एक कलक्टर जिसने आम जन का दुख देख इस्तीफा दिया और झोपड़ी में रहने चला गया

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आदिवासी मामलों के जानकार डॉ बीडी शर्मा अपने समय के मॉडल कलक्टर रहे हैं. 1931 में मुरादाबाद में जन्मे डॉ शर्मा उड़ीसा में पॉस्को आंदोलन समेत देशभर में चल रहे जनांदोलनों को समर्थन देते रहे हैं. वे आबकारी नीति का विरोध करते रहे हैं. उन्होंने ग्रीन हंट को ऑपरेशन ट्राइबल हंट कह कर सरकार की नक्सल हिंसा को कुचलने वाले अभियान की आलोचना की थी. डॉ शर्मा केंद्र सरकार की गलत नीति के विरोध में 1981 में कलक्टर पद से त्यागपत्र दे दिया था. उसके बाद उन्होंने भारत जन आंदोलन का गठन कर आदिवासियों के लिए काम करना शुरू किया.

उन्होंने अनुसूचित जाति-जनजाति आयोग के अध्यक्ष पद रहते हुए काफी काम किया, लेकिन वेतन नहीं लिया. उत्तर-पूर्व पर्वतीय विश्वविद्यालय के कुलपति भी रहे. डॉ शर्मा 132 किताबें लिख चुके हैं. कुछ साल पहले सुकमा के पूर्व जिलाधिकारी एलेक्स पॉल मेनन का जब नक्सलियों ने अगवा कर लिया, तो डॉ शर्मा भारत सरकार व नक्सलियों के बीच वार्ताकार की भूमिका अदा कर फिर चर्चा में आये.  2013 में करीब एक महीने तक साहित्यकार डॉ नंदकिशोर नंदनजी के मुजफ्फरपुर स्थित आवास पर बीडी शर्मा स्वास्थ्य लाभ ले रहे थे. इसी दौरान उनसे मुलाकात का मौका मिला.

डॉ बीडी शर्मा कहते हैं, मैंने सौ से अधिक किताबें लिखी हैं. पर लगता है कि बहुत कम किताबें लिखी हैं. आम आदमी, आदिवासियों, गरीबों के पास इतनी पीड़ा है, इतनी समस्याएं हैं कि पोथा लिख डालो, कम ही पड़ेगा. कानून आदमी के लिए होता है. आदमी कानून के लिए नहीं. जब-जब लगा कि कानून आम आदमी व आदिवासियों के हित में नहीं है, मैंने उसे नहीं माना. दरअसल, देश के सामने सबसे बड़ा संकट यह है कि हम अमेरिकी साम्राज्यवाद की चंगुल में फंसे हैं. देश में ईमानदारी नहीं है. जिसे देखो, वही लाख-करोड़ लेकर जेब में घूम रहा है. जब मैं कलक्टर था, तब सबसे बड़े अधिकारी का वेतन साढ़े तीन हजार था. आज तो लाखों में वेतन पाने वाले अधिकारी हैं. वेतनमान में इतना बड़ा अंतर है, आमदनी में इतनी विषमता है कि समाज का विकास क्या होगा?

डॉ शर्मा देश की समस्यायों से चिंतित हैं. वे कहते हैं, मैं कभी सर्किट हाऊस में नहीं रहा. कलक्टर रहते आदिवासियों की झोपड़ियों में रात बीता कर उनकी जिंदगी को निकट से देखा. भगवान ने आदिवासियों को क्या नहीं दिया है. जल, जंगल, जमीन एवं तमाम तरह के प्राकृतिक संसाधन दिया, फिर भी वे गरीब बने हैं. आखिर इसका जिम्मेवार कौन है? आम आदमी के बुनियादी अधिकारों की आज किसी को चिंता नहीं है. नक्सल का मुद्दा कॉम्लेक्स इश्यू है. आज के अधिकारी, नीति-निर्धारक एसी कमरा व सर्किट हाऊस छोड़ना नहीं चाहते हैं. ऐसे में जनता क्या करेगी? उनका आक्रोश बाहर तो आयेगा ही न.

डॉ बीडी शर्मा बताते हैं कि बस्तर का कलक्टर रहते हुए 1975 में मैंने जिले में शराब के ठेके को बंद करा दिया. शराब से जिले को सालाना एक करोड़ की आमदनी होती थी, कमिश्नर ने शराब के ठेके के लिए टेंडर निकालने के लिए चिट्ठी जारी की, तो मैंने साफ-साफ कह दिया था कि मैं ईमानदारी से कलक्टर की ड्यूटी करूंगा. बस्तर के जंगल में रहनेवाले आदिवासियों की जिंदगी को शराब ने उजाड़ बना दिया है. इसलिए मैंने ठेके पर रोक लगा दी. अंतत: उस साल जिले को शराब से मात्र  20 हजार की कमाई हुई. आज की स्थिति है कि घर-घर में शराब की दुकान खुल गयी है.  

‘टूटे वायदों का अनटूटा इतिहास’ पुस्तक में मैंने लिखा है कि कैसे पूंजीवादी और साम्राज्यवादी ताकतें एक गहरी साजिश के तहत समाज को तोड़कर इंसान को अकेला मरने  को छोड़ दिया है. देश के संसाधनों की लूट और आमलोगों के लिए गुलामी से बदतर जिंदगी  हम देख रहे हैं. इसी अंतर्विरोध को देखते हुए भारत जन आंदोलन का गठन किया.

संतोष सारंग के ब्लाग से साभार.



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