अगर भारतीय/पाकिस्तानी रिपोर्टर जासूस बनकर जाए तो!

राजीव शर्मा-

आज रात जब मैं अपना ट्विटर अकाउंट चेक कर रहा था तो मुझे सिद्धार्थ मल्होत्रा की आनेवाली फ़िल्म ‘मिशन मजनू’ का ट्रेलर देखने को मिला। चूंकि भारत और पाकिस्तान दोनों में जनता इस तरह की फ़िल्में देखकर ख़ूब तालियां बजाती है, इसलिए निर्माता समय-समय पर ऐसी फ़िल्में बनाते रहते हैं। इन्हें बनाना कितना सही या कितना ग़लत है, इस पर चर्चा नहीं कर रहा हूं।

चूंकि मैं ख़बरों और लेखन से जुड़ा हूं, इसलिए भारत के अलावा पाकिस्तान का मीडिया भी देखता रहता हूं। ख़ासतौर से बीबीसी उर्दू, उर्दू वीओए और कुछ उर्दू ख़बरिया चैनल।

मैं दोनों को देखकर एक बात 100 प्रतिशत विश्वास के साथ कह सकता हूं कि इनके बड़े-बड़े रिपोर्टरों, एंकरों को पड़ोसी देश (भाषा, समाज आदि) के बारे में बहुत कम जानकारी है। इन्होंने मन में एक छवि बना रखी है कि हमारा पड़ोसी कुछ ऐसा होगा। फिर उनका पूरा विश्लेषण उसी के इर्द-गिर्द घूमता है।

‘मिशन मजनू’ के ट्रेलर में ‘जासूस’ सिद्धार्थ मल्होत्रा को जिस हुलिए में पेश किया गया है, उसे देखकर तो पाक में पांचवीं कक्षा का बच्चा भी पहचान लेगा। आम पाकिस्तानी का पहनावा, उसके बोलने का ढंग इससे बिल्कुल अलग होता है।

पहले मुझे जासूसी कहानियां पढ़ना बहुत पसंद था। उनमें किसी जासूस को लंबा काला कोट, काले जूते, काला हैट, काला चश्मा और हाथ में सिगार लिए दिखाया जाता था। उसके पास एक मैग्नीफाइंग ग्लास भी होता था। उसे देखकर मैं सोचता था, ‘यह कैसा जासूस है? इसे तो कोई भी पहचान लेगा!’ मेरे विचार में जासूस तो ऐसा होना चाहिए, जो आम लोगों में घुलमिल जाए।

चूंकि मेरी दिलचस्पी हिंदी और उर्दू के शब्दों में ज़्यादा है तो मैं भारतीय और पाकिस्तानी ख़बरिया चैनलों के शब्दों पर बहुत ध्यान देता हूं।

प्राय: भारतीय रिपोर्टरों, एंकरों का उन शब्दों का उच्चारण बिल्कुल ग़लत होता है, जिनमें नुक़्ता लगा हो। उदाहरण के लिए – ये ‘ज़िंदाबाद’ को ‘जिंदाबाद’, ‘ग़ज़ब’ को ‘गजब’, ‘ग़ज़ल’ को ‘गजल’, ‘ग़ालिब’ को ‘गालिब’ बोलते हैं। कई तो ‘फिर’ का उच्चारण ‘फ़िर’ करते हैं। अगर इनमें से कोई पाकिस्तान चला जाए तो ट्रेन से उतरते ही धर लिया जाए!

अब बात करते हैं पाकिस्तानी रिपोर्टरों, एंकरों की। उनका हाल भी लगभग ऐसा ही है। वे ‘नरेंद्र मोदी’ को ‘नरेंदर मूदी’, ‘ऋषि सुनक’ को ‘रसी सनक’, ‘कुलभूषण’ को ‘कलबोसन’, ‘नकुल’ को ‘नकल’, ‘जिंदल’ को ‘जिंदाल’, ‘मंदिर’ को ‘मंदर’, ‘जाति’ को ‘ज़ात’ और ‘बाहर’ को ‘बाहिर’ बोलते हैं।

अगर उनका कोई रिपोर्टर जासूसी करने दिल्ली वाली ट्रेन में किसी महिला से पूछ बैठे, ‘बाजी, आपने कहां जाना है? इन दिनों मूदी साहब दिल्ली में होते हैं या बाहिर गए हैं’ – तो वह ‘बाजी’ ही उसे पुलिस के हवाले कर देगी!

.. राजीव शर्मा ..



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One comment on “अगर भारतीय/पाकिस्तानी रिपोर्टर जासूस बनकर जाए तो!”

  • Vimal Kothari says:

    सर, आप नुक़्ता लगे शब्दों की बात कर रहे हो, हमारे रिपोर्टर और एंकर तो छोटी-बड़ी ‘ई’ की मात्राओं व छोटे बड़े ‘उ’ को तो ऐसे नजरअंदाज करते हैं, जैसे एक्सप्रेस ट्रेन छोटे-छोटे स्टेशन पर नहीं रुकती।

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