जूता, त्रिपाठी और मौत!

यशवंत सिंह-

सबक एक उपनाम होता है. किसी का बचपन से होता है. कुछ लोगों का उपनाम जनता जवानी में धर देती है. उनका नाम जनता ने जूता त्रिपाठी रख दिया था. पूरे देश ने टीवी पर देखा था उन्हें भरी बैठक में ताबड़तोड़ जूता चलाते हुए. सांसद त्रिपाठी जी जूता किसी विधायक ठाकुर साहब को मार रहे थे. सो, लोगों ने बाभन बनाम ठाकुर वाला एंगल भी निकाला.

खैर, हुआ ये कि जूता कांड से युवा त्रिपाठी का टिकट कट गया और उनके पिता त्रिपाठी को मिल गया सो पिता त्रिपाठी सांसद बन गए भाजपा से. युवा त्रिपाठी अब देश भर में जूता त्रिपाठी के नाम से चर्चित हो गए थे. उन्होंने जो कुछ आगे पीछे अच्छा बुरा किया होगा, लेकिन उन्हें अब जूता कांड से ही जाने जाना लगा. सो, उनका काम पहले पहचान फिर नाम में तब्दील हो गया- ‘जूता त्रिपाठी’!

गोरखपुर और आसपास के जिलों के पंडित लोग शरद त्रिपाठी को जूता त्रिपाठी कहे जाने से बेहद नाराज हैं. वे इस बात से भी नाराज हैं कि कोई कहे कि ठाकुरों की आह ले गई शरद जी को.

वे रावण का उदाहरण देते हैं. मरने के बाद भी उनका सम्मान किया राम ने और ज्ञान पाने के लिए लक्ष्मण को भेजा.

पर उन्हें कौन बताए कि राम ने कभी अपने दुश्मन को अपने साथ भरी मीटिंग में जूता नहीं मारा था. राम ने विरोधियों का दिल जीता या फिर सीना भेदा. राम की पत्नी को उठा ले गया था रावण. उसे भी तुरंते नहीं मार दिया राम ने. पूरा मौका दिया. भाई विभीषण ने समझाया पर बदले में रावण से लात खाया… हनुमान समेत कइयों को समझाने के लिए भेजा. भांति भांति से रास्ते पर लाने की कोशिश की. आखिरी हथियार के बतौर युद्ध का रास्ता अपनाया. पर त्रिपाठी जी तो बस मौखिक गाली गलौज सुन ही जूता नामक शस्त्र उठा लिए और दे बैठे दनादन….! ये ब्राह्मणोचित कार्य न था… पर इस कार्य से उन्हें काफी फुटेज मिली और जूता उनका ब्रांड बन गया… वे देखते ही देखते त्रिपाठी से जूता त्रिपाठी में तब्दील हो गए…

शरद त्रिपाठी जी की तस्वीरें!

खैर, मृत्यु पर अपनों का सेंसटिव होना, भावुक होना स्वाभाविक है. ऐसे में टिप्पणीकारों पर गुस्सा स्वाभाविक है. पर राजनीति में रहने वाला कोई भी शख्स जनता की संपत्ति होता है… मरने से पहले भी मरने के बाद भी… उसके चरित्र पर बातचीत कभी बंद नहीं होती… वो कितना अच्छा था वो कितना बुरा था… दोनों छोर की चर्चाएं आती जाती रहती हैं… उसको लेकर टीका टिप्पणियां चलती रहती हैं… आज भी नेहरु गांधी इंदिरा राजीव वीपी अटल आदि पर तरह तरह की टिप्पणियां चलती ही रहती हैं…. इसलिए पंडितजी लोगों से अनुरोध है कि ‘जूता त्रिपाठी’ कहे जाने पर ज्यादा लोड न लें!

जूता त्रिपाठी की मौत के बाद कई नई जानकारियां मिल रही हैं. वे साल भर से दिल्ली के अस्पतालों में थे. कोरोना के कारण वे विदेश न जा पाए. लीवर ट्रांसप्लांट कराया जाना था. त्रिपाठी जी कोई नशा न करते थे. सादा खान पान था. फिर भी लीवर सिरोसिस!

अगर कोरोना काल न रहा होता तो शायद वे विदेश जाकर इलाज कराकर अपनी उम्र बढ़ा सकते थे… पर यहीं मेदांता में पड़े रहे…. और बच न सके….

Abhijit Shukla Chandan बताते हैं-

लीवर सिरोसिस की बीमारी थी इनको. ये सांसद थे तभी से परेशानी में थे. बाद में पता चला कि कैंसर है.

Satyendra PS जानकारी देते हैं-

देवरिया के सांसद डॉ रमापति राम त्रिपाठी के पुत्र और बस्ती (संत कबीर नगर) से भाजपा के सांसद रहे शरद त्रिपाठी का लीवर की बीमारी के कारण दिल्ली के मेदांता अस्पताल में निधन हो गया। शरद त्रिपाठी जूता कांड के कारण चर्चा में आए और उनका नाम ही जूता त्रिपाठी पड़ गयाय़। वैसे उनके बारे में लोगों का कहना है कि अच्छे व्यक्ति थे। उनके पिता डॉ रमापति राम त्रिपाठी निहायत भले, विनम्र व्यक्ति और भाजपा के समर्पित कार्यकर्ता हैं, उन्हें यह दुख सहने की शक्ति मिले। वहां के एक लोकल एमएलए से कहा सुनी हुई। उन्होंने कहा जूता निकालें क्या, इतने में शरद ने जूता निकालकर ताबड़तोड़ 7-8 जूते मार दिए। यह सब कैमरे के सामने हुआ इसलिए पूरे देश ने उसका आनन्द लिया। कैमरे के सामने, भरी मीटिंग में अपने ही विधायक को जूते मारे थे लेकिन भलमनसाहत के मामले में नंबर पूरे के पूरे बने रहे। वीडियो मैं भी देखा था। उनकी जाति लगाकर मां को अपशब्द बोले थे तब जूता से ठुकाई किये।

जूता त्रिपाठी की मौत पर राष्ट्रवादी किसान क्रांती दल/मंगल पांडे सेना के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमरेश मिश्रा जांच की मांग कर रहे हैं, क्यों, पढ़ें उनकी पोस्ट

Amaresh Misra-

शरद त्रिपाठी की मौत की जांच हो! पूर्व संत कबीर नगर सांसद शरद त्रिपाठी नहीं रहे। वे सिर्फ 49 साल के थे। 2018 मे अजय सिंह बिष्ट के खास विधायक राकेश बघेल ने इन्हे जातिसूचक गाली दी थी। तब इन्होंने बघेल से जूतों से बात की थी। मेरी इनसे उस समय बात हुई थी। इन्होंने मंगल पांडे आंदोलन का समर्थन किया था। और भाजपा छोड़ने को तैय्यार थे। अजय सिंह बिष्ट से खासे खफा थे। भाजपा इनसे इतनी डर गई थी कि इनको पार्टी से निकालना तो दूर, इनके पिता रमा पति त्रिपाठी, जो कभी भाजपा प्रदेश अध्यक्ष थे, के पैरों पड़ी। फिर 2019 के चुनाव मे शरद चुनाव नहीं लड़े–तो इनके पिता को बकायदा देवरिया से भाजपा ने टिकट दिया–और वहां से रमा पति जी जीते। बताया जा रहा कि इनको कोविड था। कोई कह रहा है कि लिवर खराब होने से मौत हुई। पर जिनके 70 वर्ष के करीब पहुंच रहे पिता अभी तक जिंदा हों–उनकी ऐसे कैसे मौत हो जायेगी? सोचने वाली बात है! मुझे इसमे साज़िश की बू आ रही है! इनके पिता को सामने आना चाहिये। आज हालात ये हो गये हैं कि मौजूदा भाजपा सांसद के पुत्र और खुद भाजपा के पूर्व सांसद रहे शरद त्रिपाठी को न्याय दिलाने राष्ट्रवादी किसान क्रांती दल और मंगल पांडे सेना को सामने आना पड़ रहा है! हम शरद त्रिपाठी जी की मौत की जांच की मांग करते हैं!
अमरेश मिश्र
राष्ट्रीय अध्यक्ष
राष्ट्रवादी किसान क्रांती दल/मंगल पांडे सेना

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