पूंजीपतियों की चिन्ता में दुबली होती सरकार और दुबले हो चुके अखबार

आज के हिन्दुस्तान टाइम्स में पहले पन्ने पर सुभद्रा चटर्जी की बाईलाइन वाली खबर है, कारखानों में 12 घंटे की पाली की अनुमति देने के लिए कानून में बदलाव किया जा सकता है। तीन लाइन के शीर्षक और दो कॉलम की इस खबर का विस्तार अंदर के पन्ने पर भी है।

पहले पन्ने पर जो बताया गया है उसके अनुसार लॉकडाउन के बाद जब काम ज्यादा होगा और काम करने वाले कम तो कारखानों की सुविधा के लिए यह जरूरी होगा। इसी खबर में पहले ही पन्ने पर यह भी लिखा है कि 1948 के कानून में ओवराटइम का प्रावधान है पर सरकार का मानना है कि खास परिस्थितियों में खास प्रावधानों की जरूरत है।

कहने की जरूरत नहीं है कि इस महामारी के बाद कितने मजदूर काम करने के लिए बचेंगे यह पता नहीं होने की स्थिति में सरकार की चिन्ता कारखाना मालिकों और पूंजीपतियों के लिए है जबकि वे ज्यादा पैसे देकर काम करवा सकते हैं। मजदूर अभी कैसे जिन्दा बचें उसके लिए क्या काम हो रहा है वह आप जानते ही हैं।

इसी अखबार में अंदर के पन्ने पर एक खबर है, मध्य प्रदेश स्वास्थ्य विभाग के ज्यादातर अफसर क्वारंटाइन। 50 लोगों के संक्रमित होने की आशंका। इस खबर के अनुसार दो अधिकारियों ने कथित रूप से सोशल डिसटेंसिंग के नियमों का उल्लंघन किया और संक्रमित होने के लक्षणों को छिपाया इस कारण मध्य प्रदेश राज्य स्वास्थ्य विभाग के तकरीबन सभी वरिष्ठ सदस्य क्वारंटाइन किए गए हैं या अस्पताल में हैं। कहने की जरूरत नहीं है कि जब राज्य सरकार के अधिकारियों का यह हाल है तो वे आम लोगों का क्या रखेंगे। आम लोगों की बेवकूफी को इसी मीडिया ने (हिन्दुस्तान टाइम्स नहीं) कितना उछाला आप जानते हैं पर स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों की खबर अंदर के पन्ने पर या गायब। इससे पहले खबर थी कि कोविड मरीजों के साथ काम करने वाले डॉक्टर के अलग रहने की व्यवस्था नहीं होने के कारण डॉक्टर कार में ही सो रहे हैं। घर नहीं जा रहे हैं ताकि उनके बुजुर्ग अभिभावक और बच्चे संक्रमित नहीं हो जाएं।

अभी मैं दूसरे राज्यों की स्थिति की चर्चा नहीं करूंगा क्योंकि मध्य प्रदेश में अभी-अभी सरकार बदली गई है। ऐसा नहीं है कि पहले वाली अच्छा काम नहीं कर रही थी या कोई गंभीर शिकायत थी। बदली गई क्योंकि राजनीति करनी थी। आप जानते हैं कि अचानक कांग्रेस नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया को जनता की सेवा करने का मन हुआ और वे अपने विधायकों के साथ भाजपा के पाले में आ गए।

सरकार ने जनता की सेवा करने के लिए उन्हें राज्य सभा चुनाव का उम्मीदवार बनाने का फैसला किया और चुनाव टल गया। मध्य प्रदेश की सरकार बहुमत न होने के कारण गिर गई। मुख्यमंत्री बदल गए। इससे किसी को कोई शिकायत नहीं होनी चाहिए। देश की राजनीतिक व्यवस्था ऐसी ही है। मुद्दा यह है कि ना ज्योतिरादित्य सिंधिया की सेवा दिखाई दे रही है और ना नई सरकार जनता की सेवा में कोई तीर मार लिया है। मुझे लगता है कि सारा खेल खबरों में ही चल रहा है। जो नहीं छपनी चाहिए, छपेगी, जो छपनी चाहिए नहीं छपेगी, पहले पन्ने की खबर अंदर और अंदर की पहले पन्ने पर।

वैसे मैं पहले लिख चुका हूं कि इसका कारण खबर लिखने वाले की वरिष्ठता होती है खबर की गंभीरता नहीं। सरकार के बारे में मैं क्या कहूं उसे तो जनता ने चुना है।

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह का विश्लेषण.



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Comments on “पूंजीपतियों की चिन्ता में दुबली होती सरकार और दुबले हो चुके अखबार

  • समाचार पत्र के उपभोक्ता की असली सेवा वो हॉकर कर रहा था जो उनके घर अख़बार डालता था और है इसलिए उपभोक्ता को चाहिए कि अपने हॉकर को इस कार्य से होने वाली पूरी आय (प्रतिदिन पिचहत्तर पैसे से डेढ़ रूपए तक) एकमुश्त प्रति माह दें और सेवा न लें उसे सुरक्षित घर पर रहने दें , शायद बदलाव आये और “समाचार पत्र ” अपने उपभोक्ता को सेवा के लिए बाध्य महसूस करें।

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  • मप्र सरकार (इकलौते मामा) ने आज से प्रदेश में “मप्र महामारी आपदा कानून 2020” लागू कर दिया है… हमें तो यही नही पका कानून कब और किसने पारित कर बना दिया!

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