…जब अफसर-बाबू ऐसे होंगे तब न्याय कैसे होगा?

गाजीपुर। अफसर-बाबुओं की मुट्ठी गर्म कर मनमर्जी तरीके से दूसरों की संपत्ति पर अपना नाम चढ़वा लेने का खेल तहसील स्तर पर जारी है। फर्जीवाड़े के इस खेल का शिकार अगर कोई बनता है, तो वो है पीड़ित व्यक्ति क्योंकि अपनी ही संपत्ति को वापस पाने के लिए तहसील से लेकर न्यायालय तक दौड़ने में न जाने कितने साल गुजर जाते हैं, और कितनी जोड़िया चप्पलें घिस जाती हैं, लेकिन बावजूद इसके इंसाफ नहीं मिलता। तहसील स्तर पर इस तरह के मामले कदम-कदम पर नजर आयेंगे। सूबे में सरकार भले ही बदल गयी हो, लेकिन कार्य-संस्कृति की बयार आज भी वही है। न्याय पाने के लिए कल भी अर्जियां दौड़ रही थीं, आज भी दौड़ रही हैं।

मामला पूर्वी यूपी के गाजीपुर जिले के जखनिया तहसील से जुड़े गांव कस्बा कोईरी का है। यह गाव थाना शादियाबाद में पड़ता है। मूल रूप से कस्बाकोईरी के रहने वाले कृष्ण कुमार श्रीवास्तव बनारस में रहकर छोटी सी नौकरी के सहारे अपने और अपने परिवार का गुजर-बसर करते हैं। कृष्ण कुमार ने जरूरत के वास्ते आराजी नम्बर 160-161 में स्थित एक बिस्सा जमीन अपने बड़े भाई अजय कुमार की पत्नी मधु श्रीवास्तव को बेचा। बड़े भाई की नीयत पलट गयी तो खरीदे गये जमीन का भुगतान करना तो दूर उल्टे आबादी नम्बर 169 में स्थित मकान पर भी तहसील कर्मियों की मिली-भगत से अपना नाम चढ़वा लिया।

अपने घर से बेघर हुए कृष्ण कुमार घर वापसी के लिए तहसील दिवस से लेकर थाना दिवस तक दर्जनों से ज्यादा प्रार्थना पत्र दे चुके है। लेकिन उनकी कही कोई सुनवाई नहीं हुई। इस तरह के संवेदनशील मामलों में तहसील पर बैठे अधिकारी-बाबू किस हद तक अंसेवदनशील हो सकते हैं, इसका उदाहरण पीड़ित कृष्ण कुमार के मामले में तब देखने को मिला जब विगत 21 अक्टूबर  2016 को तहसील दिवस पर उनकी शिकायत पर तहसील से जो जवाब मिला उसमें मकान का आराजी नम्बर 160-161 में होना बताया गया जबकि उनका मकान आबादी नम्बर 169 में स्थित है। इसी तहसील में नायाब तहसीलदार की 15 अ्रपैल 2015 की रिपोर्ट पीड़ित कृष्ण कुमार के पक्ष में यह कहती दिखती है, कि प्रार्थी कृष्ण कुमार के बड़े भाई ने उनके हिस्से में जबरदस्ती कब्जा कर रखा है।

इंसाफ पाने के लिए कृष्ण कुमार हर हफ्ते कभी गाजीपुर के जिलाधिकारी कभी जखनिया तहसील के एसडीएम तो कभी शादियाबाद के थानेदार के दरबार में अपनी अर्जियों के साथ हाजिरी ठोके जा रहे हैं, लेकिन लेकिन लेन-देन की कार्यशैली के चलते उनके साथ इंसाफ होता नहीं दिखता।

आखिर क्यों नहीं रुकते इस तरह के मामले?
पुलिस व प्रशासन विभाग के अधिकारियों और कर्मचारियों के कार्य के प्रति अरूचि तथा काम करने के बदले गलत तरीके से धन अर्जित करने की प्रवृत्ति के चलते इस तरह के मामले अक्सर देखने में आते हैं। ऐसे प्रकरणों में कानून स्पष्ट रूप से पीड़ित को न्याय सुलभ करवाने के हक में अनअधिकृत रूप से काबिज व्यक्ति को हटाये जाने की बात कहता है। इस तरह के मामलों की उपेक्षा के चलते ही शांति भंग से लेकर हत्या तक की घटनाए सामने आती हैं। उप जिलाधिकारी से लेकर क्षेत्रीय थानाध्यक्ष, सी.ओ. का ये प्राथमिक कर्तव्य होता है, कि वो इस तरह के मामले संज्ञान में आने के बाद प्रभावी रूप से कार्यवाही कर पीड़ित पक्षकार के हित में न्याय सुनिश्चित करे जबकि ठीक इसके उलट पीड़ित को जांच का झुनझना थमा सब अपने कत्वर्य की इतिश्री कर लेते है और पीड़ित साल दर साल भटकते रहते है।

बनारस से युवा और प्रतिभाशाली पत्रकार भाष्कर गुहा नियोगी की रिपोर्ट.

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