जो बलात्कारी हैं उनको वामपंथ के नाम पर अबाध रक्षण और प्रतिरक्षण कब तक देंगे/देंगी कॉमरेड?

Swami Vyalok : बोया पेड़ बबूल का, आम कहां से पाए…. वामपंथ के पाठ्यक्रम में है महिला-विरोध और प्रतारणा…. डिस्क्लेमरः मेरी 36 पार की अवस्था और इस महान आर्यावर्त की दशा ने मुझे अब आश्चर्य या दुख के परे कर दिया है, मैं मानता हूं कि इस देश में कुछ भी …मतलब, कुछ भी हो सकता है। इस डिस्क्लेमर के बावजूद यह महीना संगसार होने का रहा है, व्यक्तिगत तौर पर। Continue reading

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#metoo में फंसे पत्रकार दिलीप खान ने फेसबुक पर विस्तार से रखा अपना पक्ष

Dilip Khan

फेसबुक पर कई तरह के स्क्रीनशॉट्स, स्टेटस, कमेंट्स लिखे गए और जा रहे हैं. कई लोग लगातर मैंशन कर रहे हैं. कुछ वेबसाइट् में छपे राइट-अप्स के लिंक भेज रहे हैं. मैंने अब तक इस प्रकरण पर कुछ नहीं बोला. कुछ नहीं बोलने के पीछे ‘आरोप स्वीकार करने’ के अलावा भी वजहें होती हैं. Continue reading

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पत्रकार दिलीप खान ने सो रही लड़की के कपड़े के भीतर हाथ डाला!

Kashyap Kishor Mishra : इस मुल्क का हर इंसान बलात्कार का सह अभियुक्त है। एक पत्रकार है, दिलिप खान। जितना सरसरी तौर से देखा यह खुद को प्रगतिशील दिखाने की कवायद में रहता है। एक लड़की है हिमांशी जोशी। वामपंथ से प्रभावित है और विद्यार्थी है। यह लड़की 29 मई को एक खुलासा करती है कि दिलीप खान नाम का यह राज्यसभा टीवी का पत्रकार, उसके साथ आई एक लड़की के, जब कि वह सो रही थी, कपड़े के भीतर हाथ डाला और हिमांशी ने यह खुद देखा। Continue reading

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#MeToo कैंपेन की चपेट में आए पत्रकार दिलीप खान, पढ़ें निशि शर्मा ने क्या लिखा है…

Nishi Sharma

मेरा अब्यूज़र मीडिया से है। मैं नहीं हूँ। न मुझे कोई डर है करियर और नौकरी का। मीडिया के हाथों में है ही नहीं मेरा करियर। मैं कोचिंग करती थी मुख़र्जी नगर में। हमारी मुलाकात बिल्कुल ही नॉर्मल मुलाकात थी। न पढ़ाई-लिखाई से रिलेटेड, न नौकरी से। वह मुझे हमेशा कहता था ‘सरकारी नौकर बन जाओगी तो असिस्टेंट रख लेना’। Continue reading

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रोहित सरदाना और अंजना ओम कश्यप के इस ‘युद्ध’ से आपने कुछ सोचा-सीखा?

Dilip Khan : आजतक न्यूज़रूम का एक वीडियो देख रहा था। रोहित सरदाना और अंजना ओम कश्यप आपस में पद्मावती को लेकर भिड़े हुए थे। एक पक्ष, एक प्रतिपक्ष। दोनों एक-दूसरे को चित्त करने के अंदाज़ में मोहल्ले के गमछाधारी गैंग की तरह लड़ रहे थे। फिर याद आया कि टाइम्स ग्रुप ने एक नया चैनल शुरू किया है- मिरर नाऊ। आप एक ही मुद्दे पर टाइम्स नाऊ को देखिए और मिरर नाऊ को, तो काउंटर नैरेटिव बनता नज़र आएगा। मतलब एक खित्ते के लोग जो एक चैनल के कंटेंट से उखड़े हुए हैं, उन्हें उसी समूह का दूसरा चैनल हाजमोला की गोली खिलाकर पचाने में जुटा है।

इनमें वो तमाम मुद्दे आपको दिखेंगे, जो दरअसल टीवी के पर्दे पर ही तैयार हुए और हमारे बीच परोसे गए। फिर उन मुद्दों को पूरा देश असली मुद्दा मान बैठा। फिर दो गुट बने और उस पर शब्दभेदी वाण चलने लगे। मिशेल चोस्डुवस्की इसे मैनुफैक्चरिंग डिसेंट कहते हैं। इसमें वास्तविक बग़ावत और विरोध को तेज़ होने से रोकने के लिए विरोध प्रायोजित किए जाते हैं। इस प्रायोजित विरोध को वही निकाय मदद भी करता है जिसके ख़िलाफ़ विरोध हो रहा हो। लोगों को लगता है कि वाह क्या शानदार विरोध था, लेकिन असल में वो विरोध से ज़्यादा समर्थन होता है। असली विरोध इस प्रायोजित विरोध के शोर में दब जाता है। लोग निश्चिंत हो जाते हैं। निकाय मज़बूत हो जाता है।

राज्यसभा टीवी में कार्यरत प्रतिभाशाली पत्रकार दिलीप खान की एफबी वॉल से.

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राजस्थान पत्रिका और राजस्थान सरकार में कई साल से ठनी है, पढ़ें गुलाब कोठारी को जोरदार संपादकीय

Dilip Khan : राजस्थान पत्रिका और राजस्थान सरकार के बीच बीते कई साल से ठनी हुई है। पहले सबकुछ ठीक चल रहा था, फिर किसी बात से चिढ़कर सरकार ने विज्ञापन देना बंद कर दिया। गुलाब कोठारी ने उस वक़्त भी तीखा संपादकीय लिखा था। फिर सरकारी अनुदान से चल रहे गोशालों में दर्जनों गायों के मरने वाली ख़बर ने सरकार को और परेशान कर दिया। राजस्थान पत्रिका ने इस पर कई दिनों तक सीरीज चला दी।

गुलाब कोठारी दक्षिण दिशा के हैं, लेकिन विज्ञापन ही जब इस दिशा से नहीं आएगा तो परेड दाएं मुड़ क्यों करेगा कोई? भास्कर वाले उनसे ज़्यादा दक्षिणावृत्त हैं। और सब जानते हैं कि राजस्थान पत्रिका और दैनिक भास्कर में गलाकाट प्रतियोगिता है। गुलाब कोठारी का आज का संपादकीय ज़रूरी हस्तक्षेप है, लेकिन मुनाफ़े और धंधे की गलियों में किस इरादे से कोई आवाज़ दे रहा है, ये जानना ज़रूरी है। संपादकीय नीचे है :

राज्यसभा टीवी में कार्यरत पत्रकार दिलीप खान की एफबी वॉल से.

भाजपा की राजस्थान सरकार का काला कारनामा… मीडिया पर पाबंदी वाला बिल विधानसभा में पेश.. सुनिए यशवंत को…

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पंकज सिंह मामले में चुप्पी साधे रहने वाली भाजपा जय शाह मामले में पहले ही दिन मैदान में उतर आई!

Dilip Khan : तुम्हें याद हो कि न याद हो… 2014 में एक ख़बर ख़ूब उड़ी थी कि राजनाथ सिंह के बेटे पंकज सिंह घूस लेकर पुलिस पोस्टिंग करवाते हैं और लोकसभा का टिकट बेचते हैं. ख़बर जब चौतरफ़ा फैल गई तो फॉलोअप ख़बर आई कि राजनाथ सिंह की मौजूदगी में नरेन्द्र मोदी ने पंकज सिंह को फटकार लगाई। बदनामी इससे भी हुई। लोगों का शक और गहरा हुआ।

फिर तीसरी ख़बर आई जिसमें राजनाथ सिंह ने अपनी पार्टी के ही किसी ‘राइवल’ पर आरोप लगाया कि वो उनकी छवि ख़राब करने की कोशिश कर रहे हैं। राजनाथ सिंह ने RSS से भी राइवल की शिकायत की।

बात बनने की बजाए जब बिगड़ने लगी तो फिर चौथी ख़बर आई जिसमें PMO ने इस बात से ही इनकार कर दिया कि नरेन्द्र मोदी ने पंकज सिंह को डांटा है।  फिर आई पांचवीं और आख़िरी ख़बर जिसमें बीजेपी ने पहली से लेकर चौथी ख़बर तक सबको फेक बता दिया। और इस तरह राजनाथ सिंह की इज़्ज़त बची, राइवल बचे, पार्टी में तोड़-फोड़ बची और ऑफ कोर्स पंकज सिंह बचे।

जय शाह में तो पहले ही दिन बीजेपी मैदान में उतर आई है। सीधे पांचवीं ख़बर से शुरू किया है खेल। आजकल, राजनाथ सिंह और अमित शाह में बड़ा फर्क है भई!!  राजनाथ-गडकरी खेमे की चले तो गुज्जू खेमा को दो दिन में साइड कर दे, लेकिन मोदी-शाह के आगे किसी की नहीं चल रही।

अब ताजा मामले पर आते हैं. द वायर ने ये तो नहीं कहा कि जय शाह ने भ्रष्टाचार किया. वायर ने तो सिर्फ़ बिजनेस का ब्यौरा दिया है. इससे रॉबर्ट वाड्रा को गरियाने वाला भक्त खेमा क्यों डिफेंसिव हो गया है? बीजेपी को नींद क्यों नहीं आ रही? इससे हम जैसे मासूमों के मन में भ्रष्टाचार का शक पैदा हुआ है.

राज्यसभा टीवी में कार्यरत युवा पत्रकार दिलीप खान की एफबी वॉल से.

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‘रिपब-लिक टीवी’ मानें भाजपा की गुंडा वाहिनी, शेहला रशीद ने कुछ गलत नहीं किया!

Samar Anarya : अगर आपको लगता है कि रिपब-लिक टीवी वाले को भगा के शेहला रशीद डोरा ने कुछ गलत कर दिया है तो आप निहायक बेवकूफ हैं! क्या है कि नैतिकता और सिद्धांत दोनों उन पर लागू होते हैं जो खुद भी उन्हें मानते हों! और अगर आपको लगता है कि रिपब-लिक पत्रकारिता की नैतिकता मानता है, एक खबरिया चैनल है तो यह आपकी कम बुद्धि की दिक्कत है- हमारी नहीं!

आपको याद भी है कि कैसे रिपब-लिक ने भीड़ को उमर खालिद और कन्हैया जैसे साथियों के खिलाफ हिंसा करने को उकसाने की भरपूर कोशिश की थी? क्या लगता है आपको? जब तक रिपब-लिक एकाध साथी को सच में न मरवा दे तब तक उसे न्यूज़ चैनल मानेंगे? सो साथियों की लाशों पर गिद्ध भोज की प्रतीक्षा न करें! रिपब-लिक को वह मानें जो वह है- भाजपा की गुंडा वाहिनी! बाकी शेहला ने जो किया ठीक किया मगर कम किया! ज़्यादा दिन न लगेंगे जब जनता इन गुंडों की और बेहतर दवा करना शुरू कर देगी! तब हम निंदा भी करेंगे कि हिंसा ठीक नहीं है!

Dilip Khan : दो दिनों से कई पोस्ट पढ़ चुका हूं जिसमें Shehla Rashid की इस बात पर आलोचना की जा रही है कि उसने Republic के पत्रकार को क्यों हड़काया। कुछ बातें कहने को हैं:

1. ये जो ताज़ा रिपब्लिक है और जिसका डॉन पहले TIMES NOW में था, उसने कैसी रिपोर्टिंग और कैसी डिबेट की JNU को लेकर? ज़्यादा नहीं, बस डेढ़ साल पहले की बात है। पूरे देश में जेएनयू की जो ख़ास तरह की छवि बनाई गई, उसमें अर्नब गोस्वामी का बड़ा रोल है।

2. टाइम्स नाऊ जब जेएनयू, शेहला, Umar, Kanhaiya, Anirban इन सबको देशद्रोही बता रहा था तो वो कौन सी Neutrality और Objectivity दिखा रहा था? Objectivity नाम के शब्द को पत्रकारिता में बार-बार रटाया जाता है। पहले मीडिया इसे फॉलो करे। शेहला एक्टिविस्ट है। उसे पक्ष-विपक्ष चुनने की आज़ादी है। उसे आज़ादी है कि वो किसी चैनल को बाइट दे और किसी की माइक सामने से हटा दे। आप ज़बर्दस्ती मुंह पे माइक टांग देंगे क्या?

3. ये भी हो सकता है कि वो रिपोर्टर अपने चैनल की आइडियोलॉजिकल फ्रेम से अलग हो। ऐसा होता भी है। लेकिन माइक जिस संस्था की थी उसका एजेंडा बिल्कुल क्लीयर है। पहले दिन से साफ़ है। उस एजेंडे को शेहला अपने विरोध में पाती है। इसलिए उसकी मर्जी है कि वो माइक हटाने को कह दें।

4. जिस प्रोटेस्ट में शेहला ने ऐसा किया वो 3 बजे प्रेस क्लब के भीतर वाला प्रोटेस्ट नहीं था, जिसे “सिर्फ़ पत्रकारों” का कहकर प्रचारित किया जा रहा है। शेहला वाला मामला उससे पहले का है, जो पत्रकारों के अलावा एक्टिविस्टों की साझे कॉल पर हो रहे प्रोटेस्ट में घटित हुआ।

5. मान लीजिए किसी मीडिया हाउस ने किसी संस्था के ख़िलाफ़ रिपोर्टिंग की। हफ़्ते भर बाद उस संस्था का कोई आदमी न्यूज़रूम पहुंच जाए और ज्ञान देने लगे तो चैनल वाले क्या करेंगे?

6. गौरी लंकेश की हत्या पर जो खेमा जश्न मना रहा है, रिपब्लिक उस खेमे को आइडियोलॉजिकल खुराक देता है। ऐसे में Gauri Lankesh की हत्या के ख़िलाफ़ प्रदर्शन में अगर रिपब्लिक की माइक कोई मुंह पर तान दे तो स्वाभाविक ग़ुस्सा निकलेगा।

7. पत्रकारिता में या कहीं भी objectivity सबसे बेकार चीज़ है। इसपर किसी को कोई डाउट हो तो अलग से बात कर लेंगे। ऑब्जेक्टिविटी की जो वैचारिक hegemony है वो बहुत ख़तरनाक है। तराजू से तौल कर निष्पक्षता नहीं आती। आप टास्क के तौर पर मुझे कोई बढ़िया डिबेट/लेख दे दीजिए मैं बता दूंगा कि कहां कहां ऑब्जेकेटिविटी नहीं है। लेख अगर ऑब्जेक्टिविटीवादी का हो तो और बढ़िया

सोशल एक्टिविस्ट और मानवाधिकारवादी समर अनार्या और पत्रकार दिलीप खान की एफबी वॉल से.

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मोदी को पता है 57 लोग देश का 85 हज़ार करोड़ डकारे हैं लेकिन इन्हें पकड़ने की हिम्मत नहीं

Dilip Khan : रिजर्व बैंक ने हाल ही में सुप्रीम कोर्ट को बताया था कि 57 लोगों ने बैंकों के 85 हज़ार करोड़ रुपए दबा रखा है। सरकार को इन 57 लोगों की गर्दन मरोड़नी चाहिए। हल्ला भी कम मचता। 30-40 हज़ार करोड़ रुपए के लिए हल्ला मचा दिया। दो नोटों को ख़त्म करके देश भर में लोगों को परेशान कर दिया। ब्लैक मनी ज़ब्त कीजिए। लेकिन जो कदम आसान था पहले वो उठाइए। आप इकोनॉमी को दुरुस्त करने के लिए काम कर रहे हैं कि हल्ला मचाने के लिए?

मोरारजी देसाई ने जब पांच और दस हज़ार रुपए के नोट को ख़त्म किया था, तो ये नोट्स सिर्फ़ धनिकों के पास होते थे। यानी ब्लैक मनी के सबसे बड़े संदिग्धों के पास। कितना बरामद हुआ था? घंटा। 500, 1000 इन दिनों तक़रीबन सबके पास होते हैं। बंद होने की ख़बर सुनकर एक महिला की मौत हो गई। चौतरफ़ा कोहराम मच गया है। कितने रुपए की बात है? 30-40 हज़ार करोड़ रुपए की। सरकार को पता है कि सिर्फ़ 57 लोग देश का 85 हज़ार करोड़ रुपए डकारे हुए है। हिम्मत है तो पकड़े उन्हें। ये ऐसा फैसला है जिससे कालाधन बरामद जितना भी हो, प्रभावित हर कोई हो रहा है। ज़ाहिर है सरकार की ये पहली स्कीम है जिसपर पूरा देश चर्चा कर रहा है। चर्चा कराना लक्ष्य है या ब्लैक मनी लाना? ब्लैक मनी लाना लक्ष्य है तो पकड़ो स्वीस और पनामा वालों को। सबसे पहले देश से ही शुरू करो। पकड़ो 57 लोगों को।

राज्यसभा टीवी में कार्यरत तेजतर्रार पत्रकार दिलीप खान की एफबी वॉल से.

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