अब पीटीआई भी चली लालाओं की राह

312 कर्मचारियों को निकाला, पत्रकारों को ठेके पर लेंगे… पत्रकारों व पत्रकारों संगठनों ने साधी चुप्पी… छी, घिन आती है कभी-कभी कि मैं पत्रकार हूं। नपुंसकों की जमात में शामिल हूं। एक दिन विलुप्त हो जाएंगे नेता, अडानी-अंबानी चलाएंगे ठेके पर देश।

देश की सबसे प्रतिष्ठित व विश्वसनीय समाचार एजेंसी पीटीआई यानी प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया भी अमर उजाला, दैनिक जागरण, सहारा, हिन्दुस्तान अखबार जैसे लालाओं की तर्ज पर काम करने लगी है। राइटर जैसी सेवा के साथ गठबंधन के बाद पीटीआई को करोड़ों रुपये का लाभ होता है लेकिन वह अब उसे कर्मचारी बोझ लगने लगे हैं जो कि पिछले 20 वर्षों से भी अधिक समय से यहां जुड़े हुए हैं। जिन्होंने पीटीआई को पाला-पोसा।

हम पत्रकार तो बड़े बनने की होड़ में इधर से उधर कूदते रहते हैं। लेकिन पानी पिलाने से लेकर हमारी खबरें, फोटो से लेकर फैक्स और मेल तैयार करने वाले कर्मचारियों को पीटीआई ने बड़ी बेदर्दी से एक दिन में ही रिट्रेंच यानी छंटनी कर बाहर कर दिया।

उम्र के ढलाव में पहुंच चुके अधिकांश कर्मचारी अब कहां जाएंगे। हालांकि मुख्य एडमिन हेड मिश्रा ने बड़ी ही बेशर्मी के साथ छंटनी किए गए कर्मचारियों से अपने बैंक अकाउंट में आए पैसे पता करने का फरमान सुना दिया लेकिन दिनोंदिन बढ़ती महंगाई और प्राइवेट सेक्टर में युवाओं से भला ये लोग कैसे मुकाबला करेंगे? इस संबंध में पीटीआई प्रबंधन ने नहीं सोचा।

सूत्रों से पता चला कि पत्रकारों को इसलिए नहीं निकाला गया कि उन्हें ठेके पर लिया जाएगा। जैसे एनबीटी और एचटी ने लिया है।

जो लोग सड़क पर आ जाते हैं, उनसे और उनके परिवार पर क्या गुजरती है? यह एहसास किसी को नहीं है। सिर्फ प्रॉफिट चाहिए और इसके लिए आम कर्मचारियों का खून चूसना है। खून चूसने का ठेका प्रथा से बेहतर विकल्प क्या हो सकता है?

विडम्बना है कि पत्रकारों व उनके संगठनों ने इस छंटनी पर एक शब्द नहीं बोला। फिर ऐसे पत्रकार संगठनों का करें क्या? छी घिन सी आती है कि हम पत्रकार कितने नपुंसक होते हैं। और हां, एक बात तय है कि एक दिन होगा जब देश में नेता राजाओं की तरह विलुप्त हो जाएंगे तब उस दिन अडानी-अंबानी जैसे धनवान देश की बोली लगाएंगे और राज चलाएंगे।

[वरिष्‍ठ पत्रकार गुणानंद जखमोला की फेसबुक वॉल से]

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