क्या यार मयंक त्यागी, ये भी कोई मरने की उम्र थी?

Albert Pinto : क्या यार मयंक त्यागी, ये भी कोई मरने की उम्र थी? पाँच साल बाद फ़ोन पर मिले थे और पाँच दिन में ही चलते बने? Geet को और मुझे तुम्हारे कई हिसाब चुकाने बाकी थे, मुझे तुम्हारे बेटे से दोस्ती करनी थी, तुम्हारे साथ फिर से शराबें पीनी थीं, आज-कल में ही तो मिलने वाले थे हम…

कैसा रिज़ल्ट कवर किया यार तुमने, नंबरों की दौड़ में झोंक दिए गए ख़ुशी से झूमते उन बच्चों को कभी पता भी चलेगा कि उनके पीछे चिलचिलाती धूप में भागते मेरे ग़ुरबत के दिनों का यार छिन गया, अब साला तिकड़ी में पंडित की औलाद और मैं बाकी रह गए हैं, उससे कल से तीन बार पूछ चुका हूँ कि मज़ाक़ तो नहीं कर रहा, यार, तीनों में सबसे कमज़ोर दिल तुम्हारा निकला.. कैसे तो हम बरेली की धुँध भरी रातों में दौड़ते-भागते बार बंद होने से पाँच मिनट पहले पहुँचते थे, फिर जंक्शन रोड ज़बरदस्ती तुम्हारी पसंद के दही-पराठे खाने पड़ते थे, तुम्हारी बाइक गिराकर ही तो पता चला था कि डिस्कवर का पिक-अप स्पलेंडर से ज़्यादा होता है..

क्या यार, अभी तो तुम्हें गीत को ये बताना था कि मुझे, उससे मिलाने को सारे झूठ तुमने ही बुलवाए थे, तुम कहते थे कि क्रिकेट अच्छी खेलते हो, वो भी नहीं दिखाया तुमने.. तुम्हारा संस्थान धेला ख़र्च नहीं देगा तुम्हारे परिवार को, पता है? सरकार से पचास लाख माँगने की बात छपी है उसमें तुम्हारी मौत की ख़बर के साथ… ऐसी ही दुनिया में आ गए हैं हम, बस घिसट रहे हैं अकेले की ख़ातिर, कुत्ते की तरह काम करो तो भी चालीस साल नौकरी करने के बावजूद धेला हाथ नहीं आता, उससे पहले तक फन्ने खान बनके घूमते हैं कि पत्रकार हैं, फिर एक दिन ये भरम निकल लेता है या फिर आदमी ही निकल लेता है…

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