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सुख-दुख

कैंसर से प्रयागराज के वरिष्ठ पत्रकार मानवेंद्र प्रताप सिंह का निधन

प्रयागराज के अमर उजाला के वरिष्ठ पत्रकार मानवेंद्र प्रताप सिंह नहीं रहे। लंबी बीमारी के बाद इलाज के दौरान एसआरएन अस्पताल में शुक्रवार की सुबह उन्होंने अंतिम सांस ली। वह तकरीबन 51 वर्ष के थे। वह अपने पीछे पत्नी प्रतिभा सिंह और बेटे अर्नव सिंह (15) को छोड़ गए हैं। उनके बड़े भाई देवेंद्र प्रताप सिंह मध्यप्रदेश में पीसीएस अधिकारी हैं, छोटे भाई रक्षेद्र प्रताप सिंह एक सीमेंट कंपनी में वरिष्ठ महाप्रबंधक के पद पर प्रयागराज में कार्यरत हैं। दोपहर को रसूलाबाद घाट पर उनका अंतिम संस्कार किया गयामुखाग्नि बेटे अर्नव सिंह ने दी। मीरापुर स्थित घर और रसूलाबाद घाट पर उन्हें श्रद्धांजलि देने के लिए बड़ी संख्या में पत्रकारों सहित परिजन, करीबी मौजूद थे।


तमाम उम्मीदें शुक्रवार की भोर में भर भरा कर ढह गईं

मनोज मिश्र-

जो हुआ वह अप्रत्याशित नहीं है। अंततः कैंसर जैसी बेमुरव्वत बीमारी ने वही किया जिसके लिए वह बदनाम है। काल ने दस्तक पहले ही दे दी थी फिर भी मन के किसी कोने में एक धुंधली-सी उम्मीद थी… शायद, शायद कोई चमत्कार होगा। डॉक्टरों के जतन रंग लाएंगे। मानवेंद्र की जिंदगी फिर पटरी पर लौटेगी। लेकिन, तमाम उम्मीदें शुक्रवार की भोर में भर भरा कर ढह गईं। अब बची हैं तो सिर्फ स्मृतियां।

2003-04 के बीच का कोई वक्त रहा होगा। कौशाम्बी में केले की खेती पर स्टोरी के लिए तथ्य जुटाता एक सकुचाया, हड़बड़ाया- सा लड़कायह पहली मुलाकात थी। फिर दूसरे तमाम सामाजिक-सांस्कृतिक मुद्दों पर स्टोरी। और इसी सब के बीच उसका एक दिन आउट साइडर से इन साइडर हो जाना।

अब हमारी टीम का एक नियमित साथी। फिर रोज की मुलाकात। कुछ दोस्तियां, कुछ लड़ाई-झगड़े। इस सब के बीच स्नेह का एक धागा हमेशा बंधा रहा।

जिंदगी अपने ढंग से आगे बढ़ती रही। फिर कुछ बीमारियों ने मानवेंद्र के शरीर पर धावा बोला। इन सबसे जूझने की जद्दोजहद के बीच एक दिन डॉक्टरों ने हम सबके डर को सच में बदल दिया- तुम्हें कैंसर है मानवेंद्र। फिर तो जैसे दुनिया ही बदल गई।

इसके बाद मानवेंद्र के कई साल अस्पतालों के चक्कर लगाने में गुजरे। कभी दिल्ली, कभी बनारस तो कभी प्रयागराज के ही तमाम डॉक्टरों के दरवाजे दरवाजे दस्तक। उसे देखकर दुख होता, आखिर कैसे जीता होगा यह शख्स ? घर- परिवार, रिश्तेदार, दफ्तर… हर ओर से जुटाए गए तमाम संसाधनों का कतरा-कतरा चंद नामुराद सांसों को बचाए रखने में खर्च हो रहा था। अपने तमाम कष्टों के बीच एक बेटा, जिसकी अभी मसें भी नहीं भीगी हैं, के लिए कुछ न कर पाने की बेबसी कितनी भयानक रही होगी.. सोचा जा सकता है।

अब मानवेंद्र को इस सबसे मुक्ति मिल गई। लेकिन, कोई जाकर भी इतनी आसानी से जा पाता है क्या? वह हड़बड़ाया सकुचाया-सा लड़का हम सबके बीच रहेगा हमेशा। सांघातिक कष्टों से जरूर मुक्ति मिली है, लेकिन अपनी स्मृतियों से हम उसे कभी मुक्त नहीं करेंगे।

सिरहाने “मीर” के कोई न बोलो,
अभी टुक रोते-रोते सो गया है… !

  • मनोज मिश्र (संपादक – अमर उजाला)
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