मैं ही हूं रवींद्र कालिया

IIMC पास करने के कुछ दिनों की बात है। पत्रकारिता का नया-नया रंगरूट था। नौकरी नहीं करने का फैसला किया था। फ्रीलांसिंग शानदार चलती थी और लगता था ज़िंदगी में और क्या चाहिए। मोहन सिंह प्लेस कॉफी हाउस में बैठे हुए कुछ लोगों के बीच इलाहाबाद का ज़िक्र छिड़ा। और मेरे मन में तुरंत इलाहाबाद जाने की हुड़क मच गई। ऐसी हुड़क कि मैंने कॉफी हाउस से सीधे इलाहाबाद की ट्रेन पकड़ने का फैसला किया। कोई रिजर्वेशन नहीं, कोई तैयारी नहीं। दूसरा दर्जा तब कैटल क्लास के नाम से कुख्यात नहीं हुआ था।

ख़ैर, एक पत्रिका के संपादक वहीं बैठे थे। मैं उन्हें जानता नहीं था। उन्हें पता नहीं क्या सूझा मेरी तरफ बढ़े और कहा गजब झक्की हो। लेकिन जब जा रहे हो तो एक इंटरव्यू कर लाना। तुम्हें जानता नहीं लेकिन पता नहीं क्यों लगता है कि तुम बढ़िया करोगे। अगली सुबह प्रयागराज एक्सप्रेस के कैटल क्लास में जैसे-तैसे अकड़ा हुआ इलाहाबाद पहुंच ही गया। स्टेशन पर चाय-मठरी खाकर टेंपु में बैठा और अपने पुराने हॉस्टल हॉलैंड हॉल पहुंचा। मैदान में नहाकर। मेहदौरी कॉलोनी के लिए निकला। तब मोबाइल ने दुनिया को मुट्ठी में नहीं किया था।

रवींद्र कालिया का घर उस मोहल्ले में आनंद भवन की तरह था। उनकी किताबें पढ़ चुका था और उनकी किस्सागोई का एक न्यूनतम आतंक भी कहीं न कहीं मौजूद था।

बैठकखाने का दरवाजा खुला था।

मैंने पूछा, कालिया जी यहीं रहते हैं?

“जी हां, आप?” वह ममता कालिया थीं।

“मैं नवीन। दिल्ली से आया हूं। बात करनी है”

अंदर से एक लंबा आदमी बैठकखाने में दाखिल हुआ।

“मैं ही हूं रवींद्र कालिया।”

“क्या करते हो?”, उनका पहला सवाल था।

“कुछ नहीं”, मैंने जवाब दिया।

“बहुत अच्छा करते हो” वो हंस पड़े।

जब इंटरव्यू की बात की तो उन्होंने कहा ब्रेकफास्ट किया है तुमने? मैंने कहा सर ब्रेकफास्ट नहीं करता, खाना खाता हूं।

“तो ब्रेकफास्ट को ही खाना समझकर खा लो।”

ममता जी चौड़ी किनारी वाली थाली में दलिया ले आई थीं। और एक बड़ी सी कटोरी में भरके टेबल पर ही रख दिया था। एक तश्तरी में चम्मच।

कालिया जी ने कहा शुरू करो।

मैं असमंजस में था। वो ताके जा रहे थे। फिर चम्मच उठाकर दलिया खाने लगा। फिर वो ठठाकर हंसने लगे। कहे ऐसे थोड़े खाते हैं। उन्होंने थाली दोनों हाथों से उठाई और एक लंबी सी आवाज आई सुड़़$$$$$.. मेरी समझ में नहीं आ रहा था कैसे रिएक्ट करूं। उन्होंने लगभग डांटते हुए कहा। तुम तो जवान भी नहीं हुए ठीक से। लंबी सुड़ निकालो। फिर मैंने भी थाली उठा ली। कमरे में बहुत देर-देर तक सिर्फ सुड़-सुड़ की आवाज़ आ रही थी। ममता जी हंस रही थीं, “खेल चुके तो बात भी कर लो तुम लोग।” हम दोनों हंस रहे थे। पता नहीं कब शाम ढल गई थी।

आज जब उस आदमी को लोधी रोड के श्मशान में जलाकर लौटा हूं तो लग रहा है हिंदी का संसार अपने आप से नाराज़ हो गया है। 17 रानडे रोड की किस्सागोई ने कई बार मेरे भीतर रश्क पैदा किया है। ‘गालिब छूटी शराब’ आप सिर्फ शुरू करते हैं, वो खत्म अपने आप हो जाती है। जब वो नया ज्ञानोदय के संपादक थे तब मैं भी एक उपन्यास लिखने की योजना बना रहा था। शिवेंद्र सिंह मुझे लेकर ज्ञानपीठ गए थे। कालिया जी ने पूछा था कबतक लिख लोगे? मैंने कहा था दो महीने में। वो दो महीना आजतक पूरा नहीं हुआ। और दुनिया से रूठ गए रवींद्र कालिया।

इलाहाबाद के उस इंटरव्यू में उन्होंने कहा था दिल्ली साहित्य की मंडी है। मंडी में सारा माल बिक जाता है इसलिए दिल्ली के बगैर किसा का काम नहीं चल सकता। चलते हुए उन्होंने गालिब छूटी शराब की प्रति देते हुए ताकीद की थी एक पाठक के तौर पर कभी खरीदार मत बनना। न माल को कभी पढ़ना। यह एक लेखक की एक संभावनाशील लेखक को चेतावनी है।.. आज लोधी रोड श्मशान घाट से लौटते हुए लगातार सुड़-सुड़ की वो आवाज़ आती रही। याद आती रही वो चेतावनी। मंडी में बैठकर माल को खारिज करना असंभव से कुछ ही कम है रवींद्र कालिया। मैंने अभीतक किया है। आपके ठहाके मेहदौरी कॉलोनी से मरीन ड्राइव और मशान तक के हर चौराहे पर आपकी उपस्थिति की पंजिका लिए खड़े हैं। एक लेखक कभी नहीं मरता। कभी नहीं।

लेखक नवीन कुमार न्यूज24 चैनल से जुड़े हुए हैं. उनका यह लिखा उनके फेसबुक वॉल से लिया गया है.



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