मप्र जनसंपर्क : चंद पत्रकारों को फायदा पहुंचाने के लिए बनाई जा रही नई नीति

मध्य प्रदेश सरकार समाचार वेबसाइट्स को विज्ञापन देने के लिये नई नीति लागू करने पर विचार कर रही है। लेकिन सिस्टम में अनगिनत सुराख कर चुके इस विभाग के अफसरों और माफिया टाईप पत्रकारों का गठजोड़ ही माना जायेगा कि अब नई नीति बन रही है तो उन लोगों के लिये जो इस क्षेत्र में नये आयेंगे। मतलब जो युवा पत्रकार वेबसाईट के लिये विज्ञापन लेने जनसंपर्क में जायेंगे उन्हें और तिकड़मों में उलझाया जायेगा, लेकिन उन पर आंच भी नहीं आने दी जायेगी जो पहले ही चार धंधों के सा​थ बंद पड़ी वेबसाईट्स में भी लाखों कमा ले गये। दिलचस्प बात ये है कि न तो इस विभाग और सरकार को प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के लिये कोर्इ् नीति बनाने की सूझ रही है न ही क्षेत्रीय प्रचार के नाम पर लूट खसोट मचाये सोसायटीयों के लिये।

तो कुल मिलाकर यह कि जिन्हें गलत मानकर कि ये पत्रकार या नॉन पत्रकार गलत तरीके से जनसंपर्क से करोड़ों कमा ले गये ये नीति बनने के बाद उनका बाल भी बांका नहीं होना है। जो नये लोग जुड़े हैं या जुड़ना है सारी खुरपेंच उन्हीं लोगों के मुंह का निवाला छीनने के लिये की जा रही है। अब ये नये के मापदंड जनसंपर्क ने क्या तय किये हैं यह तो वही जाने। लेकिन इतना तय है कि मध्यप्रदेश की सरकार और जनसंपर्क में उन माफिया टाईप पत्रकारों को बाहर का रास्ता दिखाने की कूवत नहीं है जो उसकी छाती पर बैठकर वर्षों से नॉन लीगल तरीके से अपने घर भर रहे हैं और जिनकी वजह से वास्तविक पत्रकार अपने हकों से दूर हैं। कभी अधिमान्यता तो कभी विज्ञापन तो कभी किन्हीं और वजहों से चर्चा में रहने वाला यह विभाग ऐसा लगता है भोपाल के उन पत्रकारों की रखैल बन गया है। जिसे कोई भी कुछ भी कह सकता है कोई भी कुछ भी सुना सकता है और बाहर आकर डींगें हांक सकता है।

हालांकि ये अलग बात है कि भीतर अफसरों के पास जाकर बैठने की बात कहने वाले इन सड़क छाप पत्रकारों की अफसरों के कमरों में जाकर घिग्घीयां बंध जाती हैं और बाहर तीसमारखां बनकर अपने मुंह मियां मिट्ठू बनते हैं। वैसे आजकल वेबसाईटों की किस्मत का फैसला हर वो पत्रकार करता फिर रहा है जिसे डब्ल्यू डब्ल्यू डब्ल्यू का भी पूरा अर्थ नहीं पता। ये वे लोग हैं जो किसी चार पन्नों के अखबारों के ब्यूरो बने बैठे हैं प्रापर्टी की दलाली करते हैं और तमाम धंधे करते हैं लेकिन पत्रकार का तमगा इनके पास बस इनके ब्यूरो के कारण है।भोपाली पत्रकारिता के लिये कलंक का पर्याय बन चुके ये पत्रकार इस कहावत का चरितार्थ कर रहे हैं गांव पटैल मरे और रांढें छाती पीटें।

ये वो लोग हैं जिनकी कभी एक खबर भी बाईलाईन नुमाया नहीं होगी लेकिन इनके जुबानी जमाखर्च पर विश्वास किया जाये तो ये कोर्ट में खड़े हैं, सरकार, जनसंपर्क और पत्रकारों के खिलाफ। इन्हें संरक्षण मिल रहा है तमाम पत्रकार संगठनों से जिन्हें खुद अपने आयोजनों के लिये सरकार से पैसे ऐंठने में कोई गुरेज नहीं है और जिनके मुखिया चंद चमचों के साथ अधिकारियों के कमरों में बैठकर ऐसे बात करते हैं जैसे ये सरकार के दामाद हों।

इन सड़कछापों को बढ़ावा देने का श्रेय भी इसी जनसंपर्क विभाग को जाता है,जो हर ऐरे गैरे को पत्रकार मानकर न सिर्फ अधिमान्यतायें बांटता है। यही वो सिर्फ नाम का पत्रकार होता है जो यहां के बाबू से लेकर अधिकारी तक को  विज्ञापन के एवज में कमीशन भी खिलाता है। ये जनसंपर्क की गोद में बैठकर पैसा कमा रहे हैं। इस दौरान कई वृहन्नला श्रेणी के पत्रकार भी सामने आये हैं जो सामने कुछ हैं पीठ पीछे कुछ हैं। ये सिर्फ ताली ठोको कार्यक्रम में बेहतर भूमिका निभाते हैं चाहे वो किसी के खिलाफ हो या किसी के समर्थन में। कुछ ऐसे भी हैं जिनकी दाढ़ी में हमेशा तिनका अटका ही रहता है। कुछ ऐसे हैं जो असल बड़े पत्रकारों के साहसिक कारनामों का श्रेय भी लेने की होड़ में लगे रहते हैं चाहे फिर वह जनसंपर्क के अधिकारियों को गाली देकर अपना काम निकलवाना ही क्यों न हो इन्हें इसका भी श्रेय चाहिए कि इन्होंने गालियां दी। नीति चाहे जो भी हो लेकिन इतना स्पष्ट है कि ये सरकार अपने ही गले की हड्डी बन चुके लोगों को कभी भी नुकसान में नहीं आने देगी।

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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Comments on “मप्र जनसंपर्क : चंद पत्रकारों को फायदा पहुंचाने के लिए बनाई जा रही नई नीति

  • ashish awasthi says:

    मध्यप्रदेश के जनसंपर्क का कबाड़ा तो कांग्रेस के समय नियुक्त, अफसरों द्वारा लगातार किया जा रहा है, जो आज भी राजा का गुणगान करते हैं। ऐसे ही अफसरों में एक दिल्ली कार्यालय में उपस्थित है, जो मौजूदा सरकार को सरेआम नकारा और बेकार बताता है। दिल्ली स्थित कार्यालय, यूं भी कचरे के ढ़ेर में तब्दील हो गया है, जहां न तो कोई जानकारी दी जाती है और न ही पत्रकारों को कोई इज्जत बख्शी जाती है। यहां पदस्थ कथित अफसरों को स्वयं ही कोई जानकारी नहीं है कि आखिर किस मुद्दे पर सरकार की क्या नीति है, यदि कोई इस संबंध में पूछ ले, तो वे बगलें झांकने लगते हैं। कौन मंत्री, कब आ रहा है, कौन सा बड़ा फैसला सरकार ने लिया है, इसकी भी कोई जानकारी नहीं दी जाती। और कारण वही है कि भोपाल से कोई गंभीर किस्म का अफसर दिल्ली आना नहीं चाहता, हालांकि इसके लिए कई अधिकारियों से बात की गई, जिस वजह से नाकाबिल लोग भी मौज मार रहे हैं।

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