नरेंद्र मोहन को यूं याद किया वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ला ने…

Shambhunath Shukla

मोहन बाबू को भुलाया नहीं जा सकता! दैनिक जागरण के प्रसार की सीमाओं को कानपुर शहर से लेकर पूरे उत्तर, पूर्व और मध्य भारत में फैलाने वाले स्वर्गीय श्री नरेंद्र मोहन की कल 20 सितंबर को 16 वीं पुण्यतिथि है. उन्हें सब लोग प्यार से मोहन बाबू कहते थे. एक कामयाब मालिक और सफल संपादक दोनों का विज़न उनके पास अद्भुत था. हालांकि उनकी बुराई करने वाले भी बहुत मिल जाएंगे, लेकिन उनमें अनगिनत अच्छाइयाँ थीं, जिन्हें सिर्फ इसलिए भुला दिया जाता है क्योंकि वे एक सफल उद्योगपति भी थे. उनके साथ मेरा निजी अनुभव है. मैं उसे साझा कर रहा हूँ.

1980 में मैं जब नया-नया दैनिक जागरण में प्रशिक्षु उप संपादक लगा, तब की बात है. एक दिन रात नौ बजे अपने ड्यूटी ऑवर्स पूरे कर मैं ऑफिस से बाहर निकला. बाहर पोर्टिको में मोहन बाबू की लंबी-सी चमचमाती मैरून कलर की कार लगी थी. पता नहीं क्यों मेरे दिल में इच्छा जगी कि काश कभी ऐसी कार में बैठ पाता। गेट से बाहर निकल कर मैं लेबर कमिश्नर आवास की तरफ चला, वहीँ से गोविन्द नगर के लिए गणेश मार्का टैम्पू मिलते थे.

मैंने अभी गोदावरी होटल (आज वहां रीजेंसी अस्पताल है) पार किया ही था, कि पीछे से सरसराती हुई मोहन बाबू की कार निकल कर मेरे आगे जाकर रुकी. कार बैक हुई और ठीक मेरे बगल में आकर ठहर गई. पीछे की सीट पर बैठे मोहन बाबू ने कार का सीसा खोला और बोले- आओ, शंभुनाथ बैठ जाओ. कहाँ जाना है, मैं छोड़ देता हूँ. उनकी यह विनम्रता दिल को भिगो गई. मैंने कहा- नहीं भाई साहब मैं चला जाऊँगा बस सामने ही जाना है. बड़ी मुश्किल से उनके आग्रह को टाल पाया.

तीन साल बाद मैं मोहन बाबू से ही लड़-झगड़ कर दैनिक जागरण छोड़ दिल्ली में आ गया. यहाँ जनसत्ता की उप संपादकी ज्यादा लुभावनी थी और बहादुर शाह ज़फर मार्ग का आकर्षण भी. कई वर्ष बाद एक दिन मोहन बाबू फिर मिले, वह भी लखनऊ में मुख्यमंत्री कल्याण सिंह के यहाँ. फिर से तार जुड़े. उन्होंने पूछा कि अब तो दैनिक जागरण दिल्ली भी पहुँच गया है, जुड़ोगे?

मैंने कहा- नहीं भाई साहब अब मैं प्रभाष जोशी जैसे संपादक का संग नहीं छोड़ सकता. दो-तीन साल बाद वे मुझे यूपी कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष श्री नारायण दत्त तिवारी के बिलिंग्डन क्रीसेंट स्थित ऑफिस में मिले तो अपनी एक कविता पुस्तक मुझे भेंट की. मैंने उसका रिव्यू लिखा और श्री मंगलेश डबराल के संपादन में निकलने वाली रविवारी जनसत्ता में छपवा दिया. धन्यवाद ज्ञापन का उनका फोन आया.

1996 में मुझे फाल्सीफेरम मलेरिया हो गया, उन्हें पता चला तो मुझे देखने वे मेरी झोपड़ी में आए और कह गए कि मैं तुम्हारे सर्वोत्तम इलाज़ की व्यवस्था कराए देता हूँ, उन्होंने कहा कि एम्स में तुमको भर्ती करवाए देता हूँ. पर मुझे एम्स जाने की जरूरत नहीं पड़ी. हमारे रीवा वाले मित्र ब्रजेश पांडेय ने एक ऐसी क़ाबिल डॉक्टर से मुलाक़ात करवा दी कि पूरे चार महीने तक बिस्तर में रहने के बाद मैं स्वस्थ हो गया. ऐसे मोहन बाबू क्यों न भले याद आएँगे!

कई अखबारों के संपादक रहे वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ला की एफबी वॉल से.

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