मशहूर इतिहासकार प्रोफेसर लाल बहादुर वर्मा का निधन

कई विश्वविद्यालयों में पढ़ाई जाती हैं इनकी पुस्तकें

प्रयागराज। मशहूर इतिहासकार और साहित्यकार प्रो. लाल बहादुर वर्मा का रविवार की देर रात निधन हो गया। उनका इलाज देहरादून के एक अस्पताल में चल रहा था। कोरोना से ठीक होने के बाद किडनी की बीमारी से पीड़ित हो गए थे, रविवार की रात उनकी डायलसिस होनी थी, लेकिन किसी वजह से नहीं हो पाई, देर रात निधन हो गया।

प्रो.वर्मा मौजूदा दौर के उन गिने-चुने लोगों में से थे, जिनकी पुस्तकें देश अधिकतर विश्वविद्यालयों के किसी न किसी पाठ्यक्रम में पढ़ाई जा रही हैं। वे लंबे समय तक इलाहाबाद में रहे, तकरीबन चार वर्ष पहले देहरादून शिफ्ट हो गए थे।

10 जनवरी 1938 को बिहार राज्य के छपरा जिले में जन्मे प्रो. वर्मा ने प्रारंभिक हासिल करने के बाद 1953 में हाईस्कूल की परीक्षा जयपुरिया स्कूल आनंदनगर गोरखपुर से पास किया था; इंटरमीडिएट की परीक्षा 1955 में सेंट एंउृज कालेज और स्नातक 1957 में किया। स्नातक की पढ़ाई के दौरान ही आप छात्रसंघ के अध्यक्ष भी रहे।

लखनउ विश्वविद्यालय से 1959 में स्नातकोत्तर करने के बाद 1964 में गोरखपुर विश्वविद्यालय से प्रो. हरिशंकर श्रीवास्तव के निर्देशन में ‘अंग्लो इंडियन कम्युनिटी इन नाइनटिन सेंचुरी इंडिया’ पर शोध की उपाधि हासिल किया। 1968 में फ्रेंच सरकार की छात्रवृत्ति पर पेरिस में ‘आलियांस फ्रांसेज’में फे्रंच भाषा की शिक्षा हासिल किया।

गोरखपुर विश्वविद्यालय और मणिपुर विश्वविद्यालय में अध्यापन कार्य करने के बाद 1990 से इलाहाबाद विश्वविद्यालय से अध्यापन कार्य करते हुए यहीं से सेवानिवृत्त हुए। ‘इतिहासबोध’ नाम पत्रिका बहुत दिनों तक प्रकाशित करने के बाद अब इसे बुलेटिन के तौर पर समय-समय पर प्रकाशित करते रहे।

इनकी हिन्दी, अंग्रेजी और फ्रेंच भाषा में डेढ़ दर्जन से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं, इसके अलावा कई अंगे्रजी और फ्रेंच भाषा की किताबों का अनुवाद भी किया है। बीसवीं सदी के लोकप्रिय इतिहासकार एरिक हाब्सबाम की इतिहास श्रंखला ‘द एज आफ रिवोल्यूशन’ अनुवाद किया था, जो काफी चर्चित रहा।

उनकी प्रमुख पुस्तकों में ‘अधूरी क्रांतियों का इतिहासबोध’,‘इतिहास क्या, क्यों कैसे?’,‘विश्व इतिहास’, ‘यूरोप का इतिहास’, ‘भारत की जनकथा’, ‘मानव मुक्ति कथा’, ‘ज़िन्दगी ने एक दिन कहा था’ और ‘कांग्रेस के सौ साल’ आदि हैं। जिन किताबों का हिन्दी में अनुवाद किया है, उनमें प्रमुख रूप से एरिक होप्स बाम की पुस्तक ‘क्रांतियों का युग’, कृष हरमन की पुस्तक ‘विश्व का जन इतिहास’, जोन होलोवे की किताब ‘चीख’ और फ्रेंच भाषा की पुस्तक ‘फांसीवाद सिद्धांत और व्यवहार’ है।

प्रोफ़ेसर वर्मा के निधन के बाद सोशल मीडिया पर लोग उन्हें अपने अपने तरीक़े से याद कर श्रद्धांजलि दे रहे हैं-

लाल बहादुर सिंह-

यूरोप के इतिहास के बड़े अध्येता आदरणीय वर्मा जी ने गाजीपुर बॉर्डर पर किसानों के मोर्चे से Pankaj Srivastava को इंटरव्यू देते हुए (जो सम्भवतःउनके आखिरी सार्वजनिक बयानों में होगा) फ्रांसीसी क्रान्ति को याद किया था।

वे कितने उत्साह और उम्मीदों से लबरेज थे!

जन-इतिहासकार प्रो0 वर्मा सर्वोपरि बदलाव की praxis के योद्धा थे, अकेडेमिसियन बाद में।

अलविदा सर!
आप हमेशा हम सब की स्मृतियों में जिंदा रहेंगे प्रेरणा बनकर!

उर्मिलेश-

कुछ ही देर पहले पत्रकार-मित्र सत्यम की पोस्ट से प्रो लाल बहादुर वर्मा के निधन की दुखद सूचना मिली. उनकी अस्वस्थता और देहरादून स्थित एक अस्पताल में भर्ती होने की खबर कुछ दिनों पहले मिली थी. फिर स्वास्थ्य में सुधार की सूचना मिली तो हम सबको लगा था कि वह जल्दी ही पूरी तरह स्वस्थ होकर सामान्य जीवन में लौटेंगे और अपने तमाम अधूरे काम पूरा करने में जुटेंगे. पर ऐसा नहीं हो सका.
प्रो वर्मा की पुस्तकों और लेखों को पढ़कर हम जैसों को अपना इतिहास-बोध विकसित करने में मदद मिली थी. सबसे पहले हिंदी में लिखी उनकी एक किताब पढ़ी थी: यूरोप का इतिहास. अपेक्षाकृत छोटी सी इस किताब ने यूरोप के दिलचस्प इतिहास में मेरी रुचि बढाई.

उनके बारे में पहली दफा सन् 1977-78 में जाना. मैं इलाहाबाद विश्वविद्यालय का स्नातकोत्तर छात्र था और वह गोरखपुर विश्वविद्यालय में इतिहास के प्रोफेसर थे. उन दिनों उनके संपादकत्व में निकलने वाली पत्रिका ‘भंगिमा’ प्रगतिशील सोच के छात्रों, अध्यापको और लेखकों-कवियों के बीच काफी चर्चित थी. होस्टल के हमारे वरिष्ठ साथी कृष्ण प्रताप (केपी सिंह ), विभाग के हमारे सीनियर रामजी राय और हिमांशु रंजन जैसे साथी ‘भंगिमा’ के नियमित पाठक थे. वर्मा जी से इन लोगों का अच्छा परिचय था.

हम लोगों के बीच उन दिनों गोरखपुर के अन्य बुद्धिजीवियों-लेखकों-शशि प्रकाश, मदन मोहन और कई लोगों की चर्चा होती रहती थी. शशि प्रकाश तो इलाहाबाद आते भी रहते थे. बहुत बाद में प्रो वर्मा के सुपुत्र सत्यम से परिचय हुआ, जब वह दिल्ली में यूनीवार्ता में काम करने लगे थे. कुछ समय हम दोनों समाचार अपार्टमेन्ट में पड़ोसी भी रहे. संयोगवश, प्रो वर्मा से कभी मेरा निजी संवाद नहीं हुआ. एक संगोष्ठी में उन्हें वक्ता के तौर पर सुना था. ठीक-ठीक याद नहीं, संभवतः एकाध बार कभी फोन पर बातचीत हुई हो! जहां तक याद है, इलाहाबाद के दौरान कुछ समय चिट्ठियों का आदान-प्रदान रहा. ये बात उस समय की है, जब हम लोग इलाहाबाद से ‘वर्तमान’ नामक पत्रिका निकाल रहे थे. निजी मुलाकातें भले न रहीं पर उनके लेखन से हमारा गहरा परिचय था. उनकी प्रतिबद्धता और जनपक्षधरता के हम सब कायल थे. वक़्त गुजरता रहा पर इसमें कभी कमी नहीं आई.

एक मार्क्सवादी विचारक, प्रखर इतिहासकार, सुयोग्य शिक्षक और संपादक के रूप में प्रोफेसर लाल बहादुर वर्मा हमेशा याद किये जायेंगे. दिवंगत वर्मा जी को सादर श्रद्धांजलि और परिवार के प्रति शोक-संवेदना.

समीरात्मज मिश्रा-

इतिहासकार प्रोफ़ेसर लालबहादुर वर्मा जी नहीं रहे। सर की पुस्तकों ने ही हम जैसे लोगों को विश्व इतिहास से परिचित कराया था।

प्रोफ़ेसर वर्मा इलाहाबाद विश्वविद्यालय की उस शिक्षक परंपरा की एक अहम कड़ी थे जिन पर गर्व किया जाता है और जिनसे विद्यार्थी केवल ज्ञान ही नहीं स्नेह भी भरपूर पाते थे।

आजकल देहरादून में रह रहे थे। फ़ोन पर कभी कभी ही बात होती थी, लेकिन वो लंबी होती थी। अब नहीं होगी।

सर को विनम्र श्रद्धांजलि

सुभाष चंद्र कुशवाहा-

नहीं रहे सुप्रसिद्ध इतिहासकार, एक्टविस्ट और जनचेतना के प्रखर पुरोधा प्रो लालबहादुर वर्मा। लोकरंग 2018 में वह बिना किसी औपचारिकता के पधारे थे। रुपये 2000 सहयोग भी देना चाहते थे मगर हमने उनके आने को ही बड़ा सहयोग माना। वर्तमान में वह भले ही देहरादून में रह रहे थे मगर उनकी कर्मभूमि गोरखपुर थी।

जब हम विश्वविद्यालय में थे, तब वह प्राचीन इतिहास विभाग के विभागाध्यक्ष थे। शहर के हर सांस्कृतिक कार्यक्रमों में उनकी उपस्थिति अनिवार्य थी। बाद में वह इलाहाबाद में रहे। वहाँ से इतिहास बोध नामक पत्रिका भी निकालते रहे।

अंतिम दिनों में उन्होंने अपनी बेटी के पास, देहरादून में निवास बनाया। वहां भी वह लगातार सक्रिय थे। 2019 में उनके देहरादून निवास स्थान पर गया भी था। कोरोना का प्रकोप न होता तो 2020 में भी देहरादून जाता। आज वह हमारे बीच नहीं रहे।

कोरोना ने अगर उन्हें नहीं छीना होना तो अभी उनके पास आने वाले दशकों के लिए जरूरी कार्यक्रम थे। वह उनपर काम कर रहे थे। साथियों को जोड़ रहे थे। उनका जाना बेहद अफसोसजनक है। नमन। लोकरंग परिवार की ओर से श्रद्धांजलि।

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