पत्रकारों की संख्या इतनी बढ़ गई है कि प्रधानों-कोटेदारों का जीना हराम हो गया है!

वेब पोर्टल, डिजिटल, सोशल मीडिया, वाट्सअप, फेसबुकिया…. ऐसे पत्रकारों की संख्या में दिन प्रतिदिन इजाफा होता जा रहा है. पहले के जमे जमाए अखबार और टीवी वाले पत्रकार तो हैं ही.. ऐसे में अब किसी को भी समझ में आना मुश्किल हो गया है कि कौन पत्रकार उगाही करने वाला है और कौन सच्चाई के साथ खड़ा होने वाला ईमानदार पत्रकार हैं.

इसी बाबत एक पत्रकार संगठन के एक पदाधिकारी ने जिला प्रशासन को पत्र भेजा है. सवाल तो ये भी है कि ये पत्रकार संगठन वाले भी कितने ओरीजनल पत्रकार हैं? लेटरपैड छपवा कर चिट्ठी लिखते रहना ही कहां की पत्रकारिता है… पर सबकी दुकानें चल रही हैं तो इनकी भी चलनी ही चाहिए…

पर सबसे सही बात ये है कि मीडिया में अभी इतनी इंटरनल डेमोक्रेसी बची है कि मीडिया वाले आपस में ही एक दूसरे की अच्छाई बुराई बतियाते लिखते छापते रहते हैं. अफसरों में तो भयानक एकता है. कोई अफसर किसी दूसरे भ्रष्ट अफसर के बारे में एक शब्द नहीं बोलता-लिखता.

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