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साहित्य

एक नंबर के औरतबाज संपादक, हर शहर और कस्बे में उनका अपना हरम होता था!

गणेश झा-

पंजाब के एक संपादक की कहानी सुनाता हूं। हिन्दी के कई राष्ट्रीय अखबारों में उनके चरण पड़े पर ख्याति उन्हें अपने सूबे पंजाब के एक अखबार में ही मिली। बंटाधार भी उसी अखबार ने कराया। फिर अखबार का भी बंटाधार हो गया।

जाति से ब्राह्मण पर बड़े गुस्सैल स्वाभाव के। हमेशा गुरूर में रहनेवाले। भयंकर रूप से अहंकारी। गुंडई करने वाले भी। पर एक नंबर के औरतबाज। हर शहर और कस्बे में उनका अपना हरम होता था। कई राज्यों तक में उन्होंने अपना खुद का औरतखाना बना रखा था और जब मर्जी स्पेशल रिपोर्टिंग के बहाने निकल पड़ते थे। अकेले ही जाते थे। साथ मेंं कभी किसी रिपोर्टर को नहीं जाने देते थे। कोई जाना चाहता था तो साफ मना कर देते थे। दफ्तर के लोग संपादकजी की औरतबाजी को जानते थे इसलिए उनके दौरे में साथ लग लेना चाहते थे।

रिपोर्टिंग के बहाने औरतबाजी होती थी। जहां जाते थे वहां का स्ट्रिंगर होटल में कमरा बुक कराकर रखता था। प्रेमिका भी कोई बहाना बनाकर घर से निकलती थी और वहीं पहुुंच जाती थी। पर सुरक्षा कारणों से प्रेमिका के लिए पास के किसी दूसरे होटल में एक कमरा बुक कराया जाता था।

संपादकजी अपना हरम बनाने के लिए गरीब परिवार की जरूरतमंद लड़कियां चुनते थे और फिर उन पर डोरे डालते थे। सेटिंग हो जाने और बात बन जाने पर संपादकजी उन प्रेमिकाओं के घर पर ग्रोसरी, कपड़े और तमाम जरूरत के सामानों की नियमित फ्री सप्लाई शुरू कर देते थे। और तो और, घर के पासवाली प्रेमिका के घर तो संपादकजी अपने अखबार के दफ्तर से प्लंबर और बिजली मिस्त्री तक भिजवा दिया करते थे। एक खूबसूरत प्रेमिका को तो संपादकजी ने यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर भी बनवा दिया था। उसे संपादकजी के अलावा उनके कुछ परिचित भी भोगते थे। एक प्रेमिका ने तो वादा करके अखबार में नौकरी न देने पर धोखा खाकर खुदकुशी भी कर ली थी। इसका केस भी हुआ था और खूब जांच-पड़ताल और इनहाउस इनक्वायरी वगैरह हुई थी।

संपादक जी की ब्राह्मणी को उनकी यह औरतबाजी अच्छी नहीं लगती थी और इस वजह से संपादकजी के घर में हमेशा महाभारत होता रहता था। इसपर संपादकजी अपनी ब्राह्मणी को खूब पीटते थे। उनके घर होनेवाले इस नियमित कोहराम से पूरा मोहल्ला परेशान रहता था और मोहल्ले की औरतों के मार्फत सारा मोहल्ला ब्राह्मणी अबला की पीड़ा और संपादकजी की औरतबाजी की कहानी को जानने लगा था।

संपादकजी की कई प्रेमिकाएं आज भी उनसे इश्क फरमाती हैं। संपादकजी के हरम की पूरी कहानी आप मेरी किताब ‘पत्रकारिता की कंटीली डगर’ में विस्तार से पढ़ सकते हैं।

मेरा आपसे आग्रह है आप इस किताब को जरूर पढ़ें। इसे आप पढेंगे तो मुझे अच्छा लगेगा। किताब को पढ़ते हुए आप बोर बिल्कुल नहीं होंगे। पढकर अपनी राय भी साझा कीजिएगा। ताकि आपके सुझाव अगली किताब में मेरे काम आएं। कुछ समय में इस किताब का अंग्रेजी संस्करण भी बाजार में आ जाएगा। किताब फ्लिप्कार्ट पर उपलब्ध है। पर इसे आप सीधे प्रकाशक से भी मंगा सकते हैं।
किताब के बारे में जानकारी कुछ इस तरह है –
किताब का नाम – ‘पत्रकारिता की कंटीली डगर’
लेखक – गणेश प्रसाद झा
प्रकाशन – बिंब-प्रतिबिंब प्रकाशन, फगवाड़ा, पंजाब
कुल पृष्ठ – 384
मूल्य – 700 रुपए (पेपरबैक)

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