हिंदी अखबारों में कश्मीर पर कोई खबर क्यों नहीं छपती?

कश्मीर में मीडिया पर कोई रोक नहीं का दावा और हिन्दी अखबार….. द टेलीग्राफ की आज की लीड है – कश्मीर में 22 साल के युवक को सांप ने काटा। फोन बंद है लिए पुलिस एम्बुलेंस को कॉल नहीं हो सकी। 16 घंटे तक माता-पिता अस्पताल से अस्पताल दौड़ते रहे। पर युवक को बचाया नहीं जा सका। अखबार ने लिखा है फोन बंद होने से ऑनलाइन दवाइयां खरीदना मुश्किल है। डॉक्टर एक दूसरे से बात नहीं कर सकते हैं और जीने-मरने की स्थिति में भी किसी की सहायता नहीं कर सकते हैं।

अखबार ने लिखा है कि एम्बुलेंस के लिए फोन न कर पाने या समय पर अस्पताल नहीं पहुंच पाने के कारण कम से कम दर्जन भर लोगों की मौत हो चुकी है। इनमें ज्यादातर हृदय से संबंधित बीमारी वाले थे। अखबार ने लिखा है कार्रवाई के डर से डॉक्टर ने अपना पूरा नाम नहीं बताया और बहुत से चिकित्सकों ने कहा कि रिपोर्टर से बात करने पर भी उनके खिलाफ कार्रवाई हो सकती है। कश्मीरी चिकित्सकों ने यह आरोप भी लगाया है कि सुरक्षा बल चिकित्सा कर्मचारियों को भी परेशान कर रहे हैं और डरा रहे हैं।

हालांकि सरकारी अधिकारियों ने इन आरोपों को खारिज किया और कहा कि प्रतिबंधों के बावजूद अस्पताल सामान्य ढंग से काम कर रहे हैं। सरकारी अधिकारी रोहित कंसल ने कहा कि प्रतिबंधों के कारण कोई जान नहीं गई है। जितनी जानें गई हैं उससे ज्यादा हमने बचाई हैं। पूरी खबर पढ़ना चाहें तो लिंक कमेंट बॉक्स में।

द टेलीग्राफ ने कल ही पहले पेज पर ही खबर छापी थी कि मंत्री ने कहा कि कश्मीर में मीडिया पर कोई बंधन नहीं है। मुझे कल यह सरकारी खबर भी दूसरे अखबरों में प्रमुखता से नहीं दिखी। मुमकिन है, जो कश्मीर की खबर छापते ही नहीं हैं उनके लिए इस खबर का कोई मतलब नहीं हो। क्योंकि कल भी टेलीग्राफ ने कश्मीर की ही एक खबर को लीड बनाया था और खबर ऐसी कोई क्रांतिकारी या सरकार विरोधी नहीं थी।

बहुत सामान्य सी खबर थी कि पार्टी के नेताओं ने फारुक अबदुल्ला और उमर अब्दुल्ला से मुलाकात की। यह मुलाकात नेशनल कांफ्रेंस के नेताओं को अपने इन नेताओं से मिलने की सरकारी अनुमति मिलने के बाद संभव हुई थी। द टेलीग्राफ ने लिखा था कि 5 अगस्त को कश्मीर में प्रतिबंध लगाए जाने के बाद से 62 दिन बाद उमर अब्दुल्ला पहली बार और फारुक अब्दुल्ला दूसरी बार कैमरे को नजर आए।

एक तरफ सरकार कह रही है कश्मीर में मीडिया पर कोई रोक नहीं है दूसरी तरफ हिन्दी अखबारों में कश्मीर की कोई खबर नहीं है। ना दिल्ली से जाकर कोई लिख रहा है ना वहां के संवाददाता की खबर है कि वहां सब चंगा सी। इसका आप क्या मतलब लगाएंगे। अखबारों पर रोक, प्रतिबंध और धमकाने के आरोपों के बीच यह आत्मसमर्पण की स्थिति भी नहीं है। यह विशुद्ध नालायकी है और किसी रिपोर्टर को भेजकर खबर करने का खर्चा बचाना तो है ही।

नवभारत टाइम्स में पहले पन्ने पर खबर थी कि फारूक और उमर अपनी पार्टी के नेताओं से मिले और आज महबूबा को ऐसा मौका मिलेगा। दैनिक हिन्दुस्तान ने इसे लीड बनाया था। दोनों अखबारों ने भले एजेंसी की खबर दी पर कश्मीर में जब 70 साल बाद इतनी बड़ी कार्रवाई हो रही है तो उसकी रोज की खबर न हो पर महत्वपूर्ण घटनाएं तो पहले पन्ने पर होनी ही चाहिए। निश्चित रूप से गिरफ्तार नेताओं को अपनी पार्टी के नेताओं से मिलने दिया जाना बड़ी घटना है पर इसकी एजेंसी की खबर भी पहले पन्ने पर नहीं देना संपादकीय नालायकी ही है।

दूसरी ओर, अमर उजाला में कल एजेंसी की खबर लीड थी जो इस्लामाबाद डेटलाइन से लीड थी। दैनिक जागरण में कल पहले पन्ने पर नई दिल्ली डेटलाइन से जेएनएन की खबर थी, इमरान खान से नाराज सऊदी प्रिंस ने वापस ले लिया था विमान। फिर भी आप अखबार खरीद कर पढ़ते हैं। नेशनल कांफ्रेंस के नेता इतने दिनों बाद दिखे या सरकारी अनुमति से अपनी ही पार्टी के लोगों से मिले ये खबर पहले पन्ने पर तो नहीं थी। नवोदय टाइम्स में भी यह खबर पहले पन्ने पर नहीं थी।

चुनाव की खबरें छापने के लिए हिन्दी के अखबार कितनी तैयारी करते हैं, कितनी खर्चा करते हैं और कितनी गलत-झूठी-बकवास खबरें छापते हैं पर कश्मीर में यही सक्रियता क्यों नहीं?

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One comment on “हिंदी अखबारों में कश्मीर पर कोई खबर क्यों नहीं छपती?”

  • Suresh S Duggar says:

    दरअसल हिन्‍दी अखबारों ने राष्‍ट्रभक्ति की आड़ में बहुत बड़ा अंधभक्ति का चश्‍मा पहन लिया हुआ है। उन्‍हें कश्‍मीरियों का दर्द कोई अहसास नहीं दिला रहा है। वे कश्‍मीर को विदेशी मानते हुए कोई तरजीह नहीं दे रहे। भेजी जाने वाली खबरों को अक्‍सर देश विरोधी करार देकर छापने से मना किया जा रहा है। क्‍योंकि अंधभक्ति में अंधे को सब हरा—चंगा दिख रहा है।

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