एक राष्ट्र क्या महज जमीन का टुकड़ा या सरहदों में बांध दिया जाना वाला भू-भाग होता है?

नदीम अख़्तर-

भारत राज्यों का राज्य है, राज्यों का संघ है, Union of States है और यही देश है, राष्ट्र है। राष्ट्र की अवधारणा में जाएंगे तो फिर मुझे फिलॉसफी में जाना होगा। उसे छोड़िए. इसी भू-भाग में जब अलग-अलग राजाओं, सम्राटों, महाराजाओं और बादशाहों की छतरी तनी थी, तब युद्ध द्वारा जीते गए उनके अधिकार क्षेत्र उनके अपने-अपने राष्ट्र थे और जनता उसी सीमित जमीन वाले राष्ट्र पर मर-मिटती थी.

लेकिन एक राष्ट्र क्या महज जमीन का टुकड़ा या सरहदों में बांध दिया जाना वाला भू-भाग है ? नहीं, राष्ट्र-राज्य की अवधारणा इससे कहीं ज्यादा व्यापक है और इसीलिए ऊपर मैंने लिखा कि राष्ट्र को परिभाषित करने के लिए मुझे फिलॉसफी में जाना होगा.

अंतरिक्ष से देखें तो ये पूरी दुनिया ही एक राष्ट्र है. व्यक्तिगत रूप से मेरा मानना है कि राष्ट्र-राज्य की अवधारणा में फंसाकर इंसानों का शोषण अनंत काल से होता आ रहा है. राजा राज करेगा, तो उसके इस राज के लिए कोई दूसरा आदमी यानी नागरिक खून क्यों बहाएगा, जंग क्यों लड़ेगा ? यहीं से कबीले और बाद में राज्य की अवधारणा पैदा की गई. लोगों के दिमाग में भरा गया कि सिर्फ यही कबीला अपना है, बाकी कबीलों में रहने वाले पराए हैं. सो अपने कबीले की रक्षा के लिए जान देना हर कबीलावासी का परम धर्म है.

इस तरह कबीले के सरदारों ने कबीलों में अपनी गद्दी सुरक्षित करने के लिए कबीलावासियों को जंग के मैदान में उतार दिया. बाद में विकसित होकर ये कबीले छोटे-छोटे राज्य और फिर और बड़े होकर राज्यों के संघ में बदल गए. लेकिन कबीले से लेकर राज्य और फिर संघ तक, हर चौहद्दी में एक राष्ट्र विराजमान था. यहां ध्यान देने वाली बात ये है कि राजतंत्र से लेकर लोकतंत्र और तानाशाहतंत्र तक में राष्ट्र के विस्तार की नीति राजा या गद्दी पर आसीन व्यक्ति ही बनाता और लागू करता है. इसके लिए वह नागरिक समाज के सदस्यों को भर्ती करके एक सेना खड़ी करता है और फिर अपने मंसूबों को अंजाम देता है. आम जनता कभी राष्ट्र के विस्तार की नीति या जंग के ऐलान के फैसले में शामिल नहीं रही. हां, अपने राष्ट्र के लिए प्राण अर्पित करने की घुट्टी हर नागरिक समाज को राजा की सत्ता बचपने से ही पिलाती रही है.

पहले जो समझदार राजा होते थे, वह नए राज्यों को अपने राज्य या राष्ट्र में मिलाने के बाद वहां की जनता से भी बराबरी का सलूक करते थे और उनके पूरे राज्य में प्रजा को एकसमान अधिकार थे. दिक्कत वहां पैदा हुई, जब अलग-अलग राष्ट्रों ने नए राष्ट्र-राज्य जीतने के बाद वहां की प्रजा को गुलाम बनाने की प्रथा शुरु की और उनका शोषण करना शुरु कर दिया.

यहां से राष्ट्रवाद एक अलग रूप में समाज में फैला और ये धारणा प्रबल हुई कि उनका कबीला अलग है, हमारा अलग. हमारा कबीला, शत्रुओं के कबीले का गुलाम नहीं बन सकता और फिर राष्ट्रवाद एक अलग धर्म, सम्प्रदाय, रेस या फिर सामाजिक-नागरिक सभ्यता के दायरे में सिमट गया. इस व्यवस्था में सबको सिर्फ अपनी पड़ी है. हम राज करेंगे, हम श्रेष्ठ हैं, हम दूसरों को गुलाम बनाएंगे, हम पृथ्वी के शासक बनेंगे, ऐसी सोच ने सीमित-संकुचित राष्ट्रवाद को खूब हवा दी है और आज पूरी दुनिया में यही राष्ट्रवाद चल रहा है. हर जगह. आप दुनिया का नक्शा उठाकर देख लीजिए. क्या लोकतंत्र और क्या तानाशाहतंत्र, सब जगह यही सोच हावी है.

लेकिन ऐसा नहीं है कि राष्ट्रवाद की इस संकुचित-सीमत और विकृत परिभाषा से इतर किसी ने दिल बड़ा करके व्यापक दृष्टिकोण से राष्ट्र-राज्य की परिकल्पना नहीं की. भारत भूमि से सम्बद्ध हमारी सभ्यता में हमारे पुरखों ने बहुत पहले ही कह दिया था- वसुधैव कुटुम्बकम. यानी उन्होंने घर-परिवार को किसी सरहद या सीमा-रेखा में ना बांधकर ये कहा कि पूरी धरती ही हमारा राष्ट्र है और यहां रहने वाले तमाम प्राणी अपने कुटुम्ब हैं, अपने परिवार के सदस्य हैं. अब सोचिए कि जब पूरी धरती पर रहने वाले इंसान और समस्त प्राणी अगर एक ही परिवार के सदस्य हैं, पृथ्वीवासी हैं, तो फिर तेरा कबीला और मेरा कबीला वा्ली लड़ाई के लिए यहां कोई जगह बची है क्या?

ये मानव सभ्यता का दुर्भाग्य है कि जन्म लेने से मरने तक हर देश-राष्ट्र का नागरिक इस पृथ्वी को आपस में बांटकर देखता है. उसे बचपने से ही ऐसा सिखाया जाता है. जबकि असल हकीकत ये है कि इंसान इस नीले गोले यानी पृथ्वी पर जन्म लेता है, किसी देश, राष्ट्र या राज्य में नहीं. यह पूरी पृथ्वी उसकी अपनी है और यह उसका जन्मसिद्ध अधिकार है कि वह इस पूरी पृथ्वी पर जहां मन चाहे, वहां जाए, जहां जी करे वहां पढाई करे और जहां दिल लग जाए, वहां बस जाए. हमने इंसानों को राष्ट्रों में बांटकर जघन्य अपराध किया है. लेकिन एक दिन यह व्यवस्था ढह जाएगी. यह एलियन के पृथ्वी पर आक्रमण से होगा, किसी भयानक महामारी की चपेट में आने से होगा या फिर हाइड्रोजन बमों के इस्तेमाल के बाद, कह नहीं सकते, पर ये होगा जरूर एक दिन. धन्यवाद.

–नदीम अख्तर, 03-02-2022



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