‘कलास्रोत’ के दोनो अंक उम्मीद जगाते हैं : पंकज सिंह

लखनऊ में समारोहपूर्वक त्रैमासिक पत्रिका ‘कलास्रोत’ के नवीन अंक का लोकार्पण हुआ। इस मौके पर वरिष्ठ कवि, कला समीक्षक एवं बीबीसी के पूर्व पत्रकार पंकज सिंह ने कहा है कि कलाएं मनुष्य की आत्मा का उन्नयन करती हैं। वे मनुष्य को थोड़ा और बेहतर मनुष्य बनाती हैं।पत्रकार आलोक पराड़कर द्वारा सम्पादित यह पत्रिका कला, संगीत एवं रंगमंच पर आधारित है। इसका प्रकाशन नगर के कलास्रोत कला केन्द्र द्वारा किया जाता है।   

केंद्र के अलीगंज स्थित कला दीर्घा में आयोजित समारोह में सिंह ने पत्रिका की प्रशंसा करते हुए कहा कि इसके दोनो ही अंक आश्वस्त करते हैं और इसमें कई कालखण्डों को समेटने की कोशिश दिखती है। उन्होंने कहा कि मुझे विश्वास है कि यह तमाम दूसरी ऐसी पत्रिकाओं की तरह रूपवादी क्रियाकलापों में नहीं खो जाएगी। उन्होंने कहा कि कई बार ऐसा होता है कि कलाकार अपनी कला की दुनिया में खो जाता है और समाज से कट जाता है। वह कालखण्ड निरपेक्ष होकर अपने द्वीप में जीता है। ऐसी ताकतें समाजविरोधी होती हैं जो कलाकार को समाज से दूर करती हैं। 

समारोह में वरिष्ठ चित्रकार एवं कला एवं शिल्प महाविद्यालय के पूर्व प्राचार्य जयकृष्ण अग्रवाल ने कहा कि देश में युवा कलाकार अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बना रहे हैं। उन्होंने केन्द्र की इस बात के लिए प्रशंसा की कि इसके माध्यम से युवा कलाकारों को प्रोत्साहन मिल रहा है। वरिष्ठ कवि नरेश सक्सेना ने कहा कि कलाओं से हम मनुष्यता की पहचान बनाते हैं। उन्होंने कहा कि लखनऊ में पहले काफी हाउस जैसे केन्द्र थे जहां साहित्यकार, कलाकार, संगीतकार, पत्रकार मिलते और चर्चा करते थे। उन्होंने कहा कि यह केन्द्र अब इस कमी को दूर कर रहा है। प्रमुख नाटककार राजेश कुमार ने कहा कि अब वक्त आ गया है कि कलाओं में प्रतिरोध खुलकर हो। अमूर्त या प्रतीक के रूप में बोलने की जगह अब कलाओं में स्पष्ट रूप से बोला जाना चाहिए।

पत्रिका के सम्पादक आलोक पराड़कर ने कहा कि कला, संगीत एवं रंगमंच पर विचारपरक आलेखों पर आधारित पत्रिकाओं का अभाव है। कला, संगीत और रंगमंच पर अलग-अलग पत्रिकाएं निकलती हैं लेकिन समग्र रूप में कलास्रोत ने अपने लगातार दोनो अंकों में गंभीर सामग्री प्रस्तुत करने की कोशिश की है। उन्होंने कहा कि अगले कुछ अंकों को विशेषांक रूप में प्रकाशित करने पर भी विचार किया जा रहा है। आरम्भ में स्वागत करते हुए कला स्रोत फाउण्डेशन की निदेशक मानसी डिडवानिया ने बताया कि देखते-देखते कला केन्द्र ने एक वर्ष का सफर तय कर लिया है। इस दौरान हमने विभिन्न गतिविधियां कीं और कलाकारों एवं कलाप्रेमियों को एक मंच पर लाने की कोशिश की। इस सफर में हमें वरिष्ठ एवं युवा कलाकारों का पूरा सहयोग और प्रोत्साहन मिला है जिसने भविष्य के लिए हमें और उत्साह के साथ तैयार किया है। केन्द्र के क्यूरेटर भूपेन्द्र के. अस्थाना ने बताया कि हम केन्द्र की वर्षगांठ के अवसर पर नौ से 23 अगस्त तक लखऩऊ कला महोत्सव का आयोजन कर रहे हैं जिसमें विभिन्न प्रतियोगिताएं, प्रदर्शनियां, संगोष्ठी एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम होंगे। 

समारोह के मुख्य अतिथि पंकज सिंह ने समारोह में अपनी कई कविताएं भी सुनाईं। श्री सिंह के तीन कविता संग्रह “आहटें आसपास” “जैसे पवन पानी ” और “नहीं ” प्रकाशित हैं। उन्होंने तलाशी कविता में सुनाया-‘वे घर की तलाशी लेते हैं/ वे पूछते हैं तुमसे तुम्हारे भगोड़े बेटे का पता ठिकाना/ तुम मुस्कुराती हो नदियों की चमकती मुस्कान/ तुम्हारा चेहरा दिए की एक जिद्दी लौ-सा दिखता है/ निष्कम्प और शुभदा’। समारोह में नगर के कई प्रमुख संस्कृतिकर्मी उपस्थित थे। 

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