घुमक्कड़ी : कोरापुट घूम आए युवा पत्रकार सक्षम द्विवेदी

पर्यटन हमारे देश के जन मानस में व्याप्त है। चाहे तीर्थ यात्रा हो, स्कूल टूर हो या फिर फक्कड़ी यात्रा…. भारत के लोगों को घूमना बेहद पसंद है… अब तो ट्रैकिंग, बंजी जम्पिंग, राफ्टिंग जैसी विधाओं ना सिर्फ एडवेंचर पर्यटन को बढ़ावा दिया बल्कि हर तरह के भ्रमण को और रोमांचकारी बना दिया।

मेरी नए-नए लोगों से मिलने और उनके अनुभवों को समझने की चाहत ने पर्यटन की ओर रूचि को बढ़ाया। मेरी रूचि हमेशा ऐसे स्थानों में जाने की रही जहाँ के बारे में ज्यादा लिखा नहीं गया हो, विशिष्ट हो और बहुत से वैविध्य को खुद में समेटे हो।

ऐसा ही पर्वत की गोद में बसा एक छोटा सा प्यारा सा स्थान है उड़ीसा के सर्वोच्च पर्वत शिखर देवमाली (देओमाली) के गोद में बसा कोरापुट। हरे-भरे घास के मैदान, जंगल, झरने, तंग घाटियां और इन सब से बढ़कर आदिवासियों की संस्कृति इस क्षेत्र से गुजरने वाले किसी भी शख्स को बरबस ही रुकने को मजबूर कर देती है। मैंने तो सुन रखा था कि ये उड़ीसा का एकमात्र ऐसा स्थान है जहाँ हिमपात भी हुआ, इसलिए मेरी उत्सुकता बढ़ती गयी ।

मैं यहाँ पर रायपुर से बस द्वारा गया। यहाँ पायल बस बेहद लोकप्रिय और सबसे प्रचलित माध्यम है, उसकी बुकिंग के लिए आपको पहले से सजग रहना होगा । वैसे यहाँ का निकटतम एयरपोर्ट लगभग 200 किलो मीटर दूर विशाखापत्तनम है और यह क्षेत्र रेलमार्ग द्वारा भुवनेश्वर, दिल्ली, चेन्नई और कोलकता आदि शहरों से भी जुड़ा है, लेकिन बस के द्वारा ही क्षेत्र सुंदर रास्तों, आदिवासी निवासों, ऊपर से गिरते झरनों और स्ट्रीट फ़ूड को करीब से महसूस किया जा सकता है।

मैं रायगढ़ से घूमते हुए पहाड़ी रास्तों और प्रकृति की सुंदर छटा को निहारते हुए आधी रात में कोरापुट पहुंचा। लगातार तेज़ बारिश ने मौसम में सर्दी बढ़ा दी थी। कांपते हाथों से चाय के प्याले की गर्मी लेते हुए जब मैं बस स्टैंड से आगे बढ़ा तो भगवान जगन्नाथ का भव्य मंदिर ठीक सामने था। मैंने मंदिर के धर्मशाला में रुकने की तय किया, जो यहाँ का सबसे लोकप्रिय विश्राम स्थल है। मंदिर धर्मशाला में तीन श्रेणियों की विश्राम व्यवस्था है। उसे लोग अपनी आवश्यकता व बजट के अनुसार चयनित करते हैं। विश्राम स्थल 200 रुपये प्रति रात्रि से २००० रुपये प्रति रात्रि तक के मूल्य पर उपलब्ध है ।

खान-पान में चावल की बहुलता मेरे जैसे रोटी खाने वाले उत्तर भारतीय के लिए एक समस्या का कारण थी। मेरी खोज नीलम होटल जाकर खत्म हुई जहाँ के मेन्यू कार्ड में मुझे दक्षिण भारतीय से लेकर चाइनीज़ व्यंजन तक नज़र आये। यहाँ के लोग लाल मिर्च और मसालेदार खाने के विशेष शौकीन हैं।

मैंने अगले दो दिनों में सवर श्री क्षेत्र में भगवान जगन्नाथ मंदिर के दर्शन व जनजाति संग्रहालय में आदिम संस्कृति से रूबरू हुआ। दुदुमा झरने से बनते इंद्रधनुष को निहारना एक अलग ही दुनिया में ले जाता है । गुप्तेशवर का गुफा मंदिर जहाँ स्थापत्य कला तो वहीं दुमुरीपुट व नंदपुर में ऊंचाइयों को छूती श्री राम, हनुमान व गणेश जी की विशाल प्रतिमाएं मूर्ति कला का उत्कृष्ट उदहारण प्रस्तुत करती हैं। प्राकृतिक सुंदरता से परिपूर्ण कोलाब बांध में नौकायन और पिकनिक का आनंद भी लिया जा सकता है। जेपोर का किला तत्कालीन शासकों की भव्यता का अनुभव कराता है ।

कोरापुट वैसे तो कभी भी जाया जा सकता है, परन्तु मौसम के लिहाज से वर्षा ऋतु में सावधानी आवश्यक है किसी भी मौसम में यहाँ यात्रा के दौरान एक रेनकोट और छाता साथ में लेना ना भूलें। साथ ही नक्सल प्रभावित क्षेत्र होने के कारण सुरक्षा के प्रति भी सचेत रहना आवश्यक है ।

तो देर किस बात की अबकी बैग पैक कीजिये और निकल जाइये कोरापुट के एक अनूठे सफर के लिए।

सक्षम द्विवेदी
मोबाइल- 7380662596
saksham_dwivedi@rediffmail.com

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