जेटली के डर के मारे चैनलों ने कीर्ति आज़ाद की प्रेस कान्फ्रेन्स को कवर नहीं किया!

Om Thanvi : कीर्ति आजाद की प्रेस कांफ्रेंस के रोज कल क्या तमाम मीडिया ने रविवार की छुट्टी रख ली थी? फर्ज करें कीर्ति आजाद यही पर्दाफाश अरविंद केजरीवाल या मनमोहन सिंह के खिलाफ कर रहे होते? न सिर्फ ‘पीसी’ लाइव होती, हर टीवी स्टूडियो में दो-चार टीकाकार भी जमे बैठे होते। वैसे हैरानी इस पर भी हुई कि अरुण जेटली ने कीर्ति आजाद को मानहानि की कसरत से बाहर क्यों रखा है? असल आग तो कीर्ति की लगाई हुई है! लगता है देर-सबेर उनके सुधर या सुधार दिए जाने की आशा वित्तमंत्री को है। हालाँकि आजाद लम्बी लड़ाई लड़ने और उसके लिए पार्टी में शहीद होने को भी तैयार लगते हैं। शत्रुघ्न सिन्हा हों, चाहे कीर्ति आजाद – बिहार का बंदा जब बोलता है तो हर कीमत पर बोलता है!

Sheetal P Singh : राजीव शुक्ला का चैनल न्यूज २४ और अरनब गोस्वामी का टाइम्स नाऊ, रजत शर्मा का इंडिया टीवी, दीपक चौरसिया का इंडिया न्यूज कीर्ति आज़ाद की प्रेस कान्फ्रेन्स नहीं दिखा रहे। कुछ आधा अधूरा छोड़ भाग रहे हैं या जवाबी क़व्वाली में हैं जैसे आजतक! यह सब पत्रकारिता की निष्पक्षता का नमूना है! दिमाग़ पर ताले। जेटली जी ने सुनिश्चित किया कि उनके चैनल उनके डी डी सी ए के मामले से संबंधित कीर्ति आज़ाद की प्रेस कान्फ्रेन्स कवर नहीं करेंगे। बल्कि वे सहवाग, गंभीर, शर्मा और कोहली द्वारा उनकी तारीफ़ वाली क्लिप चलायेंगे। कुछ चैनल (आजतक टाइप) घिघियाये कि सर मेरी टीआरपी ख़राब जायेगी (इज़्ज़त की कोई चिंता नहीं) उन्हे कहा गया कि साथ में बहस चलाइये और चेतन चौहान और डी डी सी ए के एक चंपू से जवाबी क़व्वाली कराते रहिये। कनफ्यूज कर दीजिये।

हम जानते हैं कि सीएनएन बीबीसी और तमाम पश्चिमी चैनल एक ख़ास तरह की आजादी का इस्तेमाल करते हैं। जब सद्दाम हुसैन को ज़बरदस्ती WMD के आरोपों का दोषी ठहराया गया तब इन चैनलों /एजेंसियों में सद्दाम की तानाशाही / उसके बेटे उदय के आपराधिक कारनामे / कैमिकल हथियारों के प्रयोग आदि की ख़बरों की बाढ़ लाई गई। हमारे दिमाग़ों में भी सद्दाम की वह छवि बन गई जैसी अमरीकी सरकार चाहती थी। सद्दाम को ठोक दिया गया। ईराक़ को फूँक डाला गया। लाखों लोग मारे गये /अपाहिज हुए/ आज भी मारे जा रहे हैं! कहीं कोई WMD नहीं मिले। सिवाय उस जूते के जो एक ईराकी पत्रकार ने बुश पर दे मारा, कुछ नहीं हुआ जो कि इतने बड़े हत्यारे के लिये दरकार था, दरअसल हम तो लगभग भूल ही चुके हैं कि कोई सद्दाम हुसैन भी था जिसकी कम से कम “भारत” नाम की राजनैतिक इकाई से अच्छी खासी दोस्ती थी!

ऐसे ही चैनलों / सोशल मीडिया पर मर्ज़ी के अनुसार नायक खलनायक गढ़े जा रहे हैं / जाते हैं और हम उस भावना में बह / बहा दिये जाते हैं जो उसके पीछे से टारगेट कर रही होती है। इसलिये हर सूचना के स्त्रोत और मंत्व्य पर शक करने / जाँच करने की ज़रूरत है। हर पोस्ट डालने वाले पर शक करें। किराये पर हैं बहुतेरे। फोटोशाप आम है। धार्मिक प्रचार वाले न्यूजमैन बनकर पेश हैं। कइयों की प्रोफ़ाइल मादा है पर वे हैं नर!

कोई नौजवान २४ घंटे सोशल मीडिया पर है तो ज़रूर कोई बात है। गर उसकी प्रोफ़ाइल ज़ाहिर नहीं करती तो मान लीजिये वह troll है। मैं पाता हूँ कि सैकड़ों प्रोफ़ाइलें गुजरात मध्यप्रदेश उत्तर प्रदेश बिहार आदि से चौबीसों घंटे दिल्ली की आधी अधूरी केजरीवाल सरकार पर ही टिप्पड़ी करती मिलती हैं। गोकि उनके अपने राज्यों में न ठंड पड़ती है न गरमी , न बस एक्सीडेंट होता है न रेप/डकैती/हिंसा। सब कुछ सिर्फ दिल्ली में ही हो रहा है / होता है? बड़ा ही कठिन दौर है। फ़ेसबुक के मालिक भी लगातार शिकार पर हैं। चोला बदल बदल कर लोगों से इंटरनेट वाले प्रस्ताव पर TRAI के लिये दस्तखत बटोरने में लगे हैं। ये तो बहुत ही बड़ा ख़तरा है!

कुछ प्रोफ़ाइलें चौबीस घंटे इस्लाम में कौन नया आया (ज़्यादातर पश्चिमी ) की सूचनायें देती रहती हैं कि “सब आ गये हैं तुम भी आ जाओ”, सीरिया में सप्लाई भेजनी है। हिन्दू कैलेंडर टाँग कर इतने लाइक पर ये पैकेज और उसने ये किया तो वो पाया वाले तो रोज़ाना अग़ल बग़ल घूमते फँसाते रहते ही हैं। तो बड़ी झंझटों में है आदमी की जान। सबको अपना माल चेपना है हमारी खोपड़ी में, ताले डाल के रक्खो भाया!

वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी और शीतल पी. सिंह के फेसबुक वॉल से.



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