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सियासत

हिंदू रेट ऑफ ग्रोथ!

मिलिंद खांडेकर-

रिज़र्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने PTI को इंटरव्यू में कहा कि भारत ‘हिंदू रेट ऑफ ग्रोथ’ की कगार पर है. इसके बाद बहस छिड़ गई है कि क्या सचमुच भारत में ग्रोथ कम हो रही है. SBI ने कहा कि ये आकलन ग़लत है. आज हिसाब किताब हिंदू रेट ऑफ ग्रोथ का ?

हिंदू रेट ऑफ ग्रोथक्या है?

ये टर्म सबसे पहले अर्थशास्त्री राज कृष्ण ने 1978 में इस्तेमाल किया था. भारत 1947 में अंग्रेजों से आज़ाद हुआ. आज़ादी के 30-35 साल तक भारत की GDP 3-3.5% की रफ़्तार से बढ़ती रहीं. राज कृष्ण ने इसे ‘हिंदू रेट ऑफ ग्रोथ’ कहा था. उनके कहने का मतलब था कि बाढ़ हो या सूखा, युद्ध हो या शांति, भारत की अर्थव्यवस्था इसी धीमी गति से बढ़ती रहती है. आम तौर पर इन घटनाओं से जीडीपी की ग्रोथ कम ज़्यादा होती रहती है, भारत में उन 30-35 सालों में ऐसा नहीं हुआ. उस समय भी इसे हिंदुओं से जोड़ने पर आपत्ति की गई थी.

‘हिंदू रेट ऑफ ग्रोथ’ का कारण क्या था?

भारत में आज़ादी के बाद से कम ग्रोथ के लिए समाजवाद को ज़िम्मेदार ठहराया जाता है. सरकार ही सब कुछ तय करती थी. कितनी कारें कंपनी बनाएगी? कितने में बेचेगी? कितना सामान विदेश से मंगाए जा सकता है? कितना विदेश भेजा जा सकता है? बिज़नेस के हर पहलू में सरकार की दख़लंदाज़ी थी. ग्रोथ कम रही, नौकरियाँ नहीं आयीं, लोगों की आमदनी नहीं बढ़ी. ये दुश्चक्र टूटा 1991 में. भारत की विदेशी मुद्रा भंडार ख़ाली हो गया था. पेट्रोल जैसी ज़रूरी वस्तुओं के आयात के लिए विदेशी मुद्रा नहीं बची थी तब प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव और वित्त मंत्री मनमोहन सिंह ने अर्थव्यवस्था को बाज़ार के लिए खोल दिया. प्राइवेट सेक्टर को मौक़ा मिला, सरकार बिज़नेस से पीछे हटती रहीं. टेलीफोन, एयरलाइंस , बैंकिंग जैसी सेवाओं में प्राइवेट कंपनियों को मौक़ा मिला. कॉमपिटिशन के चलते क्वालिटी में सुधार आया और क़ीमतें भी गिरी. 30 साल पहले आपको हाउसिंग लोन मुश्किल से मिलता था, मिलने पर भी ब्याज दर 15-16% होती थी. अब 7-8% की रेंज में है. वो भी महँगा लग रहा है.

अब क्या हुआ है?

अक्टूबर से दिसंबर की तिमाही के जीडीपी के आँकड़े हाल में आए हैं, ग्रोथ 4.4% रहीं. चालू तिमाही में भी ग्रोथ चार प्रतिशत से थोड़ी ज़्यादा रहने की संभावना है. 2022-23 वित्त वर्ष की ग्रोथ फिर भी 7% रहने की संभावना है. इसकी वजह है पहले 6 महीने में तेज़ी से ग्रोथ, लेकिन आख़िरी 6 महीने (अक्टूबर-मार्च) में ग्रोथ गिरी है. इसी संदर्भ में रघुराम राजन ने कहा कि भारत ‘हिंदू रेट ऑफ ग्रोथ’ की कगार पर है. सरकार भी मानती है कि अगले साल ग्रोथ गिरेगी. फिर भी इसके 6% से ज़्यादा होने का अनुमान है यानी ‘हिंदू रेट ऑफ ग्रोथ’ से लगभग दो गुना . राजन कहते हैं कि हम अगले साल 5% की ग्रोथ भी छू पाएँगे तो क़िस्मत वाले होंगे.

भारत में जीडीपी ग्रोथ में गिरावट के लिए कोरोनावायरस को ज़िम्मेदार ठहराया जाता है. ये सच है, लेकिन हम इस बात को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते हैं कि कोरोनावायरस से पहले साल यानी 2019-20 में ही ग्रोथ कम होने लगी थी. उस साल की ग्रोथ 4% रही .फिर 2020 में कोरोनावायरस लॉक डाउन और 2022 में रुस यूक्रेन युद्ध ने समस्या खड़ी कर दी. अब 2023-24 यानी अगले एक साल में हिसाब किताब हो जाएगा कि हम ‘हिंदू रेट ऑफ ग्रोथ’ के कितने पास है या कितने दूर?

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