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सियासत

मार्केटियर मोदी ज़िंदाबाद : राहुल से दस गुणा महंगा सूट पहनने के बावजूद भाजपा वाले वही पुराना तीर दोबारा छोड़ने की हिम्मत किसके दम पर करते हैं?

महक सिंह तरार-

मैं किसानपुत्र व पार्ट टाइम किसान होने के नाते जानता हूँ कि किसान शुद्ध उत्पाद पैदा कर उसे ग्राहक के बजाये मंडी में दे आता है। बीचोलिया ग्रेडिंग, पैकिंग करके मार्केटिंग के दम पर उसे महंगे दामों में ग्राहक को देता है। किसान भी पूँजी व मेहनत लगाता है। व्यापारी भी पूँजी व मेहनत लगाता है। किसान ने लगाये छह महीने। बिचोलिया ने एक महीना। बिचोलिया की कमायी दुगनी-चोगुणी। दोनो में मूलभूत क्या फ़र्क है?

वो फ़र्क है मार्केटिंग स्किल का।

किसान मार्केटिंग नही करता जबकि व्यापारी मार्केटिंग करता है। वैसे भी खेत के काम करके रोटी चटनी खाकर दोपहर पेड़ के नीचे सोने को महान मानने वाली क़ौम में ना मार्केटिंग करने की इच्छा होती है ना ही उसका स्वभाव होता। किसान इस मार्केटिंग ना करने के स्वभाव की भारी क़ीमत चुका रहा है। वही ग्राहकों को नब्ज को समझकर उसके अनुसार उत्पाद देना सफल व्यापारी का धर्म है। बेहतरीन मार्केटिंग वाले इससे भी आगे निकल जाते है (कमेंट)

क़रीब पंद्रह साल पहले की बात है। एक बम विस्फोट की घटना में भाजपा मंडली ने केंद्रीय ग्रहमंत्री को उसके कपड़ों पर घेरा। मीडिया ने भी मुद्दा उछाला, मंत्री की थू थू हुई व भाजपा ने उसका इस्तीफ़ा दिलवा कर घुटने टिकवा दिये। क़रीब छह साल पहले की बात है Congress ने वही दांव भाजपा के प्रधानमंत्री पर चलाना चाहा। मोदी ने दस लाख का सूट पहन कर मौक़ा दिया राहुल ने “सूट बूट की सरकार” नारे से चोट की मगर मोदी की मार्केटिंग टीम का मीडिया मैनज्मेंट काम आया व मुद्दा ख़ारिज हो गया। अब भाजपा मार्केटिंग के दम पर राहुल की चालीस हज़ार की टीशर्ट पर कांग्रेस को फिर घेर रही है। गाँव में बसने वाला वो भारत जो माने बैठा था की मोदी चाय बेचता था, मोदी की माँ घरों में बर्तन माँजती थी, मोदी के भाई परचून की दुकान करते है, मोदी फ़क़ीर है, मोदी कहीं झोला उठाकर ना चला जाये वो भारत व्हाटसअप यूनिवर्सिटी के द्वारा जान रहा है की मोदी का दुश्मन राहुल 41000 हज़ार की T-shirt पहनता है।

मार्केटिंग में भाजपा ने एक तीर छोड़ा कामयाब हुए, सच के सहारे राहुल ने वही तीर छोड़ा, कोई इस्तीफ़ा नही। भाजपा वाले राहुल से दस गुणा महंगा सूट पहनने के बावजूद वही पुराना तीर दोबारा छोड़ने की हिम्मत किसके दम पर करते है – अपनी मार्केटिंग के ना। ताकि वे अपने 40% वोटर को सच-झूठ परोस सके। बात चालीस हज़ार की या दस लाख के सूट की है ही नही बल्कि शेर द्वारा हिरण को पकड़ने की है। भक्त जिसे शेर कहते है उसे 100% जंगल का राजा बने रहने के लिये मात्र 40% हिरण (वोटर) पकड़ने है। दुनिया जंगल जैसी ही है। हिरणो के झुंड में शाम तक ज़िंदा बचना है तो सबसे धीरे दौड़ने वाले हिरण को सबसे तेज दौड़ने वाले शेर से थोड़ा ज़्यादा तेज दोड़ना ही होगा। वही शेरों के झुंड में किसी शेर की शाम तक जान बच जाये तो उस शेर को सबसे कम भागने वाले हिरण से थोड़ा तेज दौड़ना ही होगा।

एक बहुवर्शी, बहु देशीय अमेरिकन स्टडी में जीवन में सफल होने के लिये जिन दो चीजो की ज़रूरत बतायी थी वो थी लॉजिक के विकास के लिए गणित की पढ़ायी व लीडरशिप के लिये किसी भाषा का अच्छा ज्ञान। पिछले तीस सालो में दुनिया बेहद तेज़ी से बदली है तो मैं उस स्टडी में तीसरा पक्ष जोड़ना चाहूँगा वो है sales (किसी आयडीया, उत्पाद को ग्राहकों को बेचना)। ओर उत्पाद बिक जाये ना की बेचना पड़े, सत्ता की सीट मिल जाये ना की ख़रीदनी पड़े इस सबके लिये सेल्ज़ से एक कदम पहले आती है मार्केटिंग। लम्बे समय तक किसी को भी अपना उत्पाद बेचने के लिये 80% मार्केटिंग व 20% सेल्ज़ फ़ोकस करना चाहिये। वरना हज़ारों जानदार शानदार प्रोडक्ट व विचार जो बिना ग्राहक वक्त ने ख़त्म कर दिये उनकी लिस्ट के लेना मुझ से। मोदी की मार्केटिंग अभी तक के सारे नेताओ से अच्छी है। सच झूठ का ख़याल रखे मगर सिर्फ़ सच झूठ के सहारे ना बैठे।

हम जैसे लोग बेशक सच जानते है पर बात सच या झूठ की है ही नही। माना सच जीत जाता है। कभी ना कभी आम वोटर को भी पता चलेगा की राहुल चालीस हज़ार की T-shirt पहनता है व मोदी उससे दस गुना महंगे पहनता है। मगर कब – ? आज अरस्तू हमारे लिये सच है। क्या वो अपने वक्त में उस आदर्श से कोई तात्कालिक समाधान निकाल सके थे या मरना पड़ा था। ईशामसीह वर्तमान के भगवान है मगर अपने समय में चरवाहे थे, घेर कर मार दिये गये थे। उनके सत्य बाद में जीते। उनके प्रभाव का फ़ायदा बाद में मिला।

सोचिये जरा, क्या “सच किसी दिन जीतेगा” का सहारा लेकर राजनीतिक समाधान बाद में निकाले जाने के लिये छोड़े जा सकते है? सोचिए जरा, क्या किसान का ये संतोष करके बैठना सही है की उत्पादक तो मैं ही हूँ, बाद में आकर लोग इज्जत दें ही देंगे, भले वर्तमान में मेरे बच्चों की स्कूल फ़ीस नही भरी जा रही?

किसान की समस्या हो या कांग्रेस की
अगर ख़ाली सच के सहारे बैठे इंतज़ार करोगे तो
अरस्तू – ईशामसीह के अनुयायी तो बन सकते हो,
पर वर्तमान में हारोगे।

बिना मार्केटिंग के…
कांग्रेसी राजसत्ता नहीं पा सकते,
किसान अर्थसत्ता नहीं पास सकते।

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