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सुख-दुख

जियो का जलवा खत्म, कछुवा स्पीड प्रदाता मुकेश अंबानी पर नकेल कौन कसे?

Ashwini Kumar Srivastava : तकरीबन साल भर पहले मुकेश अम्बानी के झांसे में मैं भी आ गया था और न सिर्फ अपने मोबाइल में बल्कि घर में भी जियो फाई इस्तेमाल करने लगा था। लेकिन वह दिन है और आज का दिन, तबसे मैं लगातार इंटरनेट की कछुवा स्पीड और डाटा बेहद तेज रफ्तार से हवा होने यानी खत्म होने की पहेली नहीं सुलझा पाया हूँ।

इधर कई बार सुस्त चाल की शिकायत की लेकिन कुछ देर तेज चल कर यह फिर वही बैलगाड़ी की रफ्तार पकड़ लेता है। जापान में रहने वाले मेरे बड़े भाई के बेटे बताते हैं कि वहां तो कभी बफरिंग उन्होंने देखी ही नहीं। जबकि यहां तो जियो से वीडियो की बात ही क्या, एक साधारण तस्वीर या वेबसाइट भी बिना वक्त बर्बाद किये खुलती ही नहीं है। हालांकि इससे पहले मैंने पहले एयरटेल को दो तीन साल और बाद में तिकोना के ब्रॉडबैंड को एक-दो बरस घर में चलाया है लेकिन उनमें स्पीड कभी प्रॉब्लम नहीं रही।

एयरटेल से अच्छे प्लान तिकोना के लगे और तिकोना के बाद जियो के, इसलिए ब्रॉडबैंड बदलता रहा। मगर अब जियो ने एक साल बाद बहुत पुराना दिव्य ज्ञान मुझे भी दे दिया है कि महंगा रोये एक बार और सस्ता रोये बार बार। मोदी जी देश के प्रधानमंत्री हैं और मुकेश अम्बानी को उनकी सरपरस्ती खुलेआम हासिल है। एक देश का प्रधानमंत्री और अरबों भक्तों का आराध्य है तो दूसरा प्रधानमंत्री का चहेता तो है ही, देश और दुनिया का शीर्ष उद्योगपति भी है। इसलिए फाल्स बिलिंग या झूठे वादे जैसे आरोप लगाकर जियो में किसी घोटाले की शंका करने का मतलब आ बैल मुझे मार जैसा ही है।

लिहाजा मैंने चुपचाप जियो से किनारा करके सरकारी कंपनी बीएसएनएल से ही ब्रॉडबैंड लेने का आवेदन कर दिया है। घर के लिए भी और अपने आफिस के लिए भी। इससे न तो मोदी जी की महिमा पर कोई छींटाकशी होगी और न ही मुकेश भाई की शान में कोई गुस्ताखी।

जो लोग बीएसएनएल इस्तेमाल कर रहे हैं, उनका अनुभव यह है कि रफ्तार और बेहतरीन प्लान के मुकाबले में बीएसएनएल का कोई सानी नहीं है। बाकी जियो के साथ-साथ निजी क्षेत्र के ही ब्रॉडबैंड को ही अलविदा कहने के बाद बहुत संकोच से इतना ही कहूंगा गुरु कि मनमोहन के टाइम में मोबाइल और ब्रॉडबैंड ने जो दुनिया से टक्कर ली थी, वह दौर इस पीढ़ी ने देखा ही नहीं, इसलिए वह नहीं समझ पाएगी। संकोच के साथ इसलिए कहना पड़ रहा है क्योंकि मोदी के भक्तगण इससे खासे खफा हो जाएंगे।

लेकिन यह सच्चाई है कि तब भारत के निजी क्षेत्र ने मोबाइल तकनीक, ब्रॉडबैंड की स्पीड, नेटवर्क आदि मामलों में दुनिया के विकसित देशों से टक्कर ले ली थी। आज तकरीबन सारी निजी मोबाइल और ब्रॉडबैंड कंपनियां दुनिया।के विकसित देशों से तो टकराने की सोच भी नहीं सकतीं क्योंकि जियो को जिस तरह खुद प्रधानमंत्री की तरफ से अभयदान मिला हुआ है, उससे वे सब अपने अस्तित्व की ही लड़ाई लड़ रही हैं। कोई नहीं है देखने और जांच करने वाला कि जियो जो कह या कर रही है, वह वास्तव में कारोबारी मानकों पर खरा उतर रहा है या नहीं।

कोई विकसित देश होता तो गैर कारोबारी नीतियों या कार्यों के चलते जियो की अब तक खटिया ही खड़ी हो गई होती। ताजा उदाहरण मोदी जी के ही एक और प्रिय और ‘बालसखा’ अडानी का ही ले लीजिये, जिन्हें ऑस्ट्रेलिया समेत कुछ देशों में न सिर्फ जनता, मीडिया और कोर्ट खदेड़ रहे हैं बल्कि खुद वहां की सरकार भी इनके पीछे पड़ी है। आरोप उन पर भी वहां यही हैं, जिसका शक मुकेश अम्बानी पर यहां किया जाता है। गैर प्रतिस्पर्धी और गैर कारोबारी कार्यप्रणाली अपनाने का। मगर यहाँ तो वही मुहावरा है न कि जब सैंया भये कोतवाल…तो अब डर काहे का।

दिल्ली में कई अखबारों में पत्रकार रहे और आजकल लखनऊ में बतौर उद्यमी सक्रिय अश्विनी कुमार श्रीवास्तव की एफबी वॉल से.

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1 Comment

1 Comment

  1. Navjot

    April 23, 2018 at 5:15 pm

    Congress ke time me 1000 rupees me 512kbs ki speed milti thi, aaj utne rupees me 10 mbps mil rhi hai. Har cheej ke liye Modi ko kosna jaroori hai. Jio se dikkat hai to Airtel chla lo isme Modi kya karenge.

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