मीडिया को टीआरपी और सर्कुलेशन के लिए युद्ध जैसे हालात चाहिए!

Dilip Khan : भारतीय मीडिया निहायत ही बदमिज़ाज और सत्ता का चाटुकार है. पाकिस्तान ने अभिनंदन को छोड़ने का फैसला लिया तो हेडलाइंस लग रही हैं: ‘झुक गया पाकिस्तान’, ‘डर गया पाकिस्तान’. मीडिया को टीआरपी और सर्कुलेशन के लिए तनाव चाहिए. युद्ध जैसे हालात चाहिए. इसके दो फ़ायदे हैं. पहला, तथ्यों की परवाह नहीं रहती. कुछ भी बोलकर दूसरे देश को गरियाते रहिए, सवाल कोई नहीं करेगा. दूसरा, हिंसक तस्वीरें दिखाकर लोगों को अपने साथ बांधे रखिए.

आप पत्रकारों से पूछिए तो ज़्यादातर युद्ध रिपोर्टिंग करने की चाहत जताते मिलेंगे. अपवादों को छोड़कर रिपोर्टिंग के नाम पर कूड़ा परोसते रहेंगे. इन्हें तनावग्रस्त इलाक़ा चाहिए. राहुल कंवल बीच में माओवादियों पर रिपोर्टिंग करने पहुंच गए और जोकरई करके समझदार लोगों के बीच बदनाम हो गए.

आर्मी के हेलीकॉप्टर और बैरकों में बैठकर ये लोग रिपोर्टिंग करते हैं. मुंबई पर जब अटैक हुआ था तो एक से एक नमूने रिपोर्टरों को देश ने देखा कि कैसे लेट-लेटकर ड्रामा कर रहे थे. मूवमेंट की ख़बरें लाइव दिखा रहे थे. कोई ज़िम्मेदारी नहीं, कोई पत्रकारीय नैतिकता नहीं.

Whatsapp पर भुजाएं फड़काने वाली भारत की इस पीढ़ी ने क़ायदे से एक भी युद्ध नहीं देखा है, इसलिए उन्मादी बने फिरते हैं. करगिल युद्ध इतिहास की दृष्टि से पिद्दा सा युद्ध था. कैजुअलिटीज़ नहीं देखी हैं. लाखों लोगों को मरते नहीं देखा है. शहरों को खंडहर में तब्दील होते नहीं देखा है. इन्हें युद्ध और वीडियो गेम में कोई फर्क नहीं लगता.

टीवी नहीं ख़रीदने के फ़ैसले पर मैं इसलिए संतुष्ट रहता हूं. जो देखना होता है इंटरनेट पर अपनी मर्जी से देखता हूं. देश में आधे फ़साद की जड़ टीवी स्क्रीन के उस पार बैठे अधकचरी-ज़हरीली समझ वाले चेहरे हैं.

बेशर्मी से सरकार के प्रवक्ता बन गया है मीडिया. हर बात पर मोदी-मोदी चिल्लाता रहता है. कभी-कभी चिल्लाने की वजह ख़ुद ही ढूंढ लेता है. अजब दौर है कि सवाल सरकार से पूछने के बजाए विपक्ष से पूछे जा रहे हैं. पॉलिसी पर भी विपक्ष जवाब दे, सरकार पर उठाए गए सवालों पर भी विपक्ष जवाब दे और मीडिया सिर्फ़ समवेत स्वर में चौकीदार के नाम का मृदंग बजाए.

मीडिया विश्लेषक दिलीप खान की एफबी वॉल से.

Mukesh Aseem : ‘सैटेलाइट इमेजरी व दोनों देशों के बयानों और मीडिया लीक के आधार पर एक ऑस्ट्रेलियन वेबसाइट का तार्किक विश्लेषण है कि मोदी और इमरान दोनों अपने-अपने मुल्क के लोगों को भरमाने के लिए गरम बयान तो दे रहे थे पर दोनों ही एक दूसरे को स्पष्ट संकेत भी देते जा रहे थे कि अपने लोगों को मूर्ख तो बनाओ पर मामला धीरे से सुलटा भी लेना है।

जहाज और पूर्व निर्धारित प्रोग्राम वाली मिसाइल का चयन बताता है कि निशाना चूका नहीं, बल्कि निशाना लगाया ही पेड़ों पर गया था, किसी आतंकी को मारने या इमारत को ध्वंस करने का कोई इरादा न था। लेकिन चुनावी प्रचार के जोश और फर्जी खबरों की आदत में 300-600 आतंकियों को मार डालने की जो ज़्यादा ही बड़ी फेंकू खबर बिना आधिकारिक बयान के गोदी मीडिया से चलवाई गई उससे बात बिगड़ गई क्योंकि इतनी बड़ी तादाद में मौतों के दावे पर दुनिया भर के सैन्य विशेषज्ञों और मीडिया का ध्यान गया और उन्होने इसकी सत्यता की जांच शुरू कर दी, और पूरा झूठ सामने आ गया।

पर उधर से पाकिस्तान ने भी इशारा समझा और अपनी बारी पर साफ बयान ही दे दिया कि उनका निशाना असैन्य था, बस अपनी अवाम को दिखाना था कि वो भी गोले ड़ाल सकते हैं। पर यहाँ भी उनको निकल जाने का मौका देने के बजाय खुद को रुस्तम खाँ साबित करने की तुरुप चाल के चक्कर में मोदी एक पाइलट को गंवा बैठे। पर पाकिस्तान भी युद्ध से बिल्कुल ही बच रहा था इसलिए पाइलट को वापस भेजने का ऐलान कर दिया। यही कुल कहानी है। पर ऐसा उन्मादी माहौल अनियंत्रित होकर वास्तविक जंग में भी बदल सकता है।

वरिष्ठ पत्रकार मुकेश असीम की एफबी वॉल से.

SAHARA mei paisa lagaye hain to esko zarur dekhiye

SAHARA mei paisa lagaye hain to esko zarur dekhiye(सहारा समूह की हकीकत जानिए… निवेशक और एजेंट मेच्योरिटी के बाद भी पैसे न लौटाए जाने से नाराज)

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