लाभ हुआ। यहां पर मैं एक ऐसे नाम का उल्लेख करना आवश्यक समझता हूं, जिनकी चर्चा पूरे देश में हो रही है। वह हैं उत्तर प्रदेश के गोरखपुर एवं बनारस विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त भारतीय वैज्ञानिक डॉ अनिल कुमार मिश्रा, जिन्होंने रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) द्वारा विकसित 2 डीजी दवा के निर्माण में अभिनव भूमिका निभाई। उनके सह-अनुसंधानकर्ता भारतीय वैज्ञानिक डॉ अनंत नारायण भट्ट ने भी उल्लेखनीय भूमिका निभाई। बेशक, ये लोग एक शासकीय सेवा के अंतर्गत वैज्ञानिक पद पर आसीन हैं, इसलिए इनको मौद्रिक लाभ शायद ना हो, लेकिन, इनकी यश-कीर्ति, यश-पताका, मानव की रक्षा हेतु किये गए उपायों की खोज से हासिल की गई उपलब्धियों के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में लिखा जाएगा। इससे आपकी भावी पीढ़ी भी खुद को गौरवान्वित समझेगी। इस खोज के लिए देश आपका सदैव आभारी रहेगा।

निःसन्देह, इन सबकी यश-पताका व यश-कीर्ति भी अपनी पराकाष्ठा पर पहुंच गई दृष्टिगोचर हो रही है। इसके साथ ही, कई ऐसे व्यवसाय भी हैं जिनको इस महामारी में लाभ और यश प्राप्त करने का अवसर मिला। कुछ तो ऐसे निकले, जिनको पूर्व में इतनी ख्याति अर्जित नहीं थी और अपनी हानि की बैलेंस शीट बनाते-बनाते थक गए थे। फिर अचानक लाभ का मौका इस महामारी काल में मिला।

वहीं, कुछ लोगों को उनकी नकारात्मक सोच, लोभ, छल, कपट एवं स्वार्थपरता के कारण दवाइयों, इंजेक्शन एवं ऑक्सीजन आदि जीवनदायिनी औषधियों की कालाबाजारी के मोहपाश में पड़ने के कारण हानि व अपयश भी मिला। उन्हें जेल की सलाखों के अंदर जाने का दंड भी मिला। ऐसे लोगों ने भविष्य में अपने परिवार की आने वाली पीढ़ियों को भी कलंकित करने का कार्य किया।वो लोग ऐसे स्थायी दाग लगाकर हानि और अपयश के ऐसे दलदल में फंस गए कि वह दाग उनके ऊपर से एवं उनके परिजनों के ऊपर से कभी नहीं हटेगा। ऐसे में, मुझे लगा कि रामचरित मानस की निम्न पंक्तियां- “सुनहु भरत भावी प्रबल, बिलिख कहेउ मुनिनाथ। हानि-लाभ, जीवन-मरण, यश-अपयश विधि हाथ।।,” आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं, जितनी पहले थी और आने वाले समय में भी प्रासंगिक रहेंगी।

मेरा दृढ़ मत है कि काम, क्रोध, अहंकार, स्वार्थ के वश में आकर व्यक्ति अपने वात, कफ, पित्त के संतुलन को बिगाड़ लेता है। फिर उसी त्रिदोष के कारण अनेक व्याधियों की चपेट में आकर अकाल मृत्यु, हानि तथा अपयश का भागी बनता रहता है। लिहाजा, हमें यह समझना चाहिए कि प्रकृति के इस क्रूर कालखंड में हम सभी यदि अच्छे ढंग से मानवता की रक्षा के लिए, एकजुट होकर, संगठित होकर और सामाजिक सरोकार की भावना से पीड़ित, दु:खी एवं संक्रमित व्यक्तियों की सेवा करेंगे तो निश्चित ही हमलोग यश प्राप्त करेंगे। क्योंकि सरकारी तंत्र अपने स्तर से उत्कृष्ट कार्य कर रहा है। वह काउंटर करने की कोई ऐसी प्रक्रिया नहीं छोड़ रहा, जिससे उनके नागरिकों को लाभ ना हो और इस अदृश्य रूपी वायरस के संक्रमण का विनाश ना हो।

यहां राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की कुछ पंक्तियां मेरे विश्वास को और अधिक मजबूती प्रदान करती हैं। वह यह कि “प्रभु रथ रोको! क्या प्रलय की तैयारी है, बिना शस्त्र का युद्ध है जो, महाभारत से भी भारी है।…कितने परिचित, कितने अपने, आखिर यूं ही चले गए, जिन हाथों में धन-संबल, सब काल से छले गए।…हे राघव-माधव-मृत्युंजय, पिघलो, यह विनती हमारी है, ये बिना शस्त्र का युद्ध है जो, महाभारत से भी भारी है।”

लिहाजा, सभी राजनीतिक दल, उद्योगपति, सक्षम नागरिक, देश की युवा शक्ति, बिना आरोप-प्रत्यारोप के सामूहिकता का भाव लेकर अपनी सामर्थ्य के अनुसार, देश के समक्ष उतपन्न इस अप्रत्याशित चुनौती का सामना करने के लिए संबल बनें। क्योंकि, समाज में उत्पन्न निराशा व हताशा के माहौल को आपकी सामूहिक सकारात्मकता व सर्जनात्मकता भाव से, इस विस्मयकारी माहौल से निपटने में मददगार होगी। भविष्य में यह निश्चय ही यादगार भी बनेगी और दृष्टांत स्वरूप उद्धृत भी की जाएगीर। इसलिए, निर्विवाद रूप से आप सभी अपनी सकारात्मकता के माध्यम से यश के भागी बनेंगे, अन्यथा इतिहास हमें कभी नहीं बख्शेगा।

सम्भवतया यही विधि का विधान है और पुनः लाभ-हानि, जन्म-मरण, यश-अपयश, विधि के विधान का परिचायक भी। इसलिए, किसी भी दशा में कर्म के प्रति अपनी आस्था को नहीं छोड़ना चाहिए, क्योंकि कृत कर्म का फल मनुष्य को अवश्य मिलता है। कर्मठतापूर्वक किए गए कर्म का फल हर किसी को सुख-चैन तथा लाभ-यश अवश्य दिलाएगा। लिहाजा, हर कोई इस युद्ध से निबटने में अपनी ओर से कुछ न कुछ करने का संकल्प अवश्य ले। वह इसके खिलाफ चल रही सरकार की लड़ाई में एक जन सैनिक बनकर कार्य करे, ताकि कोरोना से जारी यह जंग जीती जा सके।

ऐसे में सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की निम्न पंक्तियां हर किसी को निराशा एवं अवसाद के क्षणों से जीतने की कला में माहिर बनाती हैं। वह यह कि, रवि हुआ अस्त, ज्योति के पत्र पर लिखा अमर रह गया राम-रावण का अपराजेय स्वर।…. वह एक और मन रहा, राम का जो न थका, जो नहीं जानता दैन्य, नहीं जानता विनय। छोड़ दो समर जब तक न हो विजय।…. होगी जय, होगी जय, हे पुरुषोत्तम नवीन, कई महाशक्ति राम वंदन में हुई लीन।….निःसन्देह, जीवन रक्षक वैक्सीन बनाने वाले वैज्ञानिक आधुनिक राम हैं, इसमें कोई शक नहीं।

लेखक डॉ दिनेश चंद्र सिंह उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी के सचिव हैं।

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