जीत गयी एप्पको, हार गया तर्क

ये कोई मजाक है कि जिस देश का भावी प्रधानमंत्री एप्पको जैसी पीआर एजेंसी की सेवा ले रहे हों और उसका सीधा लाभ भी मिल जाए, वही पीआर एजेंसी मैगी जैसे उत्पाद के लिए फिल्डिंग करे और हार जाए.

आपके अरमानों को कुचलते हुए देशभर के बाजार से मैगी को डम्प किया गया, उसके वापस आने की जमीन तैयार हो गई है. आज-कल में आपके गली-मोहल्ले के किराना दूकान के अंकल-भैया बोलते दिखें- मैगी आ गया है, लेते जाइए बबली के लिए. अरे ओ अविनाश, ऑफिस से लेट आकर भूखे पेट करवटें बदलने का दौर खत्म हो गया है, ले जाओ मैगी..बाकी मैगी को मार्केट से वापस लेने और इसमे सीसा होने के साथ-साथ स्वास्थ्य के लिए खतरनाक बताए गए तर्कों के बावजूद जो श्रद्धालु बने रहें, उनके लिए जश्न की खबर तो हैं ही.

आपको शायद याद होगा कि हमने मैगी पर बैन के दौरान जनसत्ता के लिए एक लेख लिखा था जिसमे विस्तार से बताया था कि नेस्ले ने यदि एप्पको जैसी ऐसी पीआर एजेंसी हायर की है, जिसका संबंध देश के प्रधानमंत्री से रहा है तो इसका सीधा मतलब है कि कंपनी अदालत के फैसले के बरक्स जनतंत्र के भीतर एक नए तरह की ताकत आजमाईश में लगी है और अब उसका सीधा-सीधा फायदा दिख रहा है..उस लेख में हमने इस बात पर जोर दिया था कि आमतौर पर पीआर एजेंसी के क्लाईंट आपस में मनमुटाव नहीं करते.

विनीत कुमार के एफबी वाल से



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