मजीठिया : चुस्ती से रखें इंस्पेक्टरों और अफसरों के सामने अपना पक्ष

मजीठिया वेज बोर्ड की संस्तुतियों के अनुसार वेतन एवं सुविधाएं पाने-लेने-हासिल करने के लिए संघर्षरत साथियों और असंघर्षरत, सुस्त, सुप्त, निश्चल, शिथिल, निष्क्रिय, लुंज-पुंज, बाटजोहू, लालायित, लार टपकाऊ मित्रों सुप्रीम कोर्ट ने आपके सामने एक ऐसा अवसर उपलब्ध कराया कि यदि इसे चूक गए तो पछतावा भी आपको झटक देगा, हाथ नहीं लगाने देगा। मतलब यह कि संघर्ष कर रहे और इसके विपरीत आचरण-व्यवहार-बर्ताव में लीन लेकिन अंदरखाते मजीठिया की ललक से लबरेज सभी मीडिया कर्मचारियों के लिए उन इंस्पेक्टरों-अधिकारियों को अपनी पीड़ा-परेशानी बयां करनी-बतानी है जिनकी नियुक्ति-तैनाती राज्य सरकार के मुख्य सचिव की देख-रेख में की जा रही है। 

इसके लिए सबसे पहले सेलरी स्लिप, नियुक्ति के सारे कागजात, यदि कोई प्रमोशन हुई है तो उससे संबंधित दस्तावेज एवं उससे संबद्ध वेतनवृद्धि के डाक्यूमेंट आदि संजो लें। साथ ही मजीठिया वेज बोर्ड के हिसाब से आपकी जो सेलरी बनती है उसका भी अनुमानित खाका तैयार कर लें। साथ ही मौजूदा सेलरी एवं मजीठिया के हिसाब से बनने वाली सेलरी के बीच का अंतर ठीक से तैयार कर लें। और 11 नवंबर 2011 से बनने वाले एरियर को ठीक से समझ लें।  फिर जब इंस्पेक्टर-अधिकारी जांच-पड़ताल, जानकारी लेने के लिए आपसे संपर्क करें या आपको बुलाए तो उन्हें पूरी जानकारी बेझिझक-खुलकर दें-बताएं। निश्चित ही यह सारा काम लिखित में होगा, ऐसे में संभव हो तो उन इंस्पेक्टर-अधिकारी महोदय से रिसीविंग ले लें। ऐसा करके आपको तसल्ली रहेगी कि आप द्वारा प्रदत्त किसी भी दस्तावेज-डाक्यूमेंट-कागजात में कोई हेरा-फेरी नहीं होगी। और उसी के मुताबिक रिपोर्ट लेबर कमिश्नर के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट पहुंचेगी। 

हां, लेबर कमिश्नर की चर्चा से याद आया कि लेबर डिपार्टमेंट का रुख-रवैया-कामकाज-कारनामा-करतूत हमेशा ही श्रम विरोधी, मजदूर-कामगार-कर्मचारी विरोधी रहा है और है। आगे, खासकर मजीठिया के मामले में उसका रवैया कैसा रहेगा, भूमिका कैसी रहेगी, इसे लेकर संदेह का घटाटोप बेहद गहरा है। हमारे-आपके-इनके-उनके सबके अनुभव-तजुर्बे तो यही कहते-बयां करते हैं। सारे अनुभव एक ही निष्कर्ष बोलते हैं कि लेबर इंस्पेक्टर, लेबर अफसर, यहां तक सारा लेबर डिपार्टमेंट केवल और केवल मालिकों की चाकरी करता है और उसके टुकड़ों पर ललचाई नजरें गड़ाए रहता है। टुकड़ा-बख्शीश मिलते ही दुम दबाकर सरक लेता है। और कंपनियों-संस्थाओं-कारखानों-मिलों-व्यावसायिक प्रतिष्ठानों के मालिक-नियोक्ता श्रम कानूनों को रद्दी की टोकरयिों में डालते हुए कर्मचारियों के शोषण, उनके उत्पीडऩ, उन्हें तरह-तरह से परेशान करने का खुला तांडव करते हैं। कर्मचारियों की पीड़ा-परेशानी-दोहन-शोषण से अपनी तिजोरियों को बेतहाशा भरते चले जाते हैं। कभी-कभार जब कर्मचारी इस दोहन-उत्पीडऩ के तांडव का विरोध करने के लिए मुखर होकर सामने आ जाते हैं तो इन शोषकों के होश उड़ जाते हैं। बावजूद इसके वे कर्मचारियों के हित में रत्ती भर कुछ करें, उल्टे बेकायदगी का सहारा लेकर वे कर्मचारियों को परेशान करने के नए हथकंडे अपनाने लगते हैं। उनके इन अमानवीय-शैतानी-राक्षसी कृत्य में श्रम कानून और इसका कथित रखवाला श्रम विभाग मालिकों को परोक्ष-अपरोक्ष हर तरह की मदद करने को तत्पर हो जाता है, रहता है। 

यही डर, यही भय, यही आशंका आज हम मीडिया कर्मियों को खाए जा रही है- हो न हो सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार नियुक्त इंस्पेक्टर, अफसर अपनी जांच-पड़ताल में मीडिया मालिकों-मैनेजमेंट से मिलकर केवल उन्हीं का पक्ष जानें, महज उन्हीं से जानकारी लें, उन्हीं के बनाए-परोसे दस्तावेजों पर ध्यान दें, सही मानें। कर्मचारियों से मिलने, उनका पक्ष जानने, उनकी परेशानियों-दिक्कतों-संकटों-मुसीबतों को साझा करने का जहमत ही न उठाएं। इसी खौफ-डर-शंका के वशीभूत कर्मचारियों के एक बड़े हिस्से ने सुप्रीम कोर्ट के मौजूदा आदेश को मालिकों के हित-पक्ष वाला करार दिया था, बताने लगा था। इसे हवा भी देने वाले अनगिनत लोग हो गए थे, और हैं भी। पर ऐसा है नहीं। ठीक है, लंबा अनुभव हमें इसे मानने से रोकता है। लेकिन यह आदेश सर्वोच्च न्यायालय का है, कंटेप्ट खुला हुआ है। अब आप ही सोचिए यदि इन अफसरों-इंस्पेक्टरों ने गलत, भटकाने वाली, तुड़ी-मुड़ी रिपोर्ट पेश की और सबसे बड़ी अदालत को इसका भान हो गया तो अंजाम क्या होगा! क्या अपने आदेश के प्रतिकूल जाने पर माननीय अदालत उन्हें बख्श देगी? नहीं साथियों, इसकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते। 

इसलिए जरूरी है कि हम पूरी तरह सतर्क-सावधान-सजग रहें। ऐेसी हर गतिविधि पर नजर रखें जो मजीठिया पाने की राह में अवरोध-गतिरोध-बाधक-रोड़ा बनती लगती हो। इसके लिए हमें बहुत सक्रिय होना पड़ेगा। हाथ पर हाथ धरे रखने का वक्त अतीत की गोद में दुबक गया है। इस क्रम में हमें लेबर डिपार्टमेंट के दफ्तर, लेबर कमिश्नर के ऑफिस और इससे संबद्ध सभी दफ्तरों में आना-जाना, वहां जानकारी का आदान-प्रदान करना, अपनी बात को पुरजोर ढंग से रखना, संभव हो तो अपना पक्ष लिखित रूप से रखने में जुट जाना चाहिए। हमारे लिए यह एक अनिवार्य कार्य-उपक्रम है, जिसमें मुस्तैदी से संलग्न होना लाजिमी है। यानी कि लेबर डिपार्टमेंट एवं संबद्ध अनुभागों पर अपनी सक्रियता से दबाव बनाना, अपने पक्ष में एक अनुकूल माहौल बनाना बहुत जरूरी है। तभी आशंकित गड़बडिय़ों-बदमाशियों-साजिशों पर रोक लगेगी। 

भई, सुप्रीम कोर्ट की अपनी अलग से कोई मशीनरी तो है नहीं, जो सीधे उसकी निगरानी, उसके संरक्षण में काम करेगी! उसे रिपोर्ट तो इसी तंत्र के माध्यम से लेनी है। सो वह ले लेगी। हमें नहीं भूलना चाहिए कि यह लोक का तंत्र है। बेशक यह तंत्र बहुत खराब है, हो गया है, लेकिन लोक तो हमीं हैं अगर हम सजग-सतर्क हो जाएं, रहे, तो इसमें सुधार होने से कोई नहीं रोक सकता। मेरे एक साइंसदां मित्र ने एक बार एक सच्ची लेकिन हैरान करने वाली बात बताई। उन्होंने कहा,- हमारा पर्यावरण बेहद विषैला हो गया है, सांस लेने तक में दिक्कत आम हो गई है। लेकिन आक्सीजन तो हमें इसी प्रदूषित पर्यावरण की पर्तों से ही मिल रही है! 

लेखक भूपेंद्र प्रतिबद्ध से संपर्क : 9417556066

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Comments on “मजीठिया : चुस्ती से रखें इंस्पेक्टरों और अफसरों के सामने अपना पक्ष

  • SIR
    JIN MIDEAKARMIYO KO KOI BHI KAAGJAAT NAHI DIYA GAI HO WOO KYA KARE AUR JINKA TDS KAT RAHA HAI WOO KIS TRH SE MJITHIYA PANE KELIYE SANGHRSH KAR SAKTE HAI

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  • Sir I m working in dainik bhaskar…join to kara liya hai lekin 4 mahine gujar ne ke baad bhi na joining letter de raha na he offer letter…. Kya Majithiyan ke sifarishon me hum longo ke liye bhi kuch hai ya nahi… Ya document na hone ke sthiti me Hum apne haq se vanchit rah jaenge

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