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मुझे लगने लगा था कि पिंकू उर्फ शिल्पा सिंह ने कैंसर को हरा दिया है : विनोद कापड़ी

सहारा न्यूज़ नेटवर्क में सहकर्मी रहीं शिल्पा जी अंततः कैंसर से हार गईं। आपका हंसता मुस्कुरता चेहरा भूल पाना आसान नहीं है। ईश्वर आपकी आत्मा को शांति प्रदान करें। आपके परिवार को इस विशाद की घड़ी में हिम्मत मिले।

– Ashwini Sharma (TV Journalist)


ब्रेस्ट कैंसर से बहादुरी से लड़ते दुनिया छोड़ गईं पत्रकार शिल्पा सिंह

Vinod Kapri : मैं नहीं मर सकती…. दिल्ली के लोधी श्मशान घाट से रात को जब हम लौट रहे थे तो राजीव कुमार बोले… पिंकू अक्सर कहती थी कि देखना मैं कैंसर को हराऊँगी और कम से कम कैंसर से तो मैं नहीं मर सकती। राजीव कुमार यानी पिंकू (शिल्पा) के पति .. राजीव जी और भी बहुत कुछ बोले जा रहे थे लेकिन आश्रम-निज़ामुद्दीन के बेतरतीब ट्रैफ़िक और गाड़ियों के शोर के बीच उनका कहा बाक़ी सब कुछ गडमड होने लगा .. एक सिगरेट जलाई..कार का शीशा नीचे किया ..शोर और बढ़ने लगा .. मुझे अब तक एहसास नहीं कि ये शोर ट्रैफ़िक और गाड़ियों का था या पिंकू से भरी तमाम यादों का .. ट्रैफ़िक में रेंगती कारों की तरह ही पिंकू दिल दिमाग़ पर रेंगने लगी।

कौन सी पिंकू ?
नोएडा के सेक्टर 26 के डी 40 की पिंकू। 14 साल पहले की पिंकू। राजीव जी हम तीन चार दोस्तों को रात नौ बजे अचानक घर ले आते थे और जैसे ही 10 घंटे की शिफ़्ट करके कुछ देर पहले ही घर लौटी पिंकू को पता चलता था तो वो मुस्कुराते चेहरे से स्वागत करने के बाद सीधे किचन की तरफ़ दौड़ लगा देती थी और मुश्किल से 15-20 मिनट में टेबल पर कम से पाँच छह आइटम तैयार। ये सिलसिला रात 12-1 बजे तक चलता।अगले दिन सुबह 7 बजे उनकी शिफ़्ट भी है। बच्चों को स्कूल भी जाना है। लेकिन मजाल है कि पिंकू के चेहरे पर एक बार भी मैंने शिकन देखी हो।ये सिलसिला कई साल चला। मुझे बहुत आत्मग्लानि हुई कि इतना समय , खर्चा और तकलीफ़ और वो भी नियमित। हफ़्ते में एक या दो बार।मैने कई बार राजीव जी को कहा।फिर पिंकू से कहा। उनका हमेशा एक ही जवाब होता था कि मेरी चिंता मत कीजिए। मुझे ये सब बहुत अच्छा लगता है।बस इस मोटू को बोल दीजिए कि सुबह टाइम पर मुझे छोड़ दें।राजीव जी को वो अक्सर प्यार से मोटू भी बोलती थीं।

कौन सी पिंकू ?
उसी दौरान पता चला कि राजीव और शिल्पा की बड़ी बेटी 12 साल की पुच्ची (सुचेता) को कैंसर है। छोटा बेटा शांतनु तब 10 साल का था। दोनों का एक कदम घर पर होता था और बाक़ी के तीन कदम कैंसर से लड़ने के लिए अस्पतालों पर होते थे। दो ढाई साल तक दोनों क्या ख़ूब लड़े।राजीव मायूस होते थे तो पिंकू उन्हें समझाती थी। समझते नहीं थे तो डॉंटती थी कि हम कमजोर पड़ेंगे तो हमारी बच्ची कैसे लड़ेगी? दिल्ली से मुंबई तक राजीव कुमार ने बच्ची के लिए पूरी लड़ाई लड़ी और हर लड़ाई में उनके साथ पूरे दम के साथ खड़ी रहीं पिंकू। आख़िरकार पुच्ची चली गई। चार लोगों के परिवार के लिए ये कितना बड़ा सदमा रहा होगा, कोई भी समझ सकता है। पुच्ची में तो पिंकू की जान बसती थी। जो आज मुझे लगता है कि पुच्ची के जाने के बाद उनकी आधी जान चली गई थी। इसके बावजूद उन्होंने खुद को हौसला दिया और तय किया कि अब चार से तीन हो चुके परिवार को बचाना है।

कौन सी पिंकू?
वो चार से तीन हो चुके परिवार को बचाने में जुटी ही थीं कि पता चला कि राजीव जी को जानलेवा बीमारी हो गई है। राजीव जी का वजन चार महीने में 20 किलो गिर गया था। पिंकू का एक कदम अस्पताल में होता था और दूसरा कदम अब बड़े हो चुके बेटे शांतनु के भविष्य की तरफ़ होता था। वो दो बच्चों को एक साथ सँभाल रही थीं। धीरे धीरे राजीव जी की बीमारी का सही इलाज मिला और ज़िंदगी पटरी में आने लगी। लगा कि पिंकू ने चार से तीन हो चुके परिवार को बचा लिया है।

कौन सी पिंकू ?
फिर आया 2017 .. राजीव जी से पता चला कि पिंकू को breast cancer है। मिलने के लिए हम तुरंत घर पहुँचे। देखा किचन में हमारे लिए कुछ बना रही हैं। कहा कि अरे ये सब क्यों कर रही हैं तो बोली कि अरे क्यों परेशान हो रहे हैं विनोद जी? breast cancer से कोई मरता है क्या? आप बैठिए। मैं आती हूँ। वो आई बहुत सारे बिहारी पकवानों के साथ। हमने खाया। हँसी ठट्ठा किया और चले गए। देखते ही देखते ऐसे ही हंसी ठट्ठे में पहली सर्जरी हो गयी। एक ब्रेस्ट, डॉक्टर ने निकाल दिया। सर्जरी के बाद हम AIIMS के प्राइवेट वॉर्ड में थे। सोच रहे थे कि कैसे क्या बात करेंगे? और हम सब देखते क्या हैं? वो सब से सब के बारे में सवाल पूछ रही हैं। पीहू कब रिलीज़ हो रही है विनोद जी? तुम्हारी आज शिफ़्ट नहीं है क्या साक्षी? आपका योगी वाला इंटरव्यू बहुत वायरल हो रहा है अजीत जी।

कौन सी पिंकू ?
इसके बाद लगा कि अब सब ठीक होगा। यही डॉक्टरों ने बताया भी 7/8 महीने सब ठीक चला भी। फिर पता चला कि कैंसर लौट आया है।इस बार दूसरे ब्रेस्ट में। रात को ही हम घर पहुँचे तो हंसते हुए बोली कि अब बैलेंस ठीक हो जाएगा। मैं सुन कर सन्न था। लेकिन साफ़ दिख रहा था कि वो मौत से लड़ने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार थीं।

फिर दूसरी सर्जरी हुई। दूसरा ब्रेस्ट भी निकाल दिया गया। सर्जरी के बाद वो जब हम सब से मिलीं तो फिर मुस्कुरा रहीं थीं। बोली कि अब सब ठीक है।उनके साथ चल रही केरल की नर्स बोली कि मैं अपना लाइफ़ में ऐसा smiling patient नहीं देखा है। Smiling patient: ये मैंने भी जीवन में पहली बार सुना और देखा था।

कौन सी पिंकू ?
सर्जरी के बाद कीमो। कीमो के बाद फिर सर्जरी। रेडियेशन और ना जाने क्या। जब भी वो एम्स में भर्ती होती थीं तो हम उनके साथ पहुँच ही जाते थे और देखते क्या हैं? कमरे में डायट चिवड़ा है (जो मुझे पसंद है), नट क्रैकर हैं, चिप्स हैं, बिस्किटस हैं, कोल्ड ड्रिंक है… आधे से ज़्यादा चीज़ें वो सर्जरी से पहले घर से लेकर चलती थीं कि सब लोग आएँगे तो सब के लिए कुछ ना कुछ तो होना ही चाहिए। जो कम पड़ता था शानू वहीं ऑर्डर कर देता था और फिर swiggy ज़िंदाबाद।

सच लिखूँ तो मैंने कैंसर के बारे में जितना सुना था, ख़ौफ़नाक ही सुना था लेकिन पिंकू के हौसले ने मेरी सारी धारणाओं को ग़लत साबित कर दिया। मैंने देखा कि इस पूरे दो साल में पिंकू ने सच में कैंसर जैसी बीमारी को खेल बना दिया और मुझे भी लगने लगा कि पिंकू ने कैंसर को हरा दिया है। यही सच भी है।

कौन सी पिंकू ?
सबकुछ तो ठीक ही चल रहा था। फिर पता चला कि chemo देने में कुछ दिक़्क़त आ रही है। तो एक Chemo port लगाना है। जिसके बाद कीमो देना आसान हो जाएगा। हालाँकि कीमो और आसान : इन दोनों में ज़मीन और आसमान जितना फ़र्क़ है लेकिन पिंकू ओर राजीव जी ने हमें यही समझाया कि कुछ नहीं है। आज से सिर्फ 16 दिन पहले , 6 नवंबर को ये सर्जरी हुई। सर्जरी के बाद जब मैं पिंकू से मिला तो मैंने कहा कि मैं तो सोच रहा था कि आपके हाथ की मछली खाऊँगा , आप तो फिर यहाँ चली आईं !! तो वो बोलीं कि बस डिस्चार्ज होने दीजिए एक बार।वैसे ये मैं दावे से कह सकता हूँ कि उनसे बढ़िया बनाई हुई मछली मैंने तो अब तक नहीं खाई है। इस पर फिर कभी।

8 नवंबर को वो डिस्चार्ज हुईं। 11 की रात से उनकी तबियत बिगड़ने लगीं। 12 को उन्हें नोएडा के कैलाश अस्पताल ले गए।एक दिन के लिए क्योंकि एम्स में बेड नहीं मिल रहा था और 13 को वो एम्स के ICU में थीं। life support पर .. किसी को समझ नहीं आ रहा था कि सब कुछ तो ठीक था , फिर ये अचानक क्या हुआ? 10 दिन तक एम्स के डॉक्टर दिन रात लड़ते रहे .. जूझते रहे और फिर पता चला कि Chemo port लगाने की वजह से शरीर में infection हो गया है .. इतना infection कि वो lungs तक पहुँच गया है जिसे तमाम कोशिशों के बाद भी ठीक नहीं किया जा सका और फिर 22 नवंबर को सुबह 10.57 पर पिंकू ने आख़िरी साँस ली।

लोधी रोड क्रीमोटरियम से राजीव जी के घर अक्षरधाम पहुँचते हुए मेरी आँखों के सामने ये सब रील की तरह घूम गया और मुझे लगा कि वो सच ही तो बोलतीं थीं कि मैं नहीं मर सकती .. मैं कैंसर से तो नहीं मर सकती .

कितना सच कहा . वो हम सब से दूर गयीं तो एक इंफ़ेक्शन की वजह से ..कैंसर से तो वो लड़ ही गई थीं और तक़रीबन जीत भी गई थीं।

हारी तो एक इंफ़ेक्शन से। जिस चार से तीन हो चुके परिवार को वो तीन से दो नहीं होने देना चाहती थीं, आख़िरकार वो खुद ही उसे ना चाहते हुए भी दो करके चली गई हैं लेकिन अब इन दोनों राजीव जी और शानू की ज़िम्मेदारी बनती है कि वो पिंकू और पुच्ची के इस परिवार को बचाएं , बनाएँ , सँवारे और फिर से वो परिवार बनाएँ जिसका सपना पिंकू ने देखा था।

कौन सी पिंकू ?

चलते चलते एक छोटा सा सच उस डॉक्टर सुभाष गुप्ता का जो ढाई साल से पिंकू का इलाज कर रहे थे। पिंकू की मृत्यु से सिर्फ़ दो दिन पहले हम डॉक्टर सुभाष गुप्ता से मिले। हमने उनसे पूछा कि सच सच बताइए कि मेडिकली आप को क्या लग रहा है ? तो उन्होंने बताया कि infection की वजह से lungs बुरी तरह damage हो चुके हैं। उम्मीद बहुत कम है। लेकिन मेरे उम्मीद बस दो बातों पर टिकी है। पहली है मरीज़ की कम उम्र और दूसरा उनका हौसला।

हौसला? हमने जिज्ञासावश पूछा क्या हौसला? तो डॉ गुप्ता बोले कि मैंने अपने पूरे करियर में शिल्पा सिंह से बड़ा फाइटर नहीं देखा है।हमने और उत्सुकता दिखाई तो डॉ गुप्ता ने अपना मोबाइल और अपने what’s app messages हमारे सामने खोल कर रख दिए और बोले कि

“शिल्पा सिंह दुनिया की पहली और आख़िरी ऐसी कैंसर मरीज़ होंगी जो कीमो होने के बाद मैसेज करती हैं कि feeling good. I am ready to fight. और ये मैसेज मैं बाक़ी कैंसर मरीज़ों को दिखाता हूँ। मैं खुद हैरान हूँ कि कीमो के बाद कोई ऐसा मैसेज कैसे कर सकता है। लेकिन वो करतीं थीं।

राजीव जी के साथ हम पिंकू के घर पहुँच चुके थे। और मैं यही सोचता रहा और अब तक सोच रहा हूँ कि जिसने कैंसर को हरा दिया , वो एक इंफ़ेक्शन से कैसे हार गई ?

शायद हार गई होगी। पर वो मरी नहीं। पिंकू ठीक बोलती थी : मैं नहीं मर सकती। मर गई होती तो क्या मैं ये लिख पाता ???

वरिष्ठ पत्रकार और फिल्मकार विनोद कापड़ी की एफबी वॉल से.

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