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राष्ट्रभक्त चैनल की परिभाषा बता रहे हैं विनीत कुमार

Vineet Kumar : राष्ट्रभक्त चैनल वो है जो अपने देश के आईएएस ऑफिसर को आतंकवादी समर्थक बताये, स्कूल शिक्षिका को अपने छात्रों से देह व्यापार करनेवाली बताये और उसकी हत्या करने के लिए माहौल बनाये. राष्ट्र निर्माण के लिए खबर न चलाने की एवज में 100 करोड़ रुपये की मांग करे. आपकी टिप्पणी की शक्ल में गाली से गुजरें इससे पहले ये जोड़ता चलूँ कि ऐसे राष्ट्रभक्त चैनल के संपादक के वकील ने स्वीकार कर लिया है कि 100 करोड़ की मांग करने की जो बात कही गई, वो आवाज़ किसी और की नहीं, संपादक की ही है.

Vineet Kumar : राष्ट्रभक्त चैनल वो है जो अपने देश के आईएएस ऑफिसर को आतंकवादी समर्थक बताये, स्कूल शिक्षिका को अपने छात्रों से देह व्यापार करनेवाली बताये और उसकी हत्या करने के लिए माहौल बनाये. राष्ट्र निर्माण के लिए खबर न चलाने की एवज में 100 करोड़ रुपये की मांग करे. आपकी टिप्पणी की शक्ल में गाली से गुजरें इससे पहले ये जोड़ता चलूँ कि ऐसे राष्ट्रभक्त चैनल के संपादक के वकील ने स्वीकार कर लिया है कि 100 करोड़ की मांग करने की जो बात कही गई, वो आवाज़ किसी और की नहीं, संपादक की ही है.

आप में से जिन दोस्तों को रामनाथ गोयनका सम्मान मिला है, जिसका स्मृति चिन्ह बड़ी सी सुनहरी निब है, सुबह उठकर अच्छे से, कपडे से साफ़ कीजियेगा. आमलोगों के बीच इसकी चमक बहुत फीकी होती जा रही है. राष्ट्रभक्त संपादक के मिलने के बाद तो और भी. मेरी कामना है कि कम से कम आपकी नज़र में ये चमक बरकरार रहे.

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TALK journalism 2016 जयपुर : इस तरह ख़त्म हुआ पत्रकारों की सुरक्षा के सवाल पर आधारित आज का सत्र. हमारे सामने मंच पर दो ऐसे पत्रकार बैठे हैं जिन्हें गोलियों से भी डर नहीं लगता और उनके बीच विनीत कुमार बैठे हैं जिन्हें गोली क्या, गाली से भी डर लगता है. वो भाई साहब मेरे एक मिनट बोलने भर से, शुरू में ही कुलबुलाने लगे. एक सवाल भी किया और मैंने क़ायदे से जवाब भी दिया लेकिन उनसे रहा नहीं गया . भरे पड़े तो थे ही तो एकदम आख़िर में सवाल के लिए माइक लिया और ये स्ट्रोक दे मारा. मौक़े पर गोली-गाली की ऐसी तुकबंदी हुई कि लोग ठहाके लगाने लगे. नीचे उतरकर उन्होंने हाथ बढ़ाया तो मैंने गले मिलने की मुद्रा में शरीर झुका दिया, वो गले मिले लेकिन चेहरे पर कसक साफ़ झलक रही थी.

मैंने एक श्रोता के इस सवाल पर कि सरकार पत्रकारों की सुरक्षा के लिए कुछ क्यों नहीं करती के जवाब में कहा था- सरकार जो राजनीतिक पार्टियाँ जीतने के बाद बनाती है वो तो वाररूम बनाकर अपने यहाँ सैलरी देकर शूटर रखती है जो कि असहमति में लिखने पर ट्रोल करने का काम करते हैं..वो भला पत्रकारों की सुरक्षा क्यों करने लगें? लेकिन हाँ वो देश के राष्ट्रभक्त पत्रकारों को ज़ेड सुरक्षा तक मुहैया कराती है.. ऐसे पत्रकार अतिसुरक्षित रहते हैं. लेकिन सवाल सवाल ये है कि ऐसे सुरक्षित पत्रकार से पत्रकारिता का पेशा सुरक्षित है ? हमें बात सिर्फ पत्रकारों की हो रही हत्या और संख्या पर नहीं करनी चाहिए, पत्रकारिता की जो तथाकथित राष्ट्रभक्त पत्रकार हत्या कर रहे हैं, उन पर भी बात करने की ज़रूरत है.

मीडिया विश्लेषक विनीत कुमार की एफबी वॉल से.

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