जियो का जलवा खत्म, कछुवा स्पीड प्रदाता मुकेश अंबानी पर नकेल कौन कसे?

Ashwini Kumar Srivastava : तकरीबन साल भर पहले मुकेश अम्बानी के झांसे में मैं भी आ गया था और न सिर्फ अपने मोबाइल में बल्कि घर में भी जियो फाई इस्तेमाल करने लगा था। लेकिन वह दिन है और आज का दिन, तबसे मैं लगातार इंटरनेट की कछुवा स्पीड और डाटा बेहद तेज रफ्तार से हवा होने यानी खत्म होने की पहेली नहीं सुलझा पाया हूँ।
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नीता अंबानी की अय्याशियां!

Ashwini Kumar Srivastava : 315 करोड़ रुपये का मोबाइल…3 लाख रुपये की चाय…40 लाख का पर्स….पूंजीवाद का असली और घिनौना रूप अगर देखना है तो इस खबर को पढ़िए। इनका बस चलता तो ऊपरवाले से यह धूप और हवा भी ब्रांडेड खरीदते ताकि करोड़ों-अरबों खर्च करके यह महज इतना दिखा सकें कि ये धरती के बाकी इंसानों से अलग हैं। सरकार की मेहरबानियों से जनता की गाढ़ी कमाई को अपनी कंपनियों के जरिये चूस कर और फिर पानी की तरह बहाकर ये पूंजीपति बेहिसाब अय्याशियां करते हैं…वह भी उस देश और समाज में, जहां एक टाइम का खाना-पानी, कपड़े और सर पर छत के लिए न जाने कितने लोग रोज अपनी जान गंवा रहे हैं…

कितने बच्चे शिक्षा के लिए तरस रहे हैं तो कितने गरीब स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव में दम तोड़ रहे हैं। ऐसे संवेदनहीन और अय्याश पूंजीपतियों को भी सरकार तमाम रियायतें देकर, हजारों-लाखों करोड़ के इनके कर्ज माफकर, इनके साथ गलबहियां और सांठगांठ कर असमान पूंजी वितरण का यह वीभत्स तमाशा जनता को दिखा रही है। काश कि ऐसा हो पाता कि हर कंपनी के मालिक, निदेशक या उच्च अधिकारियों की निजी तनख्वाह या पूंजी पर किसी तरह की लिमिट लगाई जा सकती ताकि बेहिसाब और अकूत सम्पति का मालिक बनकर उसे इस कदर वाहियात तरीकों से लुटाने की बजाय उसे तनख्वाह या मुनाफे के रूप में कर्मचारियों, शेयर धारकों तक समान रूप से बांटा जा सकता। कुछ नहीं हो सके तो कम से कम किसी चैरिटी संस्थान तक ही यह धन पहुंचाया जा सकता ताकि जरूरतमंद और गरीब ही इस अकूत संपदा और लूट की रकम से अपना जीवन तो बचा सकें।

पूंजीवाद का बस चले तो पूंजीपतियों के जरिये वह धूप, हवा और हरियाली भी ब्रांड में बदल दे। वैसे भी भारत में पूंजीवाद से अब बचा ही क्या है? इंसान की चमड़ी, खून या कोई भी अंग-प्रत्यंग हो, प्रकृति में कल कल बहता पानी हो ..सब अब बिक्री के लिए उपलब्ध है…बाजार में अलग अलग ब्रांड इस सृष्टि के कतरे कतरे को ज्यादा से ज्यादा दाम में बेचने की होड़ में हैं। जिनके पास पैसा है, वह प्रकृति के दिये हुए मुफ्त उपहारों को भी महँगे दामों में खरीद कर अय्याशियां कर रहे हैं…जिनके पास नहीं है, वह या तो घुटन भरी जिंदगी जी रहे हैं…या जरूरी सुविधाओं के अभाव में दम तोड़ दे रहे हैं। नीता अंबानी की तरह कोई दिनभर में करोड़ों की चाय पी या पिला रहा है तो कोई इस लिए दम तोड़ दे रहा है कि उसके पास दवाई खरीदने के पैसे नहीं हैं…पूंजी का असमान वितरण होना अवश्यम्भावी है इसलिए यह तो नहीं कहा जा सकता कि सबके पैसे या सम्पति छीन कर गरीबों में बांट दो…लेकिन सरकार इतना तो कर ही सकती है कि निजी पूंजी या वेतन पर पदों के हिसाब से निजी क्षेत्र में भी कोई लिमिट तय कर दे।

लखनऊ के पत्रकार और उद्यमी अश्विनी कुमार श्रीवास्तव की एफबी वॉल से.

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मुकेश अंबानी अपने छोटे भाई अनिल अंबानी के कारोबार को लील गए!

तकनीक के तेवर रिश्तों को तहस नहस कर रहे हैं। मुकेश अंबाजी और अनिल अंबानी को ही देख लीजिए। दोनों भाई हैं। सगे भाई। धीरूभाई अंबानी के स्वर्ग सिधारते ही रिश्तों में दूरियां आ गई थी, और दोनों मन से बहुत दूर हो गए। फिर मोबाइल फोन के जिस धंधे में अनिल अंबानी थे, उसी मोबाइल की दुनिया में कदम रखते ही मुकेश अंबानी ऐसा भूचाल ले आए कि उनके स्मार्टफोन और फ्री डेटा से अनिल अंबानी की दुनिया न केवल हिलने लगी, बल्कि गश खाकर धराशायी हो गई। इन दिनों अनिल अंबानी की नींद उड़ी हुई है। वे धंधा समेटने की फिराक में है। वैसे भी वे कोई मुनाफे का धंधा नहीं कर रहे हैं। भारी कर्ज का बोझ उनके सर पर है और बहुत आसानी से इससे उबरने की फिलहाल कोई गुंजाइश नहीं है।

मुकेश अंबानी अपने रिलायंस जियो के जरिए मोबाइल की दुनिया में तूफान खड़ा किए हुए है, तो अनिल अंबानी के रिलायंस कम्यूनिकेशन (आरकॉम) की नैया उस तूफान में हिचकोले खा रही है। वैसे, यह कहने को हर कोई आजाद है कि मुकेश अंबानी को ऐसा नहीं करना चाहिए था। भाई द्वारा भाई की मदद करने के विषय पर बहुत साल पहले एक फिल्म आई थी, नाम था – भाई हो तो ऐसा। लेकिन लेकिन इस उल्टी गंगा को देखकर यही तथ्य अब सवाल की मुद्रा में हमारे देश में पूछा जा रहा है कि – भाई हो तो ऐसा ऐसा ? मुकेश अंबानी के जियो के आते ही तीन महीने में ही अनिल की कंपनी को कुल एक हजार करोड़ का नुकसान हुआ है। जी हां, एक हजार करोड़। हमारे हिंदुस्तान की सवा सौ करोड़ जनता में से एक सौ चौबीस करोड़ लोगों को अगर यह पूछा जाए कि एक करोड़ में कितने शून्य होते हैं, तो वे बता भी नहीं पाएंगे। मगर, यहां तो मामला एक हजार करोड़ के नुकसान का है।

रिलायंस जियो की लांचिंग से हालांकि सभी टेलिकॉम आपरेटर की कमाई को जबरदस्त झटका लगा है। लेकिन अनिल अंबानी के आरकॉम पर जियो ने कुछ ज्यादा ही करारी चोट की है। मुकेश अंबानी के मोबाइल फोन और इंटरनेट की कदम रखते ही अनिल अंबानी की हालत खराब है। अनिल परेशान हैं। आरकॉम के आंकड़ों को देखकर डरावनी तस्वीर सामने आ रही है। बड़ी संख्या में इनिल अंबानी के ग्राहक आरकॉम छोड़कर जियो सहित दूसरे ऑपरेटरों की सर्विस ले रहे हैं। हालांकि एयरटेल, वोडाफोन और आइडिया कुछ हद तक अपने ग्राहकों को सहेजने में सफल रहे हैं। लेकिन आरकॉम को अपने डेटा ग्राहकों के मामले में भी बहुत बड़ा नुकसान उठाना पड़ा है। एक साल पहले आरकॉम के पास 38.9 मिलियन ग्राहक थे। लेकिन 2017 की आखिरी तिमाही में उसके पास सिर्फ 28.3 मिलियन ग्राहक बचे हैं। मतलब, करीब 10 मिलियन ग्राहक उन्हें छोड़ गए हैं।

देश के बड़े कर्जदारों में अनिल अंबानी का नाम लगातार शिखर की ओर बढ़ रहा हैं। वे लगातार कर्ज के बोझ तले दबते जा रहे हैं और हालात यह हैं कि जिनकी उनकी सकल संपत्ति है, उससे ज्यादा उन पर कर्ज है। अनिल अंबानी की रिलायंस को उधार देने वालों की नींद उड़ी हुई है और इस कंपनी में जिन्होंने निवेश किया है, वे भी परेशान हैं। मार्च 2017 के जाते जाते अनिल अंबानी की कंपनी आरकॉम कुल 45 हजार 733 करोड़ रुपये के कर्ज के बोझ तले आ गई है। अनिल अंबानी की आरकॉम का भविष्य कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा है। बीते साल की आखरी तिमाही के नतीजों में कंपनी में रेवेन्यू तो बड़ी मात्रा में घटी ही है, आरकॉम के नेट प्रॉफिट में भी बहुत बड़ी गिरावट आई है। आंकड़ों पर नजर डालें, तो सन 2017 में जनवरी – मार्च की तिमाही में कंपनी को कुल 948 करोड़ रुपये का घाटा झेलना पड़ा है। मतलब करीब एक हजार करोड़ का घाटा। मतलब साफ है कि आनेवाले दिनों में अनिल अंबानी की तरफ से कोई बड़ी खबर सुनने को मिल सकती है। 

छोटे भाई अनिल अंबानी कर्जे के इस बोझ को कम करने का मन बना चुके हैं। इसके लिए वे अपना मोबाइल टॉवर का कारोबार बेचने की तैयारी में हैं। आरकॉम के मोबाइल टॉवर कारोबार की कुल कीमत करीब 25 हजार करोड़ रुपये मानी जा रही है। ब्रूकफील्ड नाम की कंपनी इसके लिए तैयार भी है। अनिल अंबानी आश्वस्त हैं कि इसके अलावा थोड़ी बहुत रकम उन्हें अपनी कंपनी के एयरसेल के साथ मर्जर से भी मिल ही जाएगी। सो, वे इस संकट से पार पा लेंगे। लेकिन फिर भी रिलायंस को उधार देने वालों की नींद उड़ी हुई है और अनिल अंबानी की कंपनी में निवेश करनेवालों को अपने भविष्य पर संकट दिख रहा है।

बीते एक साल के दौरान शेयर मार्केट में रिलायंस कंम्यूनिकेशन के शेयर लगभद 40 फीसदी टूट चुके हैं। बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज में उनके शेयर काफी नीचे उतर गए हैं। नैशनल स्टॉक एक्सचेंज पर भी कंपनी का शेयर 20 फीसदी से अधिक कमजोर हुए। मुकेश अंबानी की रिलायंस जियो की आक्रामक मार्केटिंग और बेहद कम कीमत रखने की नीति के कारण छोटे भाई अनिल अंबानी की कंपनी रिलायंस कम्युनिकेशंस को सबसे ज्यादा नुकसान हुआ है। यह सब इसलिए हैं क्योंकि धंधे में कोई किसी का भाई नहीं होता।

लेखक निरंजन परिहार मुंबई के वरिष्ठ पत्रकार हैं.

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इंडिया टीवी ने आजतक की बैंड बजा दी, अंबानी के चैनल के अच्छे दिन आए

इस साल के छठें हफ्ते की टीआरपी में कई बड़ी और नई बातें हैं. सबसे पहले ये कि अंबानी के चैनल के अच्छे दिन आ गए हैं. लगता है अंबानी की नजर टीआरपी मापने वाली संस्थाओं पर पड़ गई है जिसके कारण टीआरपी ने बंपर उछाल मारा है. पहले आईबीएन7 और आजकल न्यूज18इंडिया के नाम से चलाए जा रहे अंबानी के चैनल की टीआरपी इस कदर बढ़ी कि वह सीधे नंबर चार पर आ पहुंचा है. लगातार सात-आठ नंबर पर रहने वाला चैनल अगर अचानक चार नंबर पर आ जाए तो लगता है कि कुछ तो खेल है.

उधर, आजतक चैनल पूरी तरह चौपट हो गया लगता है. इंडिया टीवी ने आजतक की बैंड बजा दी है. इंडिया टीवी इस हफ्ते भी न सिर्फ नंबर वन है बल्कि अपनी कुर्सी की मजबूती दी है. नंबर दो आजतक से इंडिया टीवी ने अपना फासला बढ़ा लिया है. इस हफ्ते जिन दो चैनलों को सबसे ज्यादा टीआरपी मिली है, वे इंडिया टीवी और न्यूज18 इंडिया ही हैं. देखें आंकड़े….

Weekly Relative Share: Source: BARC, HSM, TG:CS15+,TB:0600Hrs to 2400Hrs, Wk 6

India TV 16.7 up 1.5
Aaj Tak 15.4 up 0.2
Zee News 11.9 dn 0.7
News18 India 11.0 up 1.5
ABP News 10.8 same 
India News 10.2 dn 0.5
News 24 8.9 dn 1.3
News Nation 8.7 dn 0.5
Tez 2.7 same 
NDTV India 2.1 same 
DD News 1.6 dn 0.1

TG: CSAB Male 22+

India TV 17.7 up 2
Aaj Tak 14.6 dn 0.2
Zee News 12.6 dn 0.9
News18 India 12.2 up 1.8
ABP News 10.6 dn 0.5
News Nation 8.9 dn 0.7
India News 8.3 dn 0.1
News 24 7.9 dn 1.3
Tez 3.0 up 0.2
NDTV India 2.7 same 
DD News 1.5 dn 0.2

इसके पहले वाले हफ्ते का हाल जानें….

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मुंबई के बाद अब दिल्ली एचटी को भी रिलायंस को बेचे जाने की चर्चा

देश भर के मीडियामालिकों में हड़कंप, कहीं मुफ्त में ना अखबार बांटने लगे रिलायंस…

देश के सबसे बड़े उद्योगपति रिलायंस वाले मुकेश अंबानी द्वारा मुंबई में एचटी ग्रुप के अखबार मिन्ट और फ्लैगशिप हिन्दुस्तान टाईम्स खरीदने की चर्चा के बाद अब यह चर्चा भी आज तेजी से देश भर के मीडियाजगत में फैली है कि मुकेश अंबानी ने दिल्ली में भी हिन्दुस्तान टाईम्स के संस्करण को खरीद लिया है। हालांकि अभी तक इसकी पुष्टि नहीं हो पायी है। हिन्दुस्तान टाईम्स के दिल्ली संस्करण में कर्मचारियों के बीच आज इस बात की चर्चा तेजी से फैली कि रिलायंस प्रबंधन और हिन्दुस्तान टाईम्स प्रबंधन के बीच कोलकाता में इस खरीदारी को लेकर बातचीत हुयी जो लगभग सफल रही और जल्द ही हिन्दुस्तान टाईम्स पर रिलायंस का कब्जा होगा।

रिलायंस के प्रिंट मीडिया में आने और हिन्दुस्तान टाईम्स को खरीदने की चर्चा के बाद आज देश भर के नामी गिरामी अखबार मालिकों में हड़कंप मच गया। सभी बड़े अखबार मालिकों में इस बात का डर सताने लगा है कि कहीं जिस तरह रिलायंस ने जियो को लांच कर लोगों को मुफ्त में मोबाईल सेवा प्रदान कर दिया या रिलायंस के आने के बाद जिस तरह मोबाईल फोन जगत में रिलायंस का सस्ते दर का मोबाईल छा गया कहीं इसी तरह प्रिंट मीडिया में भी आने के बाद रिलायंस लोगों को मुफ्त अखबार ना बांटने लगे। ऐसे में तो पूरा प्रिंट मीडिया का बाजार उसके कब्जे में चला जायेगा।

यही नहीं सबसे ज्यादा खौफजदा टाईम्स समूह है। उसे लग रहा है कि अगर रिलायंस हिन्दुस्तान टाईम्स को मुफ्त में बांटने लगेगा या कोई लुभावना स्कीम लेकर आ गया तो उसके सबसे ज्यादा ग्राहक टूटेंगे और उसके व्यापार पर जबरदस्त असर पड़ेगा। आज देश भर के मीडियाकर्मियों में रिलायंस द्वारा मुंबई में मिंट तथा फ्लैगशिप हिन्दुस्तान टाईम्स को खरीदने की खबर पर जमकर चर्चा हुयी।

कुछ लोगों ने जहां इस फैसले को खुशी भरा बताया वहीं कुछ इस बात से भी परेशान थे कि इस खरीदारी में क्या हिंदी वाले हिन्दुस्तान समाचार पत्र के संस्करण भी खरीदे गये हैं। फिलहाल हिन्दुस्तान के किसी भी संस्करण के रिलायंस द्वारा खरीदे जाने की कोई जानकारी नहीं मिली है। रिलायंस के प्रिंट मीडिया जगत में आने से छोटे और मझोले अखबार मालिकों में भी भय का माहौल है। उनको लग रहा है कि रिलायंस उनके बाजार को भी नुकसान पहुंचायेगा। फिलहाल माना जा रहा है कि रिलायंस जल्द ही अपना पूरा पत्ता हिन्दुस्तान टाईम्स को लेकर खोलेगा।

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्स्पर्ट
मुंबई
९३२२४११३३५


पत्रकार Praveen Dixit ने इस प्रकरण के बारे में एफबी पर जो कमेंट किया है, वह इस प्रकार है…

”The silent deal… Last week, HT chairperson Shobhana Bhartiya met up with Reliance supreme Mukesh Ambani. The idea was to sell Mint and eventually, the flagship, Hindustan Times. The second meeting between the merchant bankers in faraway Kolkata and the deal further cemented for Mint. Mint staffers in Mumbai have already moved into the office of CNBCNews18, some fired. This budget, the First Post and CNBC feeds went to Mint Live, an indication that things were working out to mutual benefit.”


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शोभना भरतिया ने एचटी ग्रुप को मुकेश अंबानी को बेचा!

मुंबई से एक बड़ी खबर आ रही है. हिंदुस्तान टाइम्स समूह को इसकी मालकिन शोभना भरतिया ने भारत के सबसे बड़े व्यापारी मुकेश अंबानी को बेच दिया है. हालांकि यह चर्चा कई दिनों से थी कि शोभना भरतिया एचटी समूह को बेच रही हैं लेकिन इस सूचना की पुष्टि नहीं हो पा रही थी. अब यह बात लगभग कनफर्म हो गई है कि मुकेश अंबानी सबसे बड़ा टीवी नेटवर्क खरीदने के बाद सबसे बड़ा प्रिंट नेटवर्क भी तैयार करने में लग गए हैं और इस कड़ी में एचटी ग्रुप को खरीद लिया है.

मुंबई से मीडिया एक्टिविस्ट शशिकांत सिंह ने भड़ास4मीडिया को सूचना दी है कि शोभना भरतिया मिंट व हिंदुस्तान टाइम्स मुकेश अंबानी को बेच रही हैं. हिंदुस्तान टाइम्स से आ रही बड़ी खबर के मुताबिक इसकी मालकिन शोभना भरतिया और रिलायंस कंपनी के मालिक मुकेश अंबानी के बीच एक बड़ी डील हो गई है जिसके तहत मुकेश अंबानी अखबार मिंट और फ्लैगशिप हिंदुस्तान टाइम्स को खरीद रहे हैं. इन दोनों अखबारों के मुम्बई के कर्मचारी अब रिलायंस के कर्मचारी होंगे और मुंबई के सीएनबीसी न्यूज़ 18 के कार्यालय में बैठेंगे.

सीएनबीसी न्यूज़18 पर रिलायंस का कब्जा है. आपको बता दूँ कि हिंदुस्तान टाइम्स और हिंदुस्तान के सैकड़ों कर्मचारियों ने जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड के अनुसार वेतन और एरियर की मांग को लेकर क्लेम भी लगा रखा है. कई मामलों में शोभना भरतिया को पार्टी भी बनाया गया है. बाजार में चर्चा है कि इस बड़ी डील में हिंदुस्तान टाइम्स और हिंदुस्तान अखबार समेत पूरे ग्रुप को खरीदने को लेकर भी मुकेश अंबानी और शोभना भरतिया के बीच बातचीत हुई है लेकिन फाइनल नतीजा क्या रहा, अभी तक इसकी पुष्टि नहीं हुई है.

इनपुट : मुंबई से पत्रकार और आरटीआई एक्टिविस्ट शशिकान्त सिंह. संपर्क  : 9322411335

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एबीपी न्यूज के पतन के कारण जी न्यूज नंबर तीन पर पहुंचा

साल 2017 के दूसरे हफ्ते की टीआरपी में जी न्यूज नंबर तीन पर पहुंच गया है. ऐसा एबीपी न्यूज चैनल की टीआरपी में भयंकर गिरावट के कारण हुआ है. न्यूज24 लगातार अच्छा प्रदर्शन कर रहा है और यह चैनल अब इंडिया न्यूज के काफी नजदीक पहुंच चुका है. इंडिया न्यूज की टीआरपी में भी सुधार है.

बुरा हाल न्यूज18 इंडिया का है जो पहले आईबीएन7 के नाम से जाना जाता था. लाख मेहनत करने के बावजूद अंबानी का यह चैनल उठ नहीं पा रहा है. यह अभी भी टाप टेन में नीचे से तीसरे स्थान पर है. यानि इसकी असल जगह नंबर सात है जो लगातार कायम है. देखें दूसरे सप्ताह के टीआरपी के आंकड़े…

Weekly Relative Share: Source: BARC, HSM, TG:CS15+,TB:0600Hrs to 2400Hrs, Wk 2′ 2017
Aaj Tak 17.0 up 0.1 
India TV 14.1 dn 0.2
Zee News 12.9 up 0.1 
ABP News 12.7 dn 1.4
India News 10.2 up 0.5
News 24 9.5 up 0.6
News Nation 8.9 up 0.4
News18 India 7.9 up 0.4
Tez 2.5 dn 0.2
NDTV India 2.4 same 
DD News 1.8 dn 0.2

TG: CSAB Male 22+
Aaj Tak 15.8 dn 0.3
India TV 14.9 dn 0.3
Zee News 13.3 up 0.1
ABP News 12.9 dn 1.2
News Nation 9.1 up 0.6
News18 India 8.9 up 0.5
India News 8.9 up 0.5
News 24 8.8 up 0.6
NDTV India 3.0 dn 0.1
Tez 2.7 dn 0.1
DD News 1.8 dn 0.2

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मोदी जी बेचेंगे मुकेश अंबानी के ‘जियो’ सिम!

Sheetal P Singh : मुकेश अंबानी ने अपनी कंपनी के “ब्रांड एंबेसडर” की घोषणा कर दी! श्री मोदी जी उनका “जियो” सिम बेचेंगे! टाइम्स आफ इंडिया के प्रथम पेज पर फ़ुल स्क्रीन सुशोभित हैं! सुबह वे रिलायंस के विज्ञापन में थे, शाम रिलायंस के चैनल पर साक्षात।

Yashwant Singh : 2 September 2016. आज राष्ट्रीय शर्म दिवस है. बूझे क्यों? हमारे देश का पीएम देश के सबसे बड़े कारपोरेट लुटेरे का प्रोडक्ट बेच रहा है. डील कितने की है? अब ना कहना भक्तों कि ना खाऊंगा ना खाने दूंगा. अब कहना- जमकर खाऊंगा, खुलकर खाऊंगा, डकार भी नहीं लूंगा. शेम शेम.

Priyabhanshu Ranjan : आपने अब तक तो सिर्फ ये देखा था कि मुकेश अंबानी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के कंधे पर हाथ रखकर बात करते हैं।  अब ये भी देख लें कि अंबानी अपनी कंपनी का प्रॅाडक्ट लॅांच करने के लिए प्रधानमंत्री का भी इस्तेमाल करने लगे हैं! मुझे पता है कि मोदी सरकार को इस विज्ञापन से कोई दिक्कत नहीं होगी, क्योंकि मोदी जी को प्रधानमंत्री पद की गरिमा का ख्याल ही कहां है। इस विज्ञापन में Crony Capitalism की साफ झलक दिखाई दे रही है!

Sandeep Verma : रिलायंस जियो द्वारा सस्ते इंटरनेट पैक के आफर ने बाजार में जो खलबली मचाई है ,उसको समझने के लिए थोड़ा पीछे जाना होगा . एक समय था जब सरकारी फोन कनेक्शन के लिए लम्बी लाइन और जुगाड़ के साथ लाईन मैन को रिश्वत तक देनी पड़ती थी. यह सरकारी कम्पनी की मोनोपोली की वजह से कम्पनी द्वारा ठगी जैसा कुछ था . फिर दौर आया मोबाईल कम्पनियों का और लैंडलाईन फोन का जनाजा उठ गया . बेहद महंगी सेवा बेचकर ठगी जैसा कर रही सरकारी कम्पनी को अचानक नुक्सान होने लगा . सरकार में बैठे लोगों ने प्राईवेट कम्पनियों से रिश्वत ले लेकर सरकारी कम्पनी को नुक्सान पहुचाकर उनकी अतिरिक्त मदद की. अब आते है जियो पर. प्राईवेट कम्पनियों ने कार्टेल यानी गिरोह बनाकर ग्राहकों को लूटना शूरू कर दिया .इसी गिरोहबंदी की वजह से भारत में इंटरनेट का रेट दुनिया में सबसे अधिक और स्पीड सबसे घटिया है. अजीब बात यह रही कि वोडाफोन जैसी विदेशी कम्पनी तक जनता को लूटने की इस गिरोह बंदी में शामिल हो गयी . मुकेश अम्बानी ने जियो के फ्री टेस्ट लांच के नाम पर ग्राहक छीनने का जो अभियान चलाया है, वह एयरटेल और वोडाफोन जैसी अब तक ठगी कर रही कम्पनियों के लिए सजा जैसा है . जैसी सजा सरकारी बीएसएनएल ने पायी वैसी ही सजा एयरटेल और वोडाफोन जैसी कम्पनियों को मिलने वाली है. यह अलग बात है अगले राऊंड में रिलायंस जियो ,एयरटेल और वोडाफोन सहित सभी कम्पनियां मिलकर गिरोहबंदी करके ग्राहकों को वैसे ही लूटना शुरू कर देंगी जिस तरह अभी तक कर रही थी. इसलिए अगर कुछ फ्री मिल रहा है तो आज भले ही लूट लें ,मगर अगले दौर में महंगा खरीदने के लिए तैयार भी रहिये. एयरटेल और वोडाफोन जैसी स्थापित कम्पनियां चाहे तो वे भी अगले छः महीने तक मुफ्त सेवा कार्यक्रम चलाकर भारतीय ग्राहकों को रोटी कपडा ना सही ,डेटागिरी करके कुछ दिन ही सही अच्छे दिन का मजा ले लेने दें.

सौजन्य : फेसबुक

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पांच साल बाद हर पत्रकार अंबानी की मुट्ठी में… सुनिये सम्मानित पत्रकार पी. साइनाथ के आशंकित मन की आवाज़

लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ यानी मीडिया के साथ एक समस्या यह है कि चारों स्तंभों के बीच यही इकलौता है जो मुनाफा खोजता है। भारत का समाज बहुत विविध, जटिल और विशिष्ट है लेकिन उसके बारे में जो मीडिया हमें खबरें दे रहा है, उस पर नियंत्रण और ज्यादा संकुचित होता जा रहा है। आपका समाज जितना विविध है, उतना ही ज्यादा एकरूप आपका मीडिया है। यह विरोधाभास खतरनाक है। बीते दो दशकों में हमने पत्रकारिता को कमाई के धंधे में बदल डाला है। यह सब मीडिया के निगमीकरण के चलते हुआ है। आज मीडिया पर जिनका भी नियंत्रण है, वे निगम पहले से ज्यादा विशाल और ताकतवर हो चुके हैं।

पिछले 25-30 साल में मीडिया स्वामित्व लगातार सिकुड़ता गया है। सबसे बड़े मीडिया तंत्र नेटवर्क 18 का उदाहरण लें। इसका मालिक मुकेश अम्बानी है। आप सभी ईटीवी नेटवर्क के तमाम चैनलों को जानते हैं। आपमें से कितनों को यह बात पता है कि तेलुगु को छोड़कर ईटीवी के बाकी सारी चैनल मुकेश अम्बानी के हैं? अगर हम लोग पांच साल और पत्रकारिता में टिक गए, तो यकीन मानिए हम सब का मालिक वही होगा। उसे अपने कब्जे वाले सारे चैनलों के नाम तक नहीं पता हैं, बावजूद इसके वह जब चाहे तब फतवा जारी कर सकता है कि चुनाव के दौरान आम आदमी पार्टी को कवर नहीं किया जाएगा। और ऐसा ही होता है। इन चैनलों का व्यावसायिक हित दरअसल इन्हें नियंत्रित करने वाले निगमों का व्यावसायिक हित है। इसलिए आने वाले वक़्त में कंटेंट पर जबरदस्त शिकंजा कसने वाला है।

पिछले 20 साल में मीडिया मालिक निगम ही नवउदारवाद और सार्वजनिक संसाधनों के निजीकरण के सबसे बड़े लाभार्थी रहे हैं। आज कोई इस बात को याद नहीं करता कि मनमोहन सिंह को शुरुआती पांच साल तक भगवान जैसा माना जाता था। 2009 में तमाम बड़े एंकरों ने कहा था कि यह जीत कांग्रेस पार्टी की जीत नहीं है बल्कि मनमोहन सिंह की जीत है, उनके किए आर्थिक सुधारों की जीत है। इस बार ध्यान से देखिएगा क्योंकि निजीकरण का अगला दौर आने ही वाला है। इससे किसे लाभ होगा? अगर खनन का निजीकरण हो जाता है तो टाटा, बिड़ला, अम्बानी और अडानी सभी लाभार्थी होंगे। अगर कुदरती गैस का निजीकरण हुआ तो एस्सार और अम्बानी को फायदा होगा। स्पेक्ट्रम से टाटा, अम्बानी और बिड़ला को लाभ होगा। आपके मीडिया मालिक निजीकरण की नीति के सबसे बड़े लाभार्थी बनकर सामने आएंगे। जब बैंकों का निजीकरण होगा तो ये लोग बैंक भी खोल लेंगे।

इन लोगों ने कुछ साल तक नरेंद्र मोदी जैसी शख्सियत को गढ़ने में काफी पैसा लगाया और इस प्रक्रिया में उनके विरोधियों को गुजरात व दिल्ली के कूड़ेदान में डाल दिया। मोदी अब तक उनके लिए कुछ नहीं कर पाए हैं और इन मीडिया मालिकों को नहीं मालूम कि अब क्या करना है। मोदी भूमि अधिग्रहण विधेयक लागू नहीं करवा पाए। वे तमाम काम करवा पाने में नाकाम रहे जिनका आपको बेसब्री से इंतजार था। वे लोग मोदी से खफ़ा हैं लेकिन उनके पास मोदी का विकल्प नहीं है। तो अब जाकर हम देख रहे हैं कि मीडिया में जहां-तहां हलकी-फुलकी शिकायतें आ रही हैं। मैं फिर से कहना चाहूंगा कि भारतीय मीडिया राजनीतिक रूप से मुक्त है लेकिन मुनाफे का गुलाम है। यही उसका चरित्र है।   

मीडिया का निगमीकरण कोई नई बात नहीं है लेकिन कई देशों के मुकाबले भारत में इसकी गति तीव्र है। अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया तो परिपक्वता के स्तर तक पहुंच चुके हैं। पिछले दस साल में अपने मीडिया पर नजर दौडाएं। पत्रकारिता पर असर डालने वाले तीन सबसे बड़े उद्घाटन मुख्यधारा की पेशेवर पत्रकारिता की देन नहीं हैं। ये तीन खुलासे हैं असांजे और विकीलीक्स, एडवर्ड स्नोडेन और चेल्सिया मैनिंग। आखिर ये खबरें पेशेवर समाचार संस्थानों से क्यों नहीं निकलीं? इसलिए क्योंकि हमारे समाचार संस्थान अपने आप में कारोबार हैं, सत्ता प्रतिष्ठान हैं। बाजार में इनका इतना ज्यादा पैसा लगा है कि ये आपसे सच नहीं बोल सकते। अगर शेयर बाजार को इन्होंने आलोचनात्मक नज़रिये से देखा, तो इनके शेयरों का दाम कम हो जाएगा। इन्हें वहां अपने लाखों शेयरों को पहले बचाना है और वे आपको कभी भी सच बताने नहीं जा रहे। चूंकि कमाई पत्रकारिता की मुख्य कसौटी हो गई है, तो हमें इन संस्थानों में प्राइवेट ट्रीटी जैसी चीजें देखने को मिलती हैं।

फर्ज कीजिए कि आप एक मझोले कारोबार से हैं जो लंबी छलांग लगाना चाहते हैं और मैं अंग्रेजी का सबसे बड़ा अखबार हूं। आप मेरे पास सलाह लेने आते हैं। मैं कहता हूं कि आइए एक प्राइवेट ट्रीटी पर दस्तखत कर दीजिए। इससे मुझे आपकी कंपनी में 10 फीसदी हिस्सेदारी मिल जाती है। ऐसा करने के बाद हालांकि मेरे अखबार में आपकी कंपनी के खिलाफ कोई भी खबर नहीं छप सकेगी। अब सोचिए कि यदि एक अखबार 200 कंपनियों में हिस्सेदारी खरीद ले, तो वह अखबार रह जाएगा या एक इक्विटी फर्म?

अच्छी पत्रकारिता का काम है समाज के भीतर संवाद की स्थिति को पैदा करना, देश में बहसों को उठाना और प्रतिपक्ष को जन्म देना। यह एक लोकसेवा है और जब हम इस किस्म की सेवा के मौद्रिकीकरण की बात करने लगते हैं, तो इसकी हमें एक भयंकर कीमत चुकानी पड़ती है। आइए, ज़रा ग्रामीण भारत का एक अंदाज़ा लगाएं कि वह कितना विशाल है- 83.3 करोड़ की आबादी, 784 भाषाएं जिनमें छह भाषाओं के बोलने वाले पांच करोड़ से ज्यादा हैं और तीन भाषाओं को आठ करोड़ से ज्यादा लोग बोलते हैं। दिल्ली की संस्था सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज की एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार ग्रामीण भारत को देश के शीर्ष छह अखबारों के पहले पन्ने पर केवल 0.18 फीसदी जगह मिल पाती है और देश के छह बड़े समाचार चैनलों के प्राइम टाइम में 0.16 फीसदी की जगह मिल पाती है।

मैंने ग्रामीण भारत में हो रहे बदलावों की पहचान के लिए पीपल्स आर्काइव ऑफ रूरल इंडिया की शुरुआत की थी। मैं जहां कहीं जाता हूं, लोग मुझसे पूछते हैं- आपका रेवेनु मॉडल क्‍या है? मैं जवाब देता हूं कि मेरे पास कोई मॉडल नहीं है, लेकिन पलट कर पूछता हूं कि अगर रचनाकार के लिए रेवेनु मॉडल का होना पहले ज़रूरी होता तो आज हमारे पास कैसा साहित्य या कलाकर्म मौजूद होता? अगर वाल्मीकि को रामायण या शेक्सपियर को अपने नाटक लिखने से पहले अपने रेवेनु मॉडल पर मंजूरी लेने की मजबूरी होती, तो सोचिए क्या होता? जो लोग मेरे रेवेनु मॉडल पर सवाल करते हैं, उनसे मैं कहता हूं कि मेरे जानने में एक शख्स है जिसका रेवेनु मॉडल बहुत बढि़या था जो 40 साल तक कारगर रहा। उसका नाम था वीरप्पन। उसके काम में कई जोखिम थे, लेकिन बिना जोखिम के कौन सा कारोबार होता है। जितना जोखिम, उतना मुनाफा।

देश में इस वक़्त जो राजनीतिक परिस्थिति कायम है, मेरे खयाल से वह हमारे इतिहास में विशिष्ट है क्योंकि पहली बार आरएसएस का कोई प्रचारक बहुमत के साथ प्रधानमंत्री बना है। पिछला प्रचारक जो प्रधानमंत्री हुआ, वह थका हुआ था। एक तो उसके साथ बहुमत नहीं था, दूसरे उसके एक सक्रिय प्रचारक होने और प्रधानमंत्री होने के बीच 40 साल का लंबा अंतर था जिसने उसे धीरे-धीरे नरम बना दिया था। बहुमत के साथ जब कोई प्रचारक सत्ता में आता है तो काफी बड़ा फर्क पड़ता है। काफी कुछ बदल जाता है। मीडिया दरअसल इसी नई बनी स्थिति में खुद को अंटाने की कोशिश कर रहा है। मेरा मानना है कि इस देश पर सामाजिक-धार्मिक कट्टरपंथियों और बाज़ार के कट्टरपंथियों का मिलाजुला कब्ज़ा है। दोनों को एक-दूसरे की ज़रूरत है। ऐसे में आप क्या कुछ कर सकते हैं? सबसे ज़रूरी बात यह है कि मीडिया के जनतांत्रीकरण के लिए लड़ा जाए- कानून के सहारे, विधेयकों के सहारे और लोकप्रिय आंदोलन खड़ा कर के। साहित्य, पत्रकारिता, किस्सागोई, ये सब विधाएं निगमों के निवेश से नहीं पैदा हुई हैं। ये हमारे समुदायों, लोगों, समाजों की देन हैं। आइए, इन विधाओं को उन तक वापस पहुंचाने की कोशिश करें।

बाल गंगाधर तिलक को जब राजद्रोह में सज़ा हुई, तब लोग सड़कों पर निकल आए थे और एक पत्रकार के तौर पर उनकी आजा़दी की रक्षा के लिए लोगों ने जान दे दी थी। मुंबई का मजदूर वर्ग ऐसा हुआ करता था। इनमें से कुछ ऐसे लोग थे जिन्हें पढ़ना तक नहीं आता था, लेकिन वे एक भारतीय के अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार को बचाने के लिए घरों से बाहर निकले। भारतीय मीडिया और भारतीय जनता के बीच इस कदर एक महान करीबी रिश्ता हुआ करता था। आपको मीडिया के जनतांत्रीकरण के लिए, सार्वजनिक प्रसारक के सशक्तीकरण के लिए लड़ना होगा। आपको मीडिया स्वामित्व पर एकाधिकार को तोड़ने में सक्षम होना होगा- यानी एकाधिकार से आज़ादी। मीडिया के मालिकाने में आपको विविधता बढ़ानी होगी। मीडिया जिस किस्म का एक निजी फोरम बनकर रह गया है, उसमें सार्वजनिक स्पेस को बढ़ाना होगा। मेरा मानना है कि इस स्पेस के लिए हमें लड़ने की ज़रूरत है। यह संघर्ष इतना आसान नहीं है, लेकिन इसे शुरू करना बेशक मुमकिन है।

ये देश के जाने माने पत्रकार पी साईंनाथ का मुंबई में 5 मार्च, 2016 को दिए गए भाषण का अंश है जिसे मीडिया विजिल डाट काम से साभार लेकर यहां प्रकाशित किया गया है.

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पीएम ने की महाराष्‍ट्र के इस गरीब कि‍सान से मुलाकात जिसका वजन 70 किलो गिर चुका है :)

नई दि‍ल्‍ली : सोमवार को देश की शुरुआत एक खुशनुमा दोपहर से तब हुई, जब चुनाव प्रचार के अपनी अति‍व्‍यस्‍त कार्यक्रम से मौका नि‍कालकर प्रधानमंत्री ने महाराष्‍ट्र के इस गरीब कि‍सान से मुलाकात की। इस कि‍सान की गुरबत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि गरीबी में इसका वजन 70 कि‍लो गि‍र चुका है।

जब इस बात की खबर प्रधानमंत्री को मि‍ली तो उन्‍होंने इस कि‍सान को सीधे गांव से बुलाया और अपने बेडरूम में मुलाकात करके सांत्‍वना दी।

पीएम से मि‍लने के बाद कि‍सान ने बताया कि पीएम ने उसके सारे कर्जे माफ करने का वादा कि‍या है। कि‍सान ने यह भी धमकी दी कि अगर पीएम ने उसके और उसके पि‍ता के सारे कर्जों को शीघ्र ही माफ न कि‍या तो उनका परि‍वार देशघाती कदम उठाने पर मजबूर होगा। स्रोत- सीटीआई

(उपरोक्त वयंग्य कथा के लेखक राहुल पांडेय दिल्ली में पत्रकार हैं. उनका यह लिखा उनके फेसबुक वॉल से लिया गया है.)

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शुक्रवार को Indian express भी उद्योगपति अंबानी का हो जाएगा!

मीडिया के भी अच्छे दिन आ रहे। हम आलोचनाएं कर रहे और वे सरकारी खजाने सोखकर अपना काम करने में लगे हुए हैं। वरिष्ठ पत्रकार शीतल पी सिंह ने अपने एफबी वॉल पर सूचना दी है कि Indian express भी शुक्रवार को अंबानी का हो जायेगा। 

संतोष गुप्ता रुद्रांश ने एक आँकड़ा एक पोस्ट पर चस्पाँ किया है । इसमें प्रस्तुत वह आंकड़ा है, जो बताता है कि यह लोगो का ही बैंकों में जमा किया गया पैसा है, जो धन्नासेठों को लोन के नाम पर ख़ैरात मिला है और यह मीडिया ख़रीदने की ताक़त देता है। ‘डेढ़ लाख करोड़ का लोन इन्हें मिला हुआ है, यही सब काम करने के लिए तो।’

दीपू नसीर का कहना है कि अगर यह खबर सच है तो एक्सप्रेस भी IBN 7 हो जाएगा, वह जानना चाहते हैं कि क्या जनसत्ता के मालिक भी अंबानी होंगे ? इजहार अहमद अंसारी लिखते हैं – ‘पत्रिकारिता जब से मीडिया बना, यही कोई 1994-95 से , तब से इस का चाल, चरित्र, और चेहरा बदलने लगा और अब तो अखबार को प्रोडक्ट कहने में गर्व करते हैं, सत्ता के दलाल इन पर शेयर मार्केट से कब्जा करते जा रहे हैं, ईस्ट इंडिया कंपनी से भी बड़ा साम्राज्य है अडानी और अम्बानी का।

जीतेन्द्र सिंह का मानना है कि अम्बानी अभी भारत का रुपर्ट मर्डोक है, मीडिया मुग़ल। पहले भी उसके शेयर कई जगह थे। डायरेक्ट या ट्रस्ट्स के थ्रू। अब पिछले साल से सीधे एक्वायर कर रहा है। अभी तमिलनाडु के अख़बारों और न्यूज़ चैनलों, जिस में सन टीवी भी है, एक्वायर किया है।

शीतल पी सिंह के एफबी वाल से

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आईबीएन7 के संपादक सुमित अवस्थी को दूसरे पत्रकार ने ‘Certified Modified journo’ करार दिया!

(वरिष्ठ पत्रकार और उद्यमी शीतल पी. सिंह)

शीतल पी. सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं. एक जमाने में चौथी दुनिया की लांचिंग टीम के हिस्सा थे. इंडिया टुडे में भी काम कर चुके हैं. अमर उजाला से अखबारी करियर शुरू करने से पहले शीतल सोशल और पोलिटिकल एक्टिविस्ट हुआ करते थे. देश समाज बदलने का जज्बा लिए ग्रासरूट लेवल यानि गरीबी के ग्राउंड जीरो पर काम किया करते थे. बाद में बिजनेस में आए और अपने उद्यम से आर्थिक रूप से समृद्ध हो गए. लेकिन इस भागमभाग में मीडिया कहीं पीछे छूट गया. अब फेसबुक और ट्विटर ने उन्हें फिर से लिखने कहने बोलने का माध्यम दे दिया है.

शीतल पी सिंह ने अपने फेसबुक वॉल पर आईबीएन7 के संपादक सुमित अवस्थी को Certified Modified journo करार दिया है. सुमित अवस्थी ने एक ट्वीट किया है जिसमें उन्होंने पीएम के डायरेक्ट आए मैसेज को दिखाया है और पीएम के एक साल पूरा होने पर उनकी तारीफ की है. दरअसल सुमित अवस्थी उसी आईबीएन7 के संपादक हैं जिसके मालिक मुकेश अंबानी हैं. मुकेश अंबानी ने लोकसभा चुनाव से पहले ही सबको कह दिया था कि इस बार मोदी का भरपूर सपोर्ट करना है. देखते ही देखते आईबीएन7 और सीएनएन-आईबीएन से मोदी को लेकर क्रिटिकल रुख रखने वालों को भगा दिया गया और मोदी भक्त पत्रकारों की जमात को जोड़ा जाने लगा.

नतीजा ये कि अब इन चैनलों में कोई बहस नहीं होती, एकतरफा दुष्प्रचार किया जाता है. मोदी और अंबानी को महफूज रखते हुए बाकी सभी पर ये चैनल हमलावर रहते हैं. इस पूरे गेम को महीन नियंत्रण संचालन सुमित अवस्थी और अन्य इन्हीं जैसों द्वारा किया जाता है. इसके बाद से पूरे मार्केट में आईबीएन7 और सीएनएन-आईबीएन के संपादकों-पत्रकारों की हैसियत पर बट्टा लग गया है. देखिए सुमित अवस्थी के ट्वीट का स्क्रीनशॉट और शीतल पी सिंह का स्टेटस.

Sheetal P Singh : Certified Modified journo exhilarating by his achievement…

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इतनी खुली दलाली 56 इंच के सीने से ही मुमकिन है…

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अंबानी के रिलायंस और नमो की सरकार के खिलाफ बोलने से क्यों कतरा रहे हैं बड़े मीडिया घराने

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आईबीएन7 और ईटीवी वालों ने स्ट्रिंगरों को वेंडर बना डाला! (देखें फार्म)

अंबानी ने चैनल खरीद लिया तो जाहिर है वह एक तीर से कई निशाने साधेंगे. साध भी रहे हैं. मीडिया हाउस को मुनाफे की फैक्ट्री में तब्दील करेंगे. मीडिया हाउस के जरिए सत्ता की दलाली कर अपने दूसरे धंधों को चमकाएंगे. मीडिया हाउस के जरिए पूरे देश में रिलायंस विरोधी माहौल खत्म कराने और रिलायंस पक्षधर दलाली को तेज कराने का काम कराएंगे. इस कड़ी में वे नहीं चाहते कि जिले से लेकर ब्लाक स्तर के पत्रकार कभी कोई आवाज उठा दें या रिलायंस की पोल खोल दें या बागी बन जाएं. इसलिए रिलायंस वाले खूब विचार विमर्श करने के बाद स्ट्रिंगरों को वेंडर में तब्दील कर रहे हैं. यानि जिले स्तर का आईबीएन7 और ईटीवी का स्ट्रिंगर अब वेंडर कहलाएगा और इस बाबत दिए गए फार्मेट पर हस्ताक्षर कर अपने डिटेल कंपनी को सौंप देगा.

इस वेंडरशिप के जरिए रिलायंस की योजना यह है कि जिले स्तरीय पत्रकार को वेंडर बनाकर उससे कंटेंट डिलीवर कराने के नाम पर समझौता करा लिया जाएगा. इस समझौते में कई अन्य पेंच भी हैं. लेकिन अंततः यह पूरा समझौता पत्रकारिता के बुनियादी नियमों के खिलाफ है. अब स्ट्रिंगर अपने को कंपनी चैनल का आदमी नहीं बता पाएगा. उसकी अपनी खुद की सारी जिम्मेदारी होगी. वह बस कंटेंट देगा और बदले में पैसे लेगा. इसके अलावा वह कहीं कोई क्लेम दावा नहीं कर सकता. आईबीएन7 और ईटीवी के स्ट्रिंगरों में इस बात की नाराजगी है कि अब तो उन्हें कंपनी वाले स्ट्रिंगर भी नहीं रहने दे रहे, वेंडर बना दिया है, जिसका पत्रकारिता से कोई मतलब नहीं है. सूत्रों का कहना है कि रिलायंस वाले पत्रकारों को वेंडर बनाने का काम सिर्फ आईबीएन7 और ईटीवी में ही नहीं कर रहे हैं बल्कि कंपनी के दूसरे न्यूज चैनलों में भी कर रहे हैं.

आईबीएन7, सीएनएन-आईबीएन और ईटीवी को जिस ढंग से इन दिनों चलाया जा रहा है, उससे अब सबको पता चल गया है कि आखिर कारपोरेट के चंगुल में आने पर पत्रकारिता का क्या हाल होता है. उमेश उपाध्याय जो कभी पीआर का काम देखा करते थे, इन दिनों कंटेंट हेड के बतौर चैनलों में डंडा चला रहे हैं. इनके भाई सतीश उपाध्याय बीजेपी के दिल्ली अध्यक्ष हैं. इन दोनों के बारे में कहा जाता है कि ये अंबानी के इशारे पर काम करने वाले हैं. अंबानी की लूट के खिलाफ आवाज उठाने वाले केजरीवाल व इनकी पार्टी के बारे में कोई भी सकारात्मक खबर, बाइट दिखाने पर चैनल में पाबंदी है. इस तरह ये मीडिया हाउस देखते ही देखते सत्ता तंत्र और मुनाफा तंत्र का औजार बन गया है. इसमें अब वही लोग काम करने के लिए बचे रहेंगे जिन्हें पत्रकारिता से नहीं बल्कि पैसा से मतलब है.

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सतीश उपाध्याय, उमेश उपाध्याय और बिजली कंपनियों का खेल

Madan Tiwary : सतीश उपाध्याय पर अरविन्द केजरीवाल ने आरोप लगाये है बिजली के मीटर को लेकर सतीश उपाध्याय बीजेपी के दिल्ली अध्यक्ष हैं। उन्होंने मानहानि का मुकदमा करने की धमकी दी है और आरोपों से इंकार किया है। सतीश जी, शायद केजरीवाल के हाथ बहुत छोटी सी जानकारी लगी है। आप जेल चले जायेंगे सतीश जी। आपके ऊपर करीब चार सौ करोड़ बिजली कंपनी से लेने का मुद्दा बहुत पहले से गरमाया हुआ है और आपके भाई उमेश उपाध्याय की सहभागिता का भी आरोप है। यह दीगर बात है कि पत्रकार बिरादरी भी यह सबकुछ जानते हुए खुलकर नहीं बोल रही है। दिल्ली की जनता को दुह कर दिल्ली की सत्ता को दूध पिलाने का काम करती आ रही हैं बिजली कंपनियां। खैर मुद्दा चाहे जो हो लेकिन एक साल के अंदर बिजली की दर 2:80 प्रति यूनिट से 4:00 प्रति यूनिट करने की दोषी तो भाजपा है ही। देश है, सब मिलकर बेच खाइये। जनता है, किसी न किसी को वोट देगी ही। काश! देश की जनता सही लोगों को चुन पाती या चुनाव बहिष्कार कर पाती। अपने नेताओं से सवाल कर पाती। काश।

Awadhesh Kumar : तो अरविन्द केजरीवाल ने पहला आरोप बम पटका… दीजिए जवाब… तो अरविंद केजरीवाल ने यह आरोप लगा दिया है कि दिल्ली में बिजली आपूर्ति करने वालीं कंपनियों और भाजपा के प्रदेश नेताओं के बीच कारोबारी रिश्ते व सांठगांठ के आरोपों का बम पटक दिया है। अरविन्द का आरोप देखिए, ‘ जिस कंपनी में भाजपा प्रदेश अध्यक्ष सतीश उपाध्याय और उनकी पत्नी की हिस्सेदारी है, वह बिजली कंपनी बीएसईएस के लिए मीटर लगाने और बदलने का काम करती है। दिल्ली भाजपा के उपाध्यक्ष आशीष सूद भी इस कंपनी में डायरेक्टर रह चुके हैं।’ जरा सोचिए, यह कितना बड़ा आरोप है। अरविन्द ने सतीश उपाध्याय की जिन छह कंपनियांे के नाम लिए उनमें से एक एनसीएनएल इंफो मीडिया प्राइवेट लिमिटेड बीएसईएस के लिए मीटर लगाने और बदलने का काम करती है। दिल्ली में बिजली के मीटर हर व्यक्ति के लिए आज भी खलनायक है। लोगों ने मजबूरी में आत्मसमर्पण किया है, पर मेरे सहित तमाम दिल्लीवासी मानते हैं कि ये मीटर बिजली शुल्क के नाम पर जबरन लूटने के वैधानिक मशीन है। अभी मेरे पास विस्तृत जानकारी नहीं है। जानने की कोशिश कर रहा हूं। हालांकि व्यवसाय करना कोई अपराध नहीं है। सतीश उपाध्याय या आशीष सूद स्वयं मीटर उत्पादन नहीं करते हैं। केवल इसे लगाने और बदलने का काम करते हैं। यानी यह एक ठेका है जो किसी न किसी कंपनी को तो मिलना ही था। पर चुनाव के लिए यह तो एक मुद्दा है ही। हमें भी भाजपा के जवाब की प्रतीक्षा है।

तो सतीश उपाध्याय का जवाब भी आ गया… केजरीवाल पर एक और मुकदमा तय…

तो केजरीवाल के आरोप बम का जवाब मिल गया। अगर सतीश उपाध्याय और आशीष सूद की बातें मानें तो उन पर लगा पूरा आरोप ही झूठा है, बेबुनियाद है। सतीश उपाध्याय ने साफ कह दिया है कि उनने जो आरोप लगाया है उसे साबित कर दें अन्यथा राजनीति छोड़ दें। अगर उनने साबित कर दिया तो मैं राजनीति से संन्यास ले लूुगा। उन्होंने कहा कि जिन दो कंपनियों का उनने नाम लिया उनके बारे में मुझे कुछ पता ही नहीं है। सतीश उपाध्याय की बात मानें तो अरविन्द केजरीवाल पर आपराधिक मानहानि का मुकदमा दायर होना निश्चित है। उपाध्याय एवं आशीष सूद दोनों की बातों को मानें तो उनकी कंपनी है, जिसके माध्यम से वे मिलकर ठेकेदारी का काम करते थे। केबल डालने का मीटर लगाने का, पर उनने कभी कोई मीटर खरीदकर नहीं लगाया। सतीश के अनुसार उनकी मीडिया कंपनी है जो 1996 की है जिसमें किसी कंपनी से कोई लेनदेन नहीं हुआ। उन्होंने यह भी साफ किया जब मैं राजनीति में आ गया तो सभी कंपनियों से त्यागपत्र दे दिया। दोनों का कहना है कि मैं परिवार को पालने के लिए व्यवसाय करता हूं, लेकिन साफ सुथरा करता हूं। उनके अनुसार राजनीति में इतना स्तर नीचे नहीं गिरना चाहिए कि हम व्यक्तिगत स्तर पर उतरकर हमला करें।

Dayanand Pandey : दिल्ली विधानसभा चुनाव में मौलाना लोग बहुत तेज़ी से लामबंद हो रहे हैं । इन के पास ज़रा भी अकल नहीं है । अगर खुदा न खास्ता भाजपा के खिलाफ मुसलामानों से आम आदमी पार्टी को वोट देने का फतवा जारी कर दिया इन मौलाना लोगों ने तो जो अरविंद केजरीवाल अभी तक बढ़त बनाए दिख रहे हैं , औंधे मुंह गिरेंगे। यह मौलाना लोग कहीं हिंदू वोटों को पोलराइज करने के लिए नरेंद्र मोदी के ट्रैप में तो नहीं फंस गए हैं ? इस लिए भी कि भाजपा दिल्ली में पांच से अधिक मुसलमानों को उम्मीदवार बनाने जा रही है । इन में से कुछ पूर्व आपिये भी हैं। नरेंद्र मोदी जैसा बहेलिया अभी तक भारतीय राजनीति में तो नहीं देखा गया। मुसलमानों की खिलाफत ने ही इस बहेलिये को इतना ताकतवर बनाया है यह मौलाना लोग अभी तक नहीं समझ पाए , यह तो हद्द है!

पत्रकार मदन तिवारी, अवधेश कुमार और दयानंद पांडेय के फेसबुक वॉल से.

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मुकेश अंबानी खरीदेंगे अंतरराष्ट्रीय बिजनेस अखबार ‘फायनेंशियल टाइम्स’!

मुकेश अंबानी ने ईटीवी, आईबीएन7, सीएनएन-आईबीएन समेत कई चैनलों-मीडिया कंपनियों को खरीदने के बाद अब अंतरराष्ट्रीय मीडिया का मोलभाव करना शुरू कर दिया है. ताजी सूचना के मुताबिक उनकी नजर अंतरराष्ट्रीय बिजनेस अखबार ‘फायनेंशियल टाइम्स’ पर है. भारत के साथ विदेशों में भी अपना मीडिया साम्राज्य फैलाने को लेकर लालयित अंबानी के एक प्रतिनिधि ने पियरसन समूह से संपर्क साधा है. अंतरराष्ट्रीय बिजनेस अखबार फायनेंशियल टाइम्स को प्रकाशित करने वाली कंपनी का नाम पियरसन समूह है. 

नेटवर्क 18 और ईटीवी पर कब्जा करने के बाद मुकेश अंबानी की नई सक्रियता चौंकाने वाली है. वह दुनिया के सबसे बड़े मीडिया मुगल बनने की आकांक्षा पाले हैं. ज्ञात हो कि एक जमाने में द संडे आर्ब्जवर और द आर्ब्जवर ऑफ बिजनेस एंड पॉलीटिक्स में भी रिलायंस समूह की हिस्सेदारी रही है लेकिन इन दोनों का प्रकाशन वर्ष 2000 में बंद हो गया था. इसी के साथ उस जमाने में मीडिया में आने की रिलायंस की कोशिशों ने दम तोड़ दिया था. ये कोशिशें नए सिरे से परवान चढ़ाई है धीरूभाई अंबानी के बेटे मुकेश अंबानी ने. फायनेंशियल टाइम्स करीब 120 साल पुरान बिजनेस अखबार है. 1957 में इस अखबार का पियरसन ने टेकओवर किया था. वर्ष 2012 में फायनेंशियल टाइम्स और उसके डिजिटल कारोबार की कुल कीमत 98.3 अरब रुपए थी.

फायनेंशियल टाइम्स के बिकने की खबर वर्ष 2012 में भी आई थी पर कंपनी के सीईओ मारजोरी स्कॉरडीनो ने इस खबर को गलत बताया था. लंदन स्थित पियरसन समूह के पास फायनेंशियल टाइम्स कुल स्वामित्व होने के साथ-साथ जानीमानी पत्रिका द इकॉनामिस्ट में 50 फीसदी और पेंग्विन रेंडम हाऊस में 47 फीसदी हिस्सेदारी है. वर्ष 2013-14 में फायनेंशियल टाइम्स का पीयरसन समूह के कुल बिजनेस में 8 फीसदी का योगदान था. 2013-14 में फायनेंशियल टाइम्स ने 449 मिलियन पौंड का कारोबार किया था. कंपनी को 55 मिलियन पौंड का फायदा भी हुआ था.

ज्ञात हो कि मुकेश अंबानी ने नेटवर्क18 और टीवी18 ब्रॉडकास्टर्स का इस वर्ष के शुरुआत में अधिग्रहण किया था. इसके तहत समाचार चैनल सीएनबीसी टीवी 18, सीएनएन-आईबीएन, आईबीएन लोकमत और आईबीएन 7 के साथ-साथ एंटरटेनमेंट चैनल कलर्स, कॉमेडी सेंट्रल, एमटीवी अंबानी के नियंत्रण में हैं.

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370 एकड़ वन जमीन सौंपकर उद्योगपति अडानी का कुछ एहसान चुका दिया मोदी जी ने

Yashwant Singh : मुंबई मिरर में आज खबर है कि मोदी की सरकार ने अपने प्रिय उद्योगपति मिस्टर अदानी के गोंडिया पावर प्रोजेक्ट के लिए 370 एकड़ वन जमीन की स्वीकृति दे दी है. यानि 370 एकड़ जंगल की जमीन पर अब अदानी का अधिकार होगा और उनका पावर प्रोजेक्ट चलेगा. अदानी को इस प्रस्ताव पर स्वीकृति पूरे छह साल तक इंतजार के बाद मिली है. Continue reading

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