नागेश्वर राव को “सरकार का प्रिय अधिकारी” बताने से बचने वाले अखबार

द टेलीग्राफ ने इस खबर को लीड बनाया है और शीर्षक में ही लिखा है कि मोदी सरकार के प्रिय अधिकारी को सजा हुई। दो संवाददाताओं की बाईलाइन है – सो अलग।

सीबीआई के पूर्व अंतरिम निदेशक नागेश्वर राव को सजा ऐतिहासिक है। सजा की दृष्टि से तो है ही। इस लिहाज से भी कि नागेश्वर राव सीबीआई के काम काज में सरकारी हस्तक्षेप के सबसे हाल के उदाहरणों में हैं और उन्हें सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद एक अधिकारी का तबादला करने के लिए सजा हुई है जबकि कार्यभार संभालते ही उन्होंने तबादले ही किए थे और ऐसा लगा था कि उन्हें तबादले करने के लिए ही पद दिया गया हो। कहने की जरूरत नहीं है कि वे सरकार के घोषित प्रिय अधिकारियों में रहे हैं। आपको याद होगा कि सीबीआई के दो आला अधिकारी जब आपस में लड़ रहे थे और नंबर दो रहे राकेश अस्थाना की गिरफ्तारी की स्थिति बनी तो सरकार ने आधी रात की कार्रवाई की और उस समय के प्रमुख को हटाकर नागेश्वर राव को अंतरिम प्रमुख बनाया गया था।

नागेश्वर राव ने जो पहला काम किया था वह थोक के भाव तबादला था और इसमें अधिकारियों को काले पानी की सजा भी दी गई थी। पूरी कार्रवाई और उसके बाद जो सब हुआ ऐतिहासिक रहा पर राकेश अस्थाना अभी तक बचे हुए हैं। इस बीच बिहार से महिला आश्रय के मामले की जांच कर रहे अधिकारी के तबादले पर सुप्रीम कोर्ट ने संज्ञान लिया और पूर्व प्रमुख को सजा हुई। यह मामला सीबीआई में सरकार की ओर से बनाई गई अराजक स्थिति से अलग नहीं है पर आज के किसी भी (टेलीग्राफ को छोड़कर) अखबार में इस खबर को उससे जोड़कर नहीं देखा गया है। अंग्रेजी अखबारों ने तो कम से कम अपने संवाददाता की खबर छापी है हिन्दी अखबारों में यह रूटीन खबरों की ही तरह है। आइए देखें।

दैनिक हिन्दुस्तान ने इस खबर को दो कॉलम में टॉप पर छापा है। शीर्षक लगाया है, “अभूतपूर्व : नागेश्वर राव ने कोर्ट के कोने में दिन भर बैठने की सजा काटी”। खबर के पहले पन्ने वाले हिस्से में नहीं लिखा है कि ये वही अधिकारी हैं जिन्हें सरकार ने आलोक वर्मा को आधी रात में हटाकर सीबीआई का अंतरिम प्रमुख बनाया था।

नवभारत टाइम्स ने इस खबर को पहले पन्ने पर दो कॉलम में छापा है। शीर्षक है, राव को माफी नहीं, जेल से बचे, दिन भर कोर्ट में बैठने की सजा। यहां भी पहले पन्ने पर खबर का जो हिस्सा है उसमें नहीं लिखा है कि राव सराकर के खास अधिकारी रहे हैं।

नवोदय टाइम्स में पहले पन्ने पर आधा विज्ञापन है और आधे में अखबार ने करोलबाग के होटल में आग की खबर छापी है। नागेश्वर राव की खबर तीसरे पन्ने पर दो कॉलम में टॉप पर है। शीर्षक है, राव अवमानना के दोषी, दिन भर कोर्ट में बैठने की सजा। दो उपशीर्षक हैं, कानूनी सलाहकार भासूराम भी दोषी, एक लाख जुर्माना और दूसरा, अदालत के उठने से पहले जाने की कोशिश पर पड़ी फटकार।

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कहने की जरूरत नहीं है कि अखबार ने शीर्षक में सीबीआई नहीं लिखा है और सिर्फ राव लिखने से लगता है कि अखबार यह मानकर चल रहा है कि उसके पाठक राव को जानते हैं। पेज तीन की यह खबर पेज चार पर जारी है। इस हिस्से में यह नहीं लिखा है कि राव सरकार के प्रिय अधिकारी रहे हैं और आधी रात की कार्रवाई में अंतरिम निदेशक बनाए गए थे।

राजस्थान पत्रिका में भी यह खबर टॉप दो कॉलम में है। फ्लैग शीर्षक है, “सुप्रीम कोर्ट : सीबीआई के पूर्व अंतरिम प्रमुख दोषी”। मुख्य शीर्षक है, “अवमानना : राव को कोर्ट के कोने में बैठने की सजा”। यहां भी नहीं बताया गया है कि नागेस्वर राव वही अधिकारी हैं जो आधी रात की कार्रवाई में सीबीआई के अंतरिम प्रमुख बनाए गए थे।

अमर उजाला ने इस खबर को तीन कॉलम में टॉप पर छापा है। शीर्षक है, “नागेश्वर राव अवमानना के दोषी, कोर्ट उठने तक कोने में बैठाया”। उपशीर्षक है, “सुप्रीम सजा : सीबीआई के पूर्व अंतरिम निदेशक पर एक लाख रुपए का जुर्माना भी।” अमर उजाला में भी नहीं लिखा है कि नागेश्वर राव सरकार के खास अधिकारी हैं और आलोक वर्मा को हटाकर इन्हें अंतरिम निदेशक बनाया गया था।

दैनिक जागरण ने इस खबर को पहले पन्ने पर चार कॉलम में छापा है। शीर्षक है, नागेश्वर राव ने काटी कोर्ट में दिन भर बैठने की सजा। ब्यूरो की इस खबर में लिखा है, भले ही यह सजा सांकेतिक तौर पर दी गई, लेकिन इससे 58 वर्षीय वरिष्ठ आईपीएस अफसर राव के बेदाग सर्विस रिकार्ड में एक दाग जुड़ जाएगा। अखबार ने अपनी खबर में सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर विचार तो दिए हैं पर यह नहीं बताया कि नागेश्वर राव सरकार के प्रिय अधिकारी रहे हैं।

हिन्दी अखबारों में इस खबर को सबसे कायदे से और विस्तार में दैनिक भास्कर ने छापा है और तीन कॉलम में पवन कुमार की बाईलाइन खबर दी है। इसमें लिखा है और यह किसी और हिन्दी अखबार में पहले पन्ने के अंश में तो नहीं है कि (नागेश्वर) राव की ओर से अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल पेश हुए। इसपर चीप जस्टिस ने कहा कि अवमानना के आरोपी का बचाव सरकार के पैसे से क्यों किया जा रहा है? वेणुगोपाल चुप रहे। राव भी सिर झुकाए खड़े रहे। हालांकि इस खबर में भी नहीं बताया गया है कि राव सरकार के प्रिय अधिकारी रहे हैं।

इसके मुकाबले कोलकाता के अंग्रेजी दैनिक द टेलीग्राफ ने इस खबर को लीड बनाया है। दो

संवाददाताओं – आर बालाजी और इमरान अहमद सिद्दीक को बाईलाइन दी है और शीर्षक में ही लिखा है कि मोदी सरकार के प्रिय अधिकारी को सजा हुई। द हिन्दू ने भी इसे लीड बनाया है और सोईबम रॉकी सिंह को बाईलाइन दी है। हिन्दुस्तान टाइम्स ने इस खबर पर भद्रा सिन्हा को बाईलाइन दी है। हालांकि, इसमें भी राव के सरकार का प्रिय पात्र होने की सूचना पहले पन्ने की खबर में नहीं है। टाइम्स ऑफ इंडिया ने इस खबर को लीड बनाया है और धनंजय महापात्र को बाईलाइन दी है। हालांकि, यहां भी नहीं बताया गया है कि राव सरकार के प्रिय अधिकारी रहे हैं। इंडियन एक्सप्रेस ने इस खबर को पहले पन्ने पर चार कॉलम में छापा है और अनंत कृष्णन जी को बाइलाइन दी है लेकिन पहले पन्ने पर नहीं बताया है कि राव वही अधिकारी है जिन्हें आधी रात को सीबीआई का अंतरिम प्रमुख बनाया गया था।


वरिष्ठ पत्रकार और अनुवादक संजय कुमार सिंह की रिपोर्ट। संपर्क : anuvaad@hotmail.com



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