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गुजरात

मोदी राज में मरने के लिए भी टिकट लगता है, कल गुजरातियों ने जान लिया!

सौमित्र राय-

कल 7 करोड़ गुजरातियों ने पहली बार जाना कि मौत का भी टिकट लगता है।

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यकीनन यह टिकट नरेंद्र मोदी की ग़ैर ज़िम्मेदार सरकार ही लगा सकती है। सह प्रायोजक ऑरेवा कंपनी है।

142 लोगों की जान चली गई। टिकट पीछे छूट गया।

मोरबी में पुल गिरने के मामले में गुजरात सरकार ने ओधव पटेल को गुनहगार मानकर FIR करवाया है।

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ओधव पटेल की कंपनी घड़ी, मच्छर मार रैकेट और सीएफएल बल्ब बनाती है।

सब जानते हैं कि सत्ता ने एक स्कूल टीचर से 1500 करोड़ का कारोबार खड़ा करने वाले ओधव को पुल की मरम्मत का ठेका क्यों दिया।

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सिर्फ़ मोरबी ही नहीं, मोदी सरकार के गुजरात मॉडल के विकास का जुमला सिर्फ़ एक छलावा है। ये बात सब जानते हैं कि इस देश में कोई भी ठेका बिना रिश्वत के मिलता नहीं और ये भी कि दलाली किनकी जेब में जाती है।

लेकिन देश की अवाम ने इस कड़वी हकीकत को आत्मसात कर लिया है, क्योंकि दलाली देकर अपना काम निकलवा लेना लड़ने से ज़्यादा सुविधाजनक है।

इसीलिए, दलाली में लिपटे पुल का गिरना और 140 से ज़्यादा लोगों की मौत (हत्या) ऐसे मौकापरस्त लोगों के लिए एक सामान्य घटना है।

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ये वही लोग हैं, जो ऐसे मौके पर बोलने की जगह अपनी फोटू या कविता-कहानी लिखकर ध्यान बंटाते हैं। उन्हें बख़ूबी पता है कि सत्ता के लिए कब-क्या बोलना है।

ये सामंती समाज है। संसाधनों और कमजोरों का हक मारकर अमीर बने लोग। इन्हें सत्ता के साथ चलना ही है, वरना सत्ता इन्हें लात मारकर उखाड़ फेंकेगी।

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आप यकीन मानें, ये सामंती, अगड़ा वर्ग इस देश के असली दुश्मन है। मीडिया से लेकर अफसरशाही तक में, इसी वर्ग के लोग काबिज़ हैं।

नरेंद्र मोदी अपने सारे जुमले इसी सामंती वर्ग को खुश करने के लिए फेंकते हैं। जिस दिन ये सामंती ताकतें खत्म हो जाएंगी, देश आगे बढ़ने लगेगा।

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सोचिए, नरेंद्र मोदी के गुजरात में एक केबल ब्रिज 6 महीने की मरम्मत के बाद 500 लोगों का भार नहीं उठा पाता।

सिर्फ़ 5 दिन पहले खोला गया ब्रिज गिर जाता है। 400 लोग नदी में जा गिरे हैं। अपुष्ट सूत्र 12 लोगों के डूबने की आशंका जता रहे हैं।

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और तलवाचाट मीडिया डूबने को घायल होना बता रहा है।

राज्य में चुनाव हैं और पुल का गिरना भूपेंद्र पटेल सरकार की कमीशनखोरी को उजागर करता है।

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वह राज्य जिसमें सीएम एक पिट्ठू है और राज दिल्ली से चल रहा है। यही विकास का फटा हुआ गुजरात मॉडल है, जिस पर थीगड़े जोड़ने के लिए चुनाव आयोग के कहने पर 1000 अफसरों के तबादले किये गए।

कर्नाटक में डबल इंजन सरकार 40% दलाली लेती है। गुजरात में इससे भी ज़्यादा रेट होगा, वरना मरम्मत के 5 दिन बाद पुल नहीं गिरता।

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मोरबी के केबल ब्रिज को इंजीनियरिंग का चमत्कार माना जाता था, गुजरात मॉडल की तरह।

बेईमानी से किये गए चमत्कार ढह जाते हैं। ये न्यू इंडिया है।

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गुजरात के मोरबी में पुल का ढहना क्या भगवान का संदेश नहीं है कि सूबे में बीजेपी की सत्ता गई?

खुद प्रधानमंत्री ने 2016 में कोलकाता का फ्लाईओवर ढहने पर यही तो कहा था।

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इस बार भी भगवान से उनको वाट्सअप मिला ही होगा।

वक़्त बहुत बेरहम है। राजा को रंक बनने में एक मिनट भी नहीं लगाता। देखें मोदी का पुराना भाषण-

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