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मुजफ्फरपुर कांड पर लिखने के कारण पत्रकार प्रवीण बागी को पुलिस अफसर ने भेजा ‘प्रेम पत्र’!

Pravin Bagi : मैं गुनहगार हूं क्योंकि मैंने मुजफ्फरपुर बालिका गृह यौनाचार कांड की जांच में बाधा पैदा की है। जनता को गुमराह किया है। वहां के IG और DIG के खिलाफ फेसबुक के माध्यम से असत्य अफवाह फैलाई है। मेरा 29 जुलाई का पोस्ट deliberate blatant illegal act है। यह मैं नहीं कह रहा, बल्कि मुजफ्फरपुर IG ऑफिस से मिले प्रेम पत्र में कहा गया है।

मुझसे पूछा गया है कि क्यों नहीं मेरे खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाये? साहब ने मेरा हिंदी में लिखा पोस्ट पढ़ कर समझ लिया लेकिन मुझे अंग्रेजी में प्रेम पत्र भेजा, जिसमें भारी भरकम शब्दों का इस्तेमाल किया गया है। बिहार में सरकारी कामकाज की भाषा अब अंग्रेजी हो गई है, यह मुझे पता नहीं था। साहब के पत्र का जवाब बाद में दूंगा, अभी सिर्फ प्राप्ति की सूचना दे रहा हूँ। पत्र संलग्न है-

ये है वो मूल पोस्ट जिसके कारण पुलिस अफसर नाराज हैं…

Pravin Bagi : मुजफ्फरपुर बालिका गृह यौनाचार कांड में अब वरीय पुलिस अधिकारियों की भूमिका भी शक के दायरे में आ गई है। समाज कल्याण विभाग के अधिकारी तो पहले से ही गुनाह में शामिल होने का आरोप झेल रहे हैं। मुजफ्फरपुर के IG और DIG का कांड के खुलासे के करीब दो महीने बाद बालिका गृह का निरीक्षण करने जाना कई सवाल खड़े करता है।

इतने दिनों बाद आखिर इस निरीक्षण का मकसद क्या था? 28 जुलाई को उन्होंने निरीक्षण किया। FSL टीम बुलाकर जांच करवाई गई। कई तरह की दवाएं वहां बरामद की गई। इसके ठीक एक दिन बाद CBI ने केस टेकओवर कर लिया। 1 जून को मुजफ्फरपुर के महिला थाने में यौनाचार की FIR दर्ज कराई गई थी। 2 जून को वहां से कागजात जप्त कर पुलिस ने भवन को सील कर दिया था।

फिर इतने दिन बाद और वह भी तब जब केस CBI को दे दिया गया था, IG और DIG का वहां जाना और फोरेंसिक जांच कराना कहीं सबूतों को इधर -उधर करने की कोशिश तो नहीं थी? या किसी व्यक्ति विशेष को बचाने की कवायद तो नहीं थी? इस तरह के सवाल उठ रहे हैं।

स्वाभाविक भी है। पुलिस ने अबतक वहां से दवाएं जप्त क्यों नहीं की थी? IG और DIG इतने दिनों तक वहां क्यों नहीं गये? CBI के केस लेने के ठीक एक दिन पहले क्यों गये?

CBI को कोई सबूत न मिले, कहीं यह देखने तो वे नहीं गये थे? सृजन घोटाला में भी सारे सबूत जब पुलिस के हाथ आ गए तब वह केस CBI को दिया गया था। बालिका गृह कांड में भी वही फार्मूला अपनाया गया है, लेकिन यहां यह सीधा सीधा नजर में आ गया। अब वर्मा जी तो पकड़े जाने से रहे, कहीं ‘विरजेश सर’ भी न बरी हो जायें? ठीक ही कहा है- जब सैंया भये कोतवाल तो डर काहे का…

वरिष्ठ पत्रकार प्रवीण बागी की फेसबुक वॉल से.


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