सुषमा और नरेंद्र मोदी के मुंह से नौकरशाहों ने ऐसी बात कहलवा दी, जो कोई महामूर्ख ही कह सकता है

भोपाल में हुए 10 वें विश्व हिंदी सम्मेलन से बहुत आशाएं थीं. विदेशों में होनेवाले विश्व हिंदी सम्मेलनों से इतनी आशा कभी नहीं रहती थी, क्योंकि सबको पता रहता है कि वे तो सैर-सपाटा सम्मेलन ही होते हैं. हिंदीवालों को विदेशों में कौन पूछता है? वे हिंदी के नाम पर मुफ्त में सैर-सपाटा कर आते हैं. लेकिन इस बार लगभग तीस साल बाद यह सम्मेलन भारत में हुआ. भारत में होने के बावजूद इसे विदेश मंत्रालय ने क्यों आयोजित किया? विदेश मंत्रालय का हिंदी से क्या लेना-देना? विदेश मंत्रालय तो अंग्रेजी की गुलामी का सबसे बड़ा गढ़ है. हमारी विदेश नीति कई बार सिर्फ अंग्रेजी के कारण ही गच्चा खा जाती है.

यदि सचमुच सुषमा स्वराज ने इसे आयोजित किया होता तो शायद वह इसे काफी बेहतर तरीके से आयोजित करतीं. वे तो स्वयं हिंदी की प्रबल समर्थक रही हैं. मुझे अब से 40-45 साल पहले वे ही हिंदी कार्यक्रमों में मुख्य अतिथि बनाकर ले जाया करती थीं लेकिन इस बार विदेश मंत्री होने के बावजूद मुझे लगता है कि सम्मेलन की लगाम नौकरशाहों के हाथ में चली गई. जिस सरकार को ही नौकरशाह चला रहे हैं, उसके किसी छोटे-मोटे सम्मेलन को भला वे क्यों नहीं चलाएंगे? यदि नौकरशाहों ने मुझे, नामवरसिंहजी और अशोक वाजपेयी जैसों को नहीं बुलाया तो इसमें बेचारी सुषमा क्या करे? मुझे खुशी है कि हमारे नौकरशाहों के नौकरों ने मुझे भी साहित्यकारों की श्रेणी में रख दिया है।

लेकिन सुषमा और नरेंद्र मोदी के मुंह से नौकरशाहों ने ऐसी बात कहलवा दी, जो कोई महामूर्ख ही कह सकता है. दोनों ने कह दिया कि साहित्यकारों का हिंदी से क्या लेना-देना? हमने तो सिर्फ हिंदी-सेवियों को बुलाया है. किसी भी भाषा का परम उत्कर्ष उसके साहित्य में ही होता है. साहित्य से विरत होकर कौनसी भाषा महान बनी है? इस तथ्य के विरुद्ध साहित्य और भाषा के बारे में इतनी मूर्खतापूर्ण बात कहनेवाले नेताओं को कान पकड़कर मंच से नीचे उतार दिया जाना चाहिए था लेकिन बेचारे ‘हिंदीसेवी’ या ‘नेतासेवियों’ में इतनी हिम्मत कहां?

नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने पर इस सम्मेलन से आशा थी कि अबकी बार सचमुच यह कुछ ठोस काम करेगा लेकिन मोदी की मजबूरी है. वह हर गंभीरतम काम को भी नौटंकी में बदल देते हैं. एक बेसिरपैर का भाषण जमाकर वह चलते बने. कोई प्रेरणा नहीं, कोई संदेश नहीं, कोई नई जानकारी नहीं, कोई विश्लेषण नहीं. सिर्फ एक फूहड़ भविष्यवाणी. दुनिया में सिर्फ अंग्रेजी, चीनी और हिंदी ही बचेंगी, शेष सब भाषाएं खत्म होंगी. किसने यह पट्टी पढ़ा दी, नेताजी को? मुख्य मेजबान मुख्यमंत्री शिवराज चौहान ने कोई उटपटांग बात नहीं कही, यह बड़े संतोष का विषय है. इस सम्मेलन ने भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की जड़ें खोदकर रख दी हैं. इस तीन दिन के सम्मेलन ने भाजपा और संघ जैसे राष्ट्रवादी संगठनों के इतने दुश्मन खड़े कर दिए हैं, जितने मोदी ने सवा साल में पैदा नहीं किए. साहित्यकारों और पत्रकारों का जैसा अपमान इस सरकार ने किया है, उसके नतीजे वह अब भुगतेगी.

लेखक डा. वेद प्रताप वैदिक वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

Comments on “सुषमा और नरेंद्र मोदी के मुंह से नौकरशाहों ने ऐसी बात कहलवा दी, जो कोई महामूर्ख ही कह सकता है

  • Ramawtar gupta mp says:

    sahi kaha mp ke har jilo se 10-10logo ko bulaya tha kintu sahitykaro ko kahi nahi puchha gaya.pura sarkari ayojan tha .

    Reply

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *