अरबपति संपादक संजय गुप्‍ता के पास नहीं हैं किराए के 77 हजार रुपए!

: दर्जनों पत्रकारों पर सरकारी आवास का बकाया : लखनऊ। सरकार और आम जनता के बीच सेतु सरीखा दायित्व निभाने वाला मीडिया आज खलनायक की भूमिका में है। यदि कुछ गिने-चुने पत्रकारों को अपवाद स्वरूप मानकर छोड़ दिया जाए तो ये हालत पूरे देश की मीडिया से जुडे़ पत्रकारों की है। खासतौर से यूपी की राजधानी लखनऊ के तथाकथित पत्रकारों की भूमिका सर्वाधिक संदेह के दायरे में है। जो ‘सिंगल कॉलम’ खबर लिखने का तरीका नहीं जानते वह यूपी सरकार के अधीन सूचना विभाग की सूची में श्रेष्ठ पत्रकारों की श्रेणी में आते हैं।

सरकारी विज्ञप्तियां छाप-छापकर अखबार की दुकान चलाने वाले राज्य सम्पत्ति विभाग की देखरेख वाली सरकारी कॉलोनियों में कुण्डली जमाकर बैठे हैं। इनमें से अधिकतर पत्रकार ऐसे हैं जिन्होंने वर्षों से सरकारी भवनों का किराया जमा नहीं किया है। हालांकि पत्रकारों के हितार्थ 21 मई 1985 को जारी अधिसूचना के पृष्ठ संख्या 3 के 9 नम्बर कॉलम में स्पष्ट अंकित है कि आवंटन की शर्तों एवं प्रतिबंधों के भंग होने पर राज्य सम्पत्ति विभाग के सम्बन्धित अधिकारी द्वारा बिना कोई कारण बताए आवास का आवंटन निरस्त कर दिया जायेगा। 10 नम्बर कॉलम में समस्त शर्तों व प्रतिबंधों का जिक्र करते हुए प्राविधानों को आवंटन की शर्तों एवं प्रतिबंधों को समाविष्ट करते हुए लागू करने की बात कही गयी है।

प्रतिबंधों एवं शर्तों में इस बात का खास उल्लेख किया गया है कि जो आवंटी समय से किराए का भुबतान नहीं करेगा उसका आवंटन बिना पूर्व सूचना के निरस्त कर दिया जायेगा। चौंकाने वाला पहलू यह है कि शासनादेश में सख्त निर्देशों के बावजूद राज्य सम्पत्ति विभाग लाखों रूपये बकायदार पत्रकारों के खिलाफ सख्त कदम नहीं उठा पा रहा है। सरकारी दायित्वों की पूर्ति दिखाने के नाम पर नोटिस तो भेजी जाती है, लेकिन दबाव बनाकर वसूली के नाम पर अधिकारी अपने हाथ पीछे खींच लेते हैं। इन्हीं में से एक तथाकथित पत्रकार ऐसे भी हैं जिन्होंने शासन-प्रशासन में गहरी पैठ का भरपूर फायदा उठाते हुए लगभग पांच लाख रूपए का चूना सरकारी खजाने को लगा दिया।

इन पर आरोप है कि इन्होंने अधिकारियों संग अपने सम्बन्धों के प्रभाव का इस्तेमाल करते हुए किराए के रूप में लगभग पांच लाख का किराया माफ करवा लिया जबकि नियमानुसार सरकारी धनराशि वसूली में छूट देने का अधिकार न तो किसी मंत्री को है और न ही किसी नौकरशाह को। इतना ही नहीं जब उक्त मकान के किराए को लेकर विवाद उत्पन्न हुआ तो उन्होंने अपने प्रभुत्व का इस्तेमाल करते हुए किराया अदा किए बगैर दूसरा अपग्रेडेड सरकारी आवास आवंटित करवा लिया।

सरकारी मकानों में अध्यासित बकायेदारों की सूची में फाईल कॉपी छापकर अपना धंधा चमकाने वालों से लेकर वे पत्रकार भी शामिल हैं जो लखनऊ के मीडिया ग्रुप में बडे़ पत्रकारों के रूप में पहचाने जाते हैं। इनमें से कुछ पत्रकारों ने संगठन बनाकर सरकार पर दबाव बना रखा है ताकि बकायेदारी मामले को लेकर दबाव से बचा जा सके। इन्हीं संगठनों से जुडे़ पत्रकारों का खबरों से सरोकार भले ही न हो अपितु सत्ता के गलियारों में मंत्री-मुख्यमंत्री सहित राज्यपाल से हाथ मिलाते जरूर दिख जाते हैं। इन संगठनों से जुडे़ तथाकथित पत्रकार किसी न किसी कार्यक्रम के बहाने नौकरशाहों और मंत्रिमण्डल के सदस्यों को अपने कार्यक्रमों में बुलाकर अक्सर अपने सम्बन्धों को उजागर करने की कोशिशों में लगे रहते हैं। सरकारी मकानों में बकायेदारों की सूची में इन संगठनों से जुडे़ पत्रकार भी शामिल हैं।

राजधानी लखनऊ से प्रकाशित एक दैनिक अखबार के संवाददाता मनमोहन को जून 2011 में गुलिस्तां कॉलोनी में सरकारी आवास संख्या 25 आवंटित किया गया था। राज्य सम्पत्ति निदेशालय, लखनऊ के रजिस्टर में बकायेदारों की सूची में इनका नाम भी शामिल है। इन पर छह हजार से अधिक किराया बकाया है जबकि इन्हें वेतन के रूप में अच्छी खासी धनराशि प्राप्त होती है। जब सम्बन्धित विभाग इनसे किराए की मांग करता है तो दूसरी ओर से किसी न किसी उच्चाधिकारी का फोन आ जाता है। इसी तरह से अनिरूद्ध सिंह भी बकायेदारों की सूची में शामिल हैं। अनिरूद्ध सिंह को जुलाई 2012 में गुलिस्तां कॉलोनी में मकान संख्या 64 आवंटित किया गया था। इन पर लगभग 18 हजार रूपया किराए के रूप में बकाया है।

राज्य सम्पत्ति निदेशालय की देख-रेख वाले मकान संख्या 71, गुलिस्तां कॉलोनी में राजीव त्रिपाठी रहते हैं। यह मकान उन्हें अक्टूबर 2005 में एक निर्धारित समय के लिए आवंटित किया गया था। इन पर 60 हजार से भी ज्यादा का किराया बकाया है। निर्धारित समय के लिए आवंटित मकान की समयावधि निकल जाने के कारण राज्य सम्पत्ति निदेशालय इनका निवास दिसम्बर 2012 से अनाधिकृत घोषित कर चुका है। निदेशालय की ओर से इन्हें कई नोटिसें भी पूर्व में जारी हो चुकी हैं लेकिन नौकरशाहों के बीच मधुर संबन्धों का लाभ इन्हें पिछले दो वर्षों से लगातार मिलता चला आ रहा है। यह दीगर बात है कि इससे सम्बन्धित विभाग को न सिर्फ आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है बल्कि जरूरतमंद लोगों का हक भी मारा जा रहा है।

विभाग के एक कर्मचारी की मानें तो एक उच्च पदस्थ अधिकारी के हस्तक्षेप के बाद विभाग चुप्पी साध कर बैठ गया है। पत्रकार अवनीश विद्यार्थी का मामला भी कुछ ऐसा ही है। प्राप्त जानकारी के मुताबिक श्री अवनीश को सरकारी आवास संख्या 78, गुलिस्तां कॉलोनी एक वर्ष के लिए अगस्त 2012 में आवंटित किया गया था। समयावधि बीत जाने के बाद विभाग ने इन्हें भी अधिकृत घोषित कर रखा है। इतना ही नहीं इन पर लगभग 27 हजार रूपया किराए के रूप में भी बकाया है। इन दबंग पत्रकार के खिलाफ विभाग कई नोटिसें जारी कर चुका है। इसके बावजूद न तो सरकारी आवास पर से इन्होंने कब्जा छोड़ा है और न ही बकाया किराया ही चुकाया है।

राजधानी लखनऊ ही नहीं बल्कि कई अन्य प्रदेशों और जनपदों से प्रकाशित एक प्रतिष्ठित समाचार पत्र के मालिक व कथित पत्रकार संजय गुप्ता भी राज्य सम्पत्ति निदेशालय के बकायेदारों की सूची शामिल हैं। अरबों की सम्पत्ति के मालिक श्री गुप्ता की नीयत भी मामूली सरकारी रकम को डकार जाने की है। इन्हें नवम्बर 2002 में बी-2, दिलकुशा की सरकारी कॉलोनी में एक पत्रकार की हैसियत से भवन आवंटित किया गया था। ये अखबार के लिए अपनी कलम से भले ही कोई खबर न लिखते हों लेकिन वरिष्ठ पत्रकारों की सूची में इनका नाम भी दर्ज है। उक्त मकान श्री गुप्ता को आवास के तौर पर एक निर्धारित समय के आवंटित किया गया था। राज्य सम्पत्ति विभाग ने इनका अध्यासन वर्ष 2013 से अनाधिकृत घोषित कर रखा है।

कई बार इन्हें मकान खाली करने की नोटिसें जारी की जा चुकी हैं लेकिन अपने प्रभाव के बलबूते वे सरकारी भवन खाली करने को तैयार नहीं। चूंकि इनके अखबार के स्टाफ में वरिष्ठ पत्रकारों की लम्बी-चौड़ी फौज है, लिहाजा विभाग पर दबाव बनाने के लिए वे अक्सर इन्हीं पत्रकारों का सहारा लिया करते हैं। प्राप्त दस्तावेजों के आधार पर इन पर किराए के रूप में 77 हजार रूपए से भी ज्यादा बकाया है। अरबों के मालिक संजय गुप्ता के लखनऊ सहित कई अन्य शहरों में भी विशालकाय कोठियां हैं, इसके बावजूद संजय गुप्ता का कब्जा दिलकुशा के सरकारी आवास संख्या बी-2 पर बना हुआ है। जानकार सूत्रों की मानें तो श्री गुप्ता ने इस सरकारी आवास को गेस्ट हाउस बना रखा है। बाहर से आने वाले मेहमानों को इसी सरकारी आवास पर ठहराया जाता है।

जहां तक श्री गुप्ता के निवास की बात है तो वे इस आवास में कभी-कभार ही देखे जाते हैं। आस-पास के मकानों में रहने वाले लोगों का भी यही कहना है कि श्री गुप्ता कभी-कभार ही यहां पर नजर आते हैं आमतौर पर इस आवास में उनके मेहमानों को ही आता-जाता देखा गया है। इसी लाईन में लगभग दस मकान छोड़कर सी-13 तथाकथित पत्रकार दयानन्द सिंह का सरकारी आवास है। इन्हें यह मकान लगभग एक दशक पूर्व मार्च 2004 में आवंटित किया गया था। इन पर लगभग पचास हजार रूपया किराए के रूप में बकाया है। दिलकुशा कॉलोनी के सी-23 नम्बर बंगले में कुलसुम तलहा का सरकारी आवास है। कुलसुम तलहा को वरिष्ठ पत्रकारों की सूची में गिना जाता है। लखनऊ प्रेस क्लब के मठाधीश पत्रकारों से लेकर दैनिक, साप्ताहिक समाचार पत्रों के संवाददाता कुलसुम तलहा से भली-भांति वाकिफ हैं लेकिन सरकारी आवास पर कुण्डली मारकर बैठने के साथ ही किराए के रूप में पन्द्रह हजार से भी ज्यादा का बकाया उनकी प्रतिष्ठा को चोट पहुंचा रहा है।

लखनऊ मीडिया फोटोग्राफर क्लब के स्वयंभू अध्यक्ष एस.एम. पारी राजनैतिक दल से जुडे़ एक नेता के हिन्दी दैनिक समाचार पत्र में प्रमुख छायाकार के रूप में कार्यरत हैं। श्री पारी को हुसैनगंज चौराहे के निकट सरकारी कॉलोनी ओसीआर में ए-404 नम्बर का आवास पूर्व मुख्यमंत्री मायावती के कार्यकाल में निर्धारित समय के लिए नवम्बर 2011 में आवंटित किया गया था। समयावधि बीत जाने के बाद इनका आवंटन रद कर दिया गया था। साथ ही अतिशीघ्र आवास खाली करने का नोटिस भी विभाग की ओर से जारी किया जा चुका है। राज्य सम्पत्ति निदेशालय के अनुसार श्री पारी वर्तमान में अनाधिकृत रूप से सरकारी आवास में डटे हुए हैं। इतना ही नहीं इन्होंने पिछले एक वर्ष से भी ज्यादा समय से सरकारी आवास का मामूली किराया तक जमा नहीं किया है। राज्य सम्पत्ति विभाग अपने लगभग 22 हजार रूपए किराए की वसूली के लिए कई बार नोटिस भेज चुका है लेकिन न तो किराया ही जमा किया गया और न ही सरकारी आवास से कब्जा ही छोड़ा गया।

राज्य सम्पत्ति निदेशालय की देख-रेख वाले ओसीआर कॉलोनी के मकान संख्या ए-905 पर बसंत श्रीवास्तव नाम के एक पत्रकार का वर्षों से कब्जा बना हुआ है। यह मकान उन्हें सितम्बर 1996 में आवंटित किया गया था। विभागीय सूत्रों के मुताबिक कुछ समय तो इन्होंने नियमित तौर पर किराया जमा किया लेकिन पिछले कई वर्षों से इन्होंने किराया जमा करना बन्द कर दिया। इन पर एक लाख, बीस हजार, आठ सौ छांछठ रूपया किराए के रूप में बकाया है। विभाग इन्हे कई बार नोटिस जारी कर चुका है लेकिन न तो किराया आया और न ही मकान से कब्जा ही छोड़ा गया। इसी कॉलोनी में बी-207 में वरिष्ठ पत्रकार ताविसी श्रीवास्तव का सरकारी आवास है। इन्होंने भी वर्षों से किराया जमा नहीं किया है। इन पर लगभग 12 हजार रूपया किराए के रूप में बकाया है।

बी-505,ओ.सी.आर. कॉलोनी में अशोक मिश्रा का निवास है। यह मकान इन्हें जनवरी 2006 में आवंटित किया गया था। इन पर सर्वाधिक लगभग एक लाख इकहत्तर हजार रूपया बकाया है। बताया जाता है कि इस सम्बन्ध में अशोक मिश्रा ने एक पत्र विभाग को लिखा है। उसमे कहा गया है कि जो किराया उन पर दर्शाया जा रहा है वह उससे पहले रहने वाले किसी व्यक्ति का है। जानकार सूत्रों के मुताबिक लिहाजा पिछला किराया काटकर उनकी समयावधि का बकाया किराया वसूली का पत्र भी उन्हें भेजा गया, लेकिन श्री मिश्र ने वह किराया भी जमा नहीं किया। इसी बिल्डिंग के बी-804 में कैसर जहां को मकान आवंटित किया गया है। सुश्री कैसर पर भी लगभग 14 हजार रूपया किराए के रूप में बकाया है। यह मकान उन्हें पिछले मुलायम सरकार के कार्यकाल में कद्दावर मंत्री आजम खां की कृपा दृष्टि से प्राप्त हुआ था। सुश्री कैसर जहां के आजम खां से मधुर सम्बन्ध हैं। आजम खां कई-एक अवसरों पर इनके घर भी जा चुके हैं। आरोप है कि आजम खां से मधुर सम्बन्धों की बदौलत इन्होंने भी सरकारी आवास का किराया जमा नहीं किया। विभाग किराया जमा करवाने के लिए कई नोटिसें भेज चुका है लेकिन कैसर ने न तो किराया जमा किया और न ही सरकारी आवास से अपना मोह त्यागा।

डायमंड डेरी कॉलोनी, लखनऊ के सरकारी आवास संख्या ई.डी.-31 में तथाकथित पत्रकार अशोक राजपूत का निवास है। यह मकान इन्हें दिसम्बर 2004 में आवंटित किया गया था। तब से लेकर अब तक इन पर लगभग 35 हजार रूपया किराए के रूप में बकाया है। लॉप्लास की सरकारी कॉलोनी के आवास संख्या 105 में पत्रकार आलोक अवस्थी का अनाधिकृत कब्जा बना हुआ है। विभाग इन्हें दिसम्बर 2012 से अनाधिकृत रूप से कब्जेदार मान चुका है। यह मकान उन्हें दिसम्बर 1994 में आवंटित किया गया था। तब से लेकर अब तक इनके ऊपर 1 लाख 40 हजार रूपया किराए के रूप में बकाया है। किराया वसूली के लिए विभाग इन्हें कई नोटिसें भेज चुका है लेकिन श्री अवस्थी ने अभी तक किराया जमा नहीं किया है।

आवास संख्या 404 के निवासी विपिन कुमार चौबे अगस्त 2012 से इस मकान में रह रहे हैं। इन पर किराए के रूप में 66 हजार से भी ज्यादा का बकाया दर्शाया गया है। 405 में अखिलेश सिंह का निवास है। इन पर लगभग 23 हजार रूपया किराए के रूप में बकाया है। यह मकान इन्हें अप्रैल 2004 में आवंटित किया गया था। मकान संख्या 504 किशोर निगम को सितम्बर 1992 में आवंटित किया गया था। इन पर लगभग साढे़ चार हजार रूपया किराए के रूप में बकाया है। 506 में प्रीतम श्रीवास्तव को सरकारी आवास मुहैया कराया गया है। यह मकान उन्हें अप्रैल 2013 में आवंटित किया गया था। तब से लेकर अब उन्होंने किराया ही जमा नहीं किया। इन पर लगभग पांच हजार रूपया किराए के रूप में बकाया है।

कई अखबारों में संपादन कार्य कर चुके पंकज ओहरी ने मकान संख्या 702 आवंटित करवा रखा है। यह मकान उन्हें मई 2005 में आवंटित किया गया था। श्री ओहरी फिलवक्त किसी अखबार में हैं ? क्या कर रहे हैं ? कोई नहीं जानता। इसके बावजूद मकान पर उनका कब्जा बना हुआ है। श्री ओहरी पर किराए के रूप में लगभग छह हजार रूपया बकाया है। मकान संख्या 704 संजय श्रीवास्तव को अक्टूबर 2005 में आवंटित किया गया था। इन पर लगभग छह हजार रूपया किराए के रूप में बकाया है। विभाग इन्हें भी कई नोटिसें भेज चुका है लेकिन समाचार लिखे जाने तक इन्होंने किराया जमा नहीं किया था। मकान संख्या 803 में कथित पत्रकार अशोक पाण्डेय रहते हैं। यह मकान इन्हें जनवरी 2005 में बतौर मान्यता प्राप्त पत्रकार के रूप में आवंटित किया गया था। वर्तमान में अशोक पाण्डेय किस समाचार-पत्र अथवा चैनल से जुडे़ हैं? विभाग के पास जानकारी नहीं है इसके बावजूद सरकारी आवास पर इनका कब्जा बना हुआ है। इन पर भी किराए के रूप में 20 हजार से भी ज्यादा का बकाया है। विभागीय अधिकारियों और कर्मचारियों व्यक्तिगत तौर पर सम्पर्क कर इन्हें नोटिस जारी कर रखा है। इसके बावजूद श्री पाण्डेय ने न तो किराया जमा किया है और न ही सरकारी आवास से कब्जा ही छोड़ा है।

मकान संख्या 901 लॉप्लास कॉलोनी में निवास दर्शाने वाले मोहसिन हैदर रिजवी को यह मकान लगभग दो वर्ष पूर्व जुलाई 2012 में आवंटित किया गया था। इन पर 15 हजार से भी ज्यादा का किराया बकाया है। मकान संख्या 1004 में निवास दर्शाने वाले अभिषेक बाजपेयी को दिसम्बर 2012 में लॉप्लास का सरकारी आवास आवंटित किया गया था। समाचार लिखे जाने के समय तक अभिषेक पर 68 हजार 333 रूपया किराए के रूप में बकाया था। बडे़ बकायेदारों के रूप में चिन्हित श्री बाजपेयी को विभाग कई बार नोटिस भेज चुका है। मकान संख्या 1106 लॉप्लास कॉलोनी में विजय सिंह रहते हैं। यह मकान उन्हें 9 वर्ष पूर्व दिसम्बर 2005 में आवंटित किया गया था। इन पर भी किराए के रूप में दस हजार से भी ज्यादा का बकाया है। इसी कॉलोनी में 1201 नम्बर का मकान कथित पत्रकार एरिक सिरिल थामसन के नाम से जून 2006 में आवंटित किया गया था। इन पर किराए के रूप में लगभग छह हजार रूपया बकाया है।

वरिष्ठ पत्रकारों की श्रेणी में गिने जाने वाले राजबहादुर सिंह भी इसी सरकारी कॉलोनी के मकान संख्या 1202 में रहते हैं। मीडिया घराने से वेतन के रूप में मोटी रकम हासिल करने के बावजूद राज्य सम्पत्ति विभाग की देख-रेख वाले सरकारी मकान का मामूली किराया चुकाने में आनाकानी करते हैं। प्राप्त दस्तावेज के आधार पर इन पर लगभग सात हजार रूपया किराए के रूप में बकाया है। 1203 निवासी दीपचन्द्र सर्वश्रेष्ठ बकायेदारों की सूची में शामिल हैं। इन पर 1 लाख 12 हजार से भी ज्यादा का बकाया है। दीप चन्द्र को लॉप्लास कॉलोनी का मकान जनवरी 2006 में आवंटित किया गया था। बडे़ बकायेदारों की सूची में शामिल दीप चन्द्र को विभाग की ओर से कई बार नोटिस जारी की जा चुकी है। राज्य सम्पत्ति विभाग के एक अधिकारी का कहना है कि दीप चन्द्र पर बकाया धनराशि उनके निवासकाल से पहले का भी है। विशेष यह है कि पुराना बकाया क्लियर न होने के कारण दीप चन्द्र अपने निवासकाल का किराया भी नहीं चुका रहे हैं।

डायमण्ड डेरी कॉलोनी के मकान संख्या ई.डी.-33 का सरकारी मकान कथित पत्रकार रामकल्प उपाध्याय को जून 1987 में एक निर्धारित समय के लिए आवंटित किया गया था। रामकल्प उपाध्याय किसी अखबार अथवा समाचार चैनल से सम्बन्ध रखते हैं ? इस बात की जानकारी न तो मकान का आवंटन करने वाले राज्य सम्पत्ति निदेशालय को है और न ही यूपी के पत्रकारों का लेखा-जोखा रखने वाले सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग को। इसके बावजूद इनके नाम पर मकान पर कब्जा बना हुआ है। सम्बन्धित विभाग इन्हें अनाधिकृत रूप से कब्जेदार भी घोषित कर चुका है। इतना ही नहीं इन पर लगभग डेढ़ लाख रूपया किराये के रूप मे बकाया है। विभागीय नोटिसें इनके लिए कोई मायने नहीं रखतीं।

डालीबाग कॉलोनी के मकान संख्या 1/5 में वरिष्ठ ज्ञानेन्द्र शुक्ला का निवास है। ये अपने जूनियर पत्रकारों को नैतिकता का पाठ तो पढ़ाते हैं लेकिन खुद राज्य सम्पत्ति विभाग की काली सूची में दर्ज हैं। राज्य सम्पत्ति निदेशालय के अनुसार ये उक्त मकान में अनाधिकृत रूप से कब्जा जमाए हुए हैं। यह मकान उन्हें पिछले वर्ष अगस्त में आवंटित किया गया था। इन पर किराए के रूप में 14 हजार से भी ज्यादा का बकाया है। इसी कॉलोनी के 1/7 में एक हिन्दी दैनिक समाचार पत्र के करोड़पति कथित पत्रकार के.के. श्रीवास्तव रहते हैं। यह मकान उन्हें राज्य सम्पत्ति विभाग ने मार्च 2006 में आवंटित किया था। विभाग इन्हें भी अपनी सूची में अनाधिकृत निवास घोषित कर चुका है इसके बावजूद ये अपनी मान-मर्यादा को ताक पर रखकर सरकारी आवास पर कब्जा जमाए हुए हैं। इन पर भी किराए के रूप में 13 हजार से भी ज्यादा का बकाया है।

गौरतलब है कि नियमानुसार निर्धारित वेतन से उपर वेतन पाने वालों को विभाग सरकारी आवास आवंटन नहीं करता है। के.के. श्रीवास्तव स्वयं अपने स्टॉफ को लाखों रूपया वेतन के रूप में प्रतिमाह वितरित करते हैं। इसके बावजूद विभाग ने इन्हें पहले तो सरकारी आवास आवंटन कर दिया, उसके बाद इन्हें अपनी सूची में अनाधिकृत रूप से कब्जेदार भी घोषित कर रखा है। विभागीय अधिकारियों की मानें तो इन्हें कई बार विभाग की ओर से नोटिस जारी की जा चुकी है इसके बावजूद वे सरकारी आवास से कब्जा छोड़ने को तैयार नहीं। एनेक्सी मीडिया सेन्टर मे हरफनमौला पत्रकार के रूप मे पहचान रखने वाले अनिल त्रिपाठी को भी इसी कॉलोनी में मकान संख्या 2/7 आवंटित किया गया है। यह मकान उन्हें वर्तमान अखिलेश सरकार के कार्यकाल दिसम्बर 2012 में आवंटित किया गया था। विभागीय कर्मचारियों का कहना है कि एक-दो महीने तो उन्होंने समय पर किराया जमा किया लेकिन बाद में किराया जमा करना बंद कर दिया। लगभग 11 हजार रूपया किराए के रूप मे इन पर बकाया है। इन्हें भी विभाग नोटिस जारी कर चुका है लेकिन इन्होंने सरकारी आवास का मामूली किराया जमा करने की कोशिश नहीं की।

4/14 निवासी जोरैर अहमद आजमी को यह सरकारी आवास दिसम्बर 2006 में मुलायम सरकार के कार्यकाल में मोहम्मद आजम खां की कृपा दृष्टि से आवंटित किया गया था। इन पर किराए के रूप 41 हजार से भी ज्यादा का बकाया है। विभाग बार-बार नोटिस भेजता है तो ये आजम खां के स्टॉफ से सिफारिश करवा देते हैं। परिणामस्वरूप न तो मकान खाली हो रहा है और न ही विभाग इनसे किराया ही वसूल कर पा रहा है। 5/2 निवासी राजेन्द्र प्रताप सिंह अनाधिकृत रूप से सरकारी आवास पर कब्जा जमाए हुए हैं। यह मकान उन्हें मार्च 2002 में आवंटित किया गया था। इन पर किराए के रूप लगभग 50 हजार रूपया बकाया है। श्री सिंह फिलवक्त किसी मीडिया घराने के साथ जुडे़ हुए हैं? यह जानकारी भी सम्बन्धित विभाग के पास नहीं है।

6/8, डालीबाग कॉलोनी निवासी दिनेश शर्मा पर किराए के रूप 19 हजार से भी ज्यादा का बकाया है। ये मकान उन्हें नवम्बर 1989 मे राज्य सम्पत्ति विभाग की ओर आवंटित किया गया था। वरिष्ठ पत्रकारों की श्रेणी में गिने जाने वाले रतनमणि लाल को मार्च 1999 में 7/3, डालीबाग कॉलोनी में सरकारी आवास आवंटित किया गया था। इनका पत्रकारिता के क्षेत्र से कोई जुड़ाव नहीं रह गया है। ये एनजीओ संचालित करते हैं। चूंकि इन्हें न्यूनतम दर और समस्त सुख-सुविधाओं वाला सरकारी आवास अपने पास बनाए रखना है लिहाजा ये कभी-कभार किसी अखबार अथवा पत्रिका में लेख लिखकर अपना हित साधते आ रहे हैं। राज्य सम्पत्ति निदेशालय को भी इस बात की जानकारी है। इसी वजह से विभाग ने इन्हें अनाधिकृत रूप से निवासित घोषित कर इन्हे नोटिस जारी कर रखा है। इन पर 3 हजार से ज्यादा का किराया भी बकाया है। नियमानुसार समयावधि समाप्त हो जाने अथवा अनाधिकृत रूप से निवास के दौरान इनसे डीएम सर्किल रेट पर किराया वसूल किया जाना चाहिए लेकिन विभाग इनसे नियमित वास्तविक किराया तक वसूल नहीं कर पा रहा है।

15 हजार से भी ज्यादा किराए के बकाएदार राजीव श्रीवास्तव भी इसी कॉलोनी के मकान संख्या 7/13 में निवास दर्शाते हैं। यह मकान उन्हें मई 2013 में आवंटित किया गया था। विभाग ने किराए की वसूली के लिए इन्हें नोटिस भी जारी कर रखा है इसके बावजूद इन्होंने किराया जमा नहीं किया। विभागीय अधिकारियों की मानें तो इनका सम्बन्ध अब पत्रकारिता क्षेत्र से नहीं रह गया है। इसी वजह से विभाग ने इन्हें अनाधिकृत घोषित कर रखा है। 8/15 के सरकारी आवास में मनीष चन्द्र पाण्डेय का कब्जा है। यह मकान उन्हें जुलाई 2006 में आवंटित किया गया था। वर्तमान में इन पर किराए के रूप में 10 हजार से भी ज्यादा का बकाया है। 9/5 निवासी के.सी. बिश्नोई के उपर लगभग 8 हजार रूपया किराए के रूप में बकाया है। यह मकान उन्हें अप्रैल 1999 में आवंटित किया गया था। फिलवक्त श्री बिश्नोई किस मीडिया संस्था से जुडे़ हैं ? इसकी जानकारी विभाग को नहीं है।

सर्वाधिक बकाएदारों की सूची में सुधा साक्षी का नाम सबसे उपर है। इन पर 2 लाख 78 हजार रूपए से भी ज्यादा का बकाया है। विभाग इन्हें अनाधिकृत निवासी भी मान चुका है इसके बावजूद सरकारी आवास पर इनका कब्जा बना हुआ है। सुधा साक्षी के नाम से यह मकान जुलाई 2006 में आवंटित किया गया था। सम्बन्धित विभाग की काली सूची में ये टॉप पर जरूर हैं लेकिन विभाग इनसे न तो मकान खाली करवा पा रहा है और न ही किराए की भारी-भरकम रकम ही वसूल कर पा रहा है। बताया जाता है कि सुधा साक्षी भारत छोड़कर भी जा चुकी हैं इसके बावजूद विभाग कब्जा वापस लेने की कार्रवाई संचालित नहीं कर पा रहा है। 10/7 निवासी अनिल यादव को भी विभाग ने अनाधिकृत घोषित कर रखा है। इसके बावजूद विभाग इनसे सरकारी आवास खाली नहीं करवा पा रहा है। इन पर किराए के रूप में 22 हजार से भी ज्यादा का बकाया है। यह मकान उन्हें जुलाई 2006 में आवंटित किया गया था।

11/6 का सरकारी आवास रीता प्रभु के नाम से आवंटित है। यह मकान उन्हें मार्च 1989 में आवंटित किया गया था। बताया जाता है कि श्री प्रभु यहां रहते ही नहीं है इसके बावजूद सरकारी आवास पर इनका कब्जा बना हुआ है। हालांकि विभाग इन्हें अनाधिकृत घोषित कर चुका है इसके बावजूद मकान खाली करवाने की कानूनी प्रक्रिया नहीं अपनायी जा रही है। इन पर किराए के रूप  में 20 हजार से भी ज्यादा का बकाया है। 12/2 निवासी चन्द्र किशोर शर्मा भी अनाधिकृत रूप कब्जा जमाए हुए हैं। बताया जाता है कि श्री शर्मा भी लखनऊ से बाहर रहते हैं। यह मकान उन्हें अक्टूबर 2011 में आवंटित किया गया था। इन पर भी किराए के रूप में 20 हजार से भी ज्यादा का बकाया है।

 जे-1/4 का सरकारी आवास कथित पत्रकार अब्बास हैदर के नाम से आवंटित है। यह मकान पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव के कार्यकाल में आजम खां की कृपा से अक्टूबर 2006 में आवंटित हुआ था। इन पर 1 लाख 53 हजार से भी ज्यादा का बकाया है लेकिन सत्ताधारियों से सम्बन्धों के चलते विभाग इनसे किराए की रकम वसूल नहीं कर पा रहा है। यह दीगर बात है कि विभाग ने इन्हें अनाधिकृत रूप से निवासित घोषित कर रखा है लेकिन सरकारी मकान खाली नहीं करवा पा रहा है। पार्क रोड की सरकारी कॉलोनी का मकान संख्या ए-3 सुश्री नागला किदवई को सितम्बर 2008 में आवंटित किया गया था। बताया जाता है कि सुश्री किदवई अब इस मकान में रहती भी नहीं हैं इसके बावजूद मकान पर उनका कब्जा बना हुआ है। हालांकि विभाग ने इन्हें भी अनाधिकृत घोषित कर अपना पल्ला झाड़ लिया है लेकिन सरकारी आवास खाली करवाने में वह कोई रूचि नहीं दिखा रहा। इन पर भी किराए के तौर पर 31 हजार से भी ज्यादा का बकाया है।

पार्क रोड कॉलोनी के ए-12 जय प्रकाश त्यागी के कब्जे में है। यह सरकारी आवास उन्हें सितम्बर 2008 में आवंटित किया गया था। राज्य सम्पत्ति निदेशालय ने इन्हें अब अनाधिकृत रूप से निवासित करार दे रखा है, लेकिन मकान खाली करवाने की हिम्मत वह नहीं जुटा पा रहा। इन पर किराए के रूप में 19 हजार से भी ज्यादा बकाया है। एक हिन्दी दैनिक समाचार पत्र के वरिष्ठ पत्रकार उमाशंकर त्रिपाठी को मार्च 2005 में पार्क रोड कॉलोनी का आवास संख्या बी-4 आवंटित किया गया था। इन पर 8 हजार से ज्यादा का किराया बकाया है। वरिष्ठ पत्रकारों की श्रेणी में गिने जाने वाले श्री त्रिपाठी को उनके संस्थान से वेतन के रूप में मोटी रकम मिलती है, इसके बावजूद वे सरकारी आवास का मामूली किराया चुकाने में ईमानदारी नहीं बरत रहे।

श्री त्रिपाठी को वरिष्ठ होने के नाते पत्रकारिता से जुडे़ लोग ‘दद्दू’ नाम से भी जानते हैं। दद्दू को अपने जूनियर पत्रकारों को नैतिकता का पाठ पढ़ाते हुए अक्सर देखा जाता है लेकिन स्वयं नैतिकता से इनका दूर-दूर का रिश्ता नहीं। बताया जाता है कि किराया वसूली के लिए विभाग ने इन्हें नोटिस भेजा है लेकिन पत्रकारों को नैतिक शिक्षा का पाठ पढ़ाने वाले श्री त्रिपाठी ने समस्त नियमों को धता बताते हुए समाचार लिखे जाने तक उपरोक्त किराया जमा नहीं किया था।

पार्क रोड स्थित सरकारी आवास संख्या सी-3 में कुमुदेश चन्द्र का कब्जा है। कुमुदेश को यह मकान मई 2007 में आवंटित किया गया था। इन पर किराए के रूप में 32 हजार से भी ज्यादा का बकाया है। इतना ही नहीं सम्बन्धित विभाग ने इन्हें अनाधिकृत तौर पर निवासित भी घोषित कर रखा है। इसके बावजूद विभाग न तो इनसे किराया वसूल कर पा रहा है और न ही सरकारी आवास ही खाली करवा पा रहा है। फिलवक्त कुमुदेश कहां काम करते हैं ? इसकी जानकारी भी विभाग के पास नहीं है। सी-6 पार्क रोड कॉलोनी के सरकारी आवास में कथित पत्रकार अविनाश चन्द्र मिश्रा का अनाधिकृत कब्जा बना हुआ है। राज्य सम्पत्ति निदेशालय ने इन्हें आवास खाली करने का नोटिस भी भेज रखा है, इसके बावजूद श्री मिश्रा ने सरकारी आवास से मोह नहीं त्यागा है। श्री मिश्रा पर किराए के रूप में 27 हजार से भी ज्यादा का बकाया है।

मई 1999 में कथित पत्रकार मनोज कुमार श्रीवास्तव को इन्दिरा नगर स्थित सरकारी कॉलोनी का मकान संख्या बी-62 आवंटित किया गया था। मनोज कुमार श्रीवास्तव फिलवक्त किस मीडिया के साथ जुडे़ हुए हैं? इसकी जानकारी राज्य सम्पत्ति विभाग को भी नहीं है। बताया जाता है कि श्री मनोज का तबादला हो चुका है इसके बावजूद लखनऊ स्थित सरकारी आवास उन्होंने नहीं छोड़ा है। इन पर 8 हजार से भी ज्यादा का किराया बकाया है। बी-123 इन्दिरा नगर का सरकारी आवास नागेन्द्र प्रताप को सितम्बर 2002 में आवंटित किया गया था। राज्य सम्पत्ति विभाग ने इनका अध्यासन अनाधिकृत घोषित कर रखा है, इसके बावजूद इन्होंने न तो सरकारी आवास का मोह त्यागा है और न ही बकाये किराए की रकम लगभग 37 हजार जमा की है। विभाग कई नोटिसें भेजने का दावा कर रहा है जबकि सूत्रों का कहना है कि विभागीय अधिकारियों पर उच्चाधिकारियों के दबाव के चलते अनाधिकृत होने के बावजूद इनसे सरकारी आवास खाली नहीं कराया जा रहा है।

इन्दिरा नगर की सरकारी कॉलोनी का आवास संख्या बी-141 एक हिन्दी दैनिक समाचार-पत्र के वरिष्ठ पत्रकार दिनेश पाठक को दिसम्बर 2000 में आवंटित किया गया था। श्री पाठक का तबादला काफी पहले हो चुका था। विभाग ने इसी आधार पर इनके कब्जे को अनाधिकृत घोषित कर रखा है, इसके बावजूद श्री पाठक ने कब्जा नहीं छोड़ा है। बताया जाता है कि श्री पाठक के भाई आईपीएस अधिकारी हैं। इन्हीं सम्बन्धों के चलते इन्होंने उच्च स्तर तक दबाव बना रखा है। विभागीय अधिकारी भी मानते हैं कि उच्च स्तरीय दबाव के चलते इनसे मकान खाली नहीं कराया जा सका है। हालांकि अनाधिकृत कब्जा घोषित किए जाने के बाद भी ये प्रत्येक माह नियमित रूप से सरकारी आवास का मामूली किराया जमा करते आ रहे हैं, जबकि नियमानुसार समयावधि समाप्त होने अथवा अनाधिकृत रूप से निवास करने के दौरान डीएम सर्किल रेट से सरकारी आवास का किराया वसूले जाने का प्राविधान है। बताया जाता है कि ये कभी-कभार ही लखनऊ आते हैं। बी-173 में रहने वाले वीरेन्द्र प्रताप सिंह को मार्च 1999 में सरकारी आवास आवंटित किया गया था। इन पर किराए के रूप में 6 हजार से भी ज्यादा का बकाया है। न तो ये किराया जमा कर रहे हैं और न ही सरकारी आवास से मोह त्याग कर पा रहे हैं। सम्बन्धित विभाग भी मूक दर्शक बना हुआ है।

सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 के तहत मिली सूचना के आधार पर बटलर पैलेस के भवन संख्या बी-7 में कथित पत्रकार हेमन्त तिवारी रहते हैं। इनका लेखन से भले ही ज्यादा लगाव न हो लेकिन पत्रकारों के बीच श्रेष्ठ बनने की चाहत इनमें बनी रहती है। ये राज्य मुख्यालय से मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति के अध्यक्ष भी हैं। बताया जाता है कि प्रदेश के कई नौकरशाहों से इनके मधुर सम्बन्ध हैं। उसी का फायदा इन्हें यदा-कदा मिला करता है। अधिकारियों से सम्बन्धों के कारण ही लखनऊ के ज्यादातर पत्रकार इन्हें वरिष्ठ पत्रकार की श्रेणी में रखते हैं। यह दीगर बात है कि समाचार लेखन में इनकी कोई खास रूचि नहीं है। इसके बावजूद ये राज्य मुख्यालय से स्वतंत्र पत्रकार के रूप में मान्यता प्राप्त पत्रकार हैं। इन्हें राज्य सूचना विभाग ने किस आधार पर मुख्यालय की मान्यता दे रखी है ? यह जांच का विषय हो सकता है।

श्री तिवारी के विरोधी पत्रकारों का कहना है कि यदि नौकरशाहों का वरदहस्त इन पर से हट जाए और निष्पक्ष जांच करायी जाए तो इनकी मान्यता संकट में आ सकती है। श्री तिवारी को बटलर पैलेस का सरकारी भवन अगस्त 2008 में आवंटित किया गया था। श्री तिवारी पर किराए के रूप में 23 हजार से भी ज्यादा का बकाया है। उच्चाधिकारियों से मधुर सम्बन्धों के चलते विभागीय अधिकारी इन्हें नोटिस भेजने तक से कतराते हैं। बताया जाता है कि श्री तिवारी एनेक्सी मीडिया सेंटर में अक्सर पत्रकारों के बीच शान से कहते हैं, ‘‘किसी…..की हिम्मत नहीं है जो हमें नोटिस भेजे’’।

बटलर पैलेस के सी-16 में अध्यासित संगीता बकाया पर 14 हजार से भी ज्यादा का किराया बकाया है। विभाग इन्हें नोटिस भेजे जाने की बात करता है। जानकारी के मुताबिक सुश्री संगीता बकाया ने न तो किराया जमा किया है और न ही मकान से कब्जा छोड़ा है। सुश्री बकाया को यह सरकारी आवास मार्च 2000 में आवंटित किया गया था। इसी कॉलोनी के सी-22 में सुरेश कृष्ण यादव को अध्यासित दिखाया गया है। श्री यादव को उक्त सरकारी आवास मई 2004 में आवंटित किया गया था। इन पर 37 हजार से ज्यादा किराया बकाया है। विभाग इन्हें भी नोटिस जारी करने की बात कर रहा है लेकिन आवास खाली करवाए जाने के बाबत वह चुप्पी साधने में ही भलाई समझता है। जाहिर है विभाग के उच्चाधिकारियों का दबाव जो कर्मचारियों पर बना हुआ है।

वीआईपी कॉलोनी समझी जाने वाली बटलर पैलेस का आवास संख्या सी-30 श्रीमती प्रतिभा सिंह को सितम्बर 2006 में दो वर्षों के लिए आवंटित किया गया था। सितम्बर 2008 में इन्हें अनाधिकृत भी घोषित किया जा चुका है, इसके बावजूद विभाग इनसे सरकारी आवास खाली नहीं करवा पा रहा है। संयुक्त निदेशक और जनसूचनाधिकारी सुधा वर्मा की ओर से जो सूचना उपलब्ध करायी गयी है उसके अनुसान इन पर 3 लाख 55 हजार से भी ज्यादा का बकाया किराया दर्शाया गया है। जानकार सूत्रों की मानें तो विभाग इन्हें भी किराया वसूली के साथ ही आवास खाली करने की नोटिसें कई बार भेज चुका है, लेकिन श्रीमती सिंह ने न तो सरकारी आवास से मोह त्यागा है और न ही लाखों का किराया ही जमा किया है।

बटलर पैलेसे कॉलोनी आवास संख्या 3/7, अंशुमान शुक्ला के नाम से आवंटित है। श्री शुक्ला को यह मकान अक्टूबर 2004 में मान्यता प्राप्त पत्रकार की हैसियत से आवंटित किया गया था। इन पर 18 हजार से भी ज्यादा का किराया बकाया है। विभाग नोटिस भेजने का दावा जरूर करता है लेकिन वसूली के नाम पर चुप्पी साध जाता है। अति विशिष्ट कालोनी में गिनी जाने वाली राजभवन कॉलोनी में शशांक शेखर त्रिपाठी जनवरी 2012 से अनाधिकृत तौर पर कब्जा जमाए हुए हैं। 12 ए-टाईप-4 संख्या का यह मकान उन्हें अक्टूबर 2007 में निर्धारित अवधि तीन वर्षों के लिए आवंटित किया गया था। प्राप्त जानकारी के मुताबिक इन पर 1 लाख 18 हजार से भी ज्यादा का किराया बकाया है।

इसी तरह से अलीगंज के सरकारी आवास (एम.जी. एम.आई.जी.) में दर्जनों की संख्या में अध्यासित कथित पत्रकारों के ऊपर किराए के रूप में लाखों रूपया बकाया है। इन्हें विभाग की ओर से कई बार नोटिसें भेजी जा चुकी हैं लेकिन न तो किराया वसूला जा सका और न ही अनाधिकृत रूप से अध्यासित पत्रकारों से आवास ही खाली करवाया जा सका। अलीगंज की सरकारी कालोनी के आवास संख्या एमजी-97 में राजधानी से प्रकाशित एक दैनिक समाचार-पत्र के पत्रकार एन. यादव का निवास है। यह मकान उन्हें जून 1989 में आवंटित किया गया था। हालांकि यह मकान उन्हें एक निर्धारित समय के लिए आवंटित किया गया था लेकिन पिछले ढाई दशक से अधिकारियों पर दबाव बनाकर ये अपना कब्जा नियमित करवाते चले आ रहे हैं। इन पर किराए के रूप में 7 हजार से भी ज्यादा का बकाया है।

एमआईजी-3 निवासी कुमार सौवीर पर किराए के रूप में 35 हजार से भी ज्यादा का बकाया है। उक्त मकान उन्हें पूर्व मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी के कार्यकाल जनवरी 1985 में आवंटित किया गया था। गौरतलब है कि इसी वर्ष पत्रकारों के हितार्थ सरकारी आवास आवंटन नियमावली बनायी गयी थी। कुमार सौवीर का लेखन से अब कोई खास रिश्ता नहीं रहा है इसके बावजूद वे सरकारी आवास का सुख भोग रहे हैं। दैनिक समाचार-पत्र से सम्बन्ध रखने वाले शोभित मिश्रा को राज्य सम्पत्ति विभाग ने अनाधिकृत घोषित कर रखा है, इसके बावजूद इनका कब्जा सरकारी आवास संख्या एम.आई.जी.-23, अलीगंज में बना हुआ है। शोभित मिश्रा फिलवक्त लखनऊ से बाहर कार्यरत हैं। इसी आधार पर विभाग ने अपने दस्तावेजों में इनका आध्यासन अवैध दिखा रखा है। यह मकान उन्हें मार्च 2009 में आवंटित किया गया था। इन पर किराए के रूप में 22 हजार से भी ज्यादा बकाया है।

इसी कॉलोनी के एमआईजी-27 में शिवशरण का अध्यासन है। ये मकान उन्हें नवम्बर 2006 में आवंटित किया गया था। इन पर 7 हजार से ज्यादा का किराया बकाया है। विभाग ने इनका अध्यासन भी अवैध घोषित कर रखा है। विभागीय अधिकारियों की मानें तो शिवशरण सिंह अब पत्रकारिता के क्षेत्र से सम्बन्ध नहीं रखते है इसी वजह से इनका आवास अनाधिकृत किया गया था। विभाग पिछले कई वर्षों से सरकारी आवास खाली करने का दबाव बना रहा है लेकिन उसे कामयाबी नहीं मिल पा रही है। वरिष्ठ पत्रकार देवकी नन्दन मिश्रा को अलीगंज की सरकारी कालोनी में एमआईजी-49 अक्टूबर 2007 में निर्धारित समय के लिए आवंटित किया गया था। समयावधि पूर्ण हो जाने के बाद इनके अध्यासन को विभाग ने अनाधिकृत घोषित कर रखा है। इन पर किराए के रूप में 7 हजार से भी ज्यादा का बकाया है।

भवन संख्या एमआईजी-59 अतुल कुमार के नाम से फरवरी 1998 मे आवंटित किया गया था। समयावधि पूर्ण हो जाने के पश्चात विभाग ने इनका अध्यासन अनाधिकृत घोषित कर रखा है लेकिन सरकारी आवास खाली करवाने के लिए कोई दबाव नहीं बनाया जा रहा है। खानापूर्ति के नाम पर विभाग की ओर से कई नोटिसें जरूर भेजी जा चुकी हैं। इन पर भी 7 हजार से ज्यादा का बकाया है। भवन संख्या एमआईजी-96 फरवरी 1991 में राजीव बाजपेयी को आवंटित किया गया था। श्री बाजपेयी अब अपना ज्यादा समय अपने निजी व्यवसाय को देते हैं। राज्य सम्पत्ति विभाग भी यह बात अच्छी तरह से जानता है कि श्री बाजपेयी का पत्रकारिता के क्षेत्र से कोई खास जुड़ाव नहीं रह गया है, फिर भी विभाग इनसे सरकारी आवास खाली करवाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा है। श्री बाजपेयी ने किराए के रूप में लगभग 24 हजार रूपया विभाग के खाते में जमा नहीं किया है। विभाग की ओर से इन्हें नोटिस भी जारी की जा चुकी है।

एक मकान छोड़कर 98 में राम सागर रहते हैं। यह मकान उन्हें बतौर मान्यता प्राप्त पत्रकार दिसम्बर 1988 को आवंटित किया गया था। इन पर 11 हजार से भी ज्यादा का किराया बकाया है। डीएम कम्पाउण्ड कालोनी में भवन संख्या 7 देवराज को अक्टूबर 1991 में आवंटित किया गया था। इन्होंने भी लगभग 7 हजार रूपए किराए के रूप में अभी तक जमा नहीं किया है जबकि विभाग की ओर से इन्हें भी नोटिस सर्व करायी जा चुकी है। कैसरबाग स्थित सरकारी कालोनी निवासी पवन मिश्रा पर किराए के रूप में 23 हजार से भी ज्यादा बकाया है। भवन संख्या 1/1 का आवंटन इन्हें जुलाई 1990 में किया गया था। इसी तरह से इसी कालोनी में अध्यासित अशोक कुमार पर 1 लाख 55 हजार से भी ज्यादा किराया बकाया है। अशोक कुमार को यह मकान (1/16) अप्रैल 1998 में आवंटित किया गया था।

इसी कालोनी में भवन संख्या 2/7 अमान अब्बास के नाम से आवंटित है। यह मकान उन्हें अगस्त 2006 में आवंटित किया गया था। इन पर भी किराए के रूप में 1 लाख 52 हजार से ज्यादा का बकाया राज्य सम्पत्ति निदेशालय के रिकार्ड में दर्शाया गया है। उपरोक्त नाम तो उन बडे़ बकायेदारों के हैं जिन्हें विभाग ने अनेकों बार किराया वसूली और अनाधिकृत रूप से अध्यासित भवनों को खाली करने की नोटिस जारी कर रखी है, जबकि इससे कहीं ज्यादा संख्या में ऐसे पत्रकारों की लम्बी फेहरिस्त है जो नियमानुसार मकान का किराया जमा नहीं कर रहे हैं। इसके बावजूद राज्य सम्पत्ति विभाग की चुप्पी रहस्यमयी बनी हुई है। विभाग के ही एक अधिकारी ने नाम प्रकाशित न करने की शर्त पर बताया कि ज्यादातर कथित दागी पत्रकार या तो पत्रकारिता का पेशा छोड़कर दूसरे व्यवसायों में लग गए हैं या फिर उनका लखनऊ से तबादला हो चुका है। इसके बावजूद वे सरकारी मकानों से कब्जा नहीं छोड़ रहे हैं।

इन अधिकारी का कहना है कि ऐसे पत्रकारों को बकायदा विभाग की ओर से दर्जनों बार नोटिसें भी भेजी जा चुकी हैं लेकिन किसी के खिलाफ सख्त कदम नहीं उठाया जा सका है। इन अधिकारी की मानें तो राज्य सरकारें भी पत्रकारों से बैर लेने को इच्छुक नहीं हैं। यही वजह है कि जब कभी विभाग दबाव बनाता है तो उच्च स्तर से फोन घनघनाने लगते हैं। विभाग के ही एक कर्मचारी का तो यहां तक कहना है कि कुछ पत्रकार सरकारी आवासों को गेस्ट हाउस के तौर पर इस्तेमाल करते आ रहे हैं, जबकि उनका निजी आवास राजधानी लखनऊ में पहले से ही बना हुआ है। कुछ आवासों में तो गैरकानूनी कार्यों की सूचना भी मिला करती है, लेकिन अधिकारियों से नजदीकी का सम्बन्ध रखने वाले पत्रकारों के खिलाफ विभाग कार्रवाई करने की हिम्मत नहीं जुटा पाता।

इस कर्मचारी का दावा है कि यदि औचक छापेमारी की जाए तो निश्चित तौर पर ऐसे मामले सामने आयेंगे जो सरकार ही नहीं बल्कि प्रदेश की खुफिया एजेंसियों के लिए भी चौंकाने वाले होंगे। कर्मचारी के मुताबिक पत्रकारों को आवंटित सरकारी आवासों में अपराधी से लेकर दलालों तक ने अपना ठिकाना बना रखा है। यदि यह कहा जाए कि पत्रकारिता की आड़ में कुछ पत्रकार सरकारी आवासों का नाजायज इस्तेमाल कर रहे हैं तो कुछ गलत नहीं होगा। हालांकि इस सम्बन्ध में राज्य सम्पत्ति विभाग ने एक जांच रिपोर्ट उच्चाधिकारियों के पास पहले से भेज रखी है लेकिन दूर-दरू तक किसी के खिलाफ सख्त कार्रवाई के आसार नजर नहीं आते। न तो लाखों के बकायेदरों पर शिकंजा कसा जा रहा है और न ही अनाधिकृत रूप से कब्जेदारों के खिलाफ ही कार्रवाई की जा रही है। अधिकारियों का तो यहां तक कहना है कि यदि ऐसा ही चलता रहा तो एक समय ऐसा आयेगा कि फर्जी पत्रकारों का सरकारी आवासों पर पूरी तरह से कब्जा हो जायेगा और वास्तविक हकदारों को सुविधा नहीं मिल पायेगी। 

राज्य सम्पत्ति निदेशालय की देख-रेख वाली सरकारी कॉलोनियों में तथाकथित पत्रकारों का मकड़जाल इतना सशक्त है कि सम्बन्धित विभाग चाहते हुए भी ऐसे पत्रकारों के खिलाफ कार्रवाई नहीं कर पा रहा है। ऐसे पत्रकारों की संख्या अनगिनत है जिन्होंने न तो वर्षों से किराया जमा किया है और न ही वे मकान खाली करने को तैयार है। सरकारी मकान आवंटन के समय जिस ‘पत्रकार आवास आवंटन नियमावली-1985’ के तहत पत्रकारों से हस्ताक्षर करवा कर सरकारी मकानों की चाबी उन्हें सौंपी जाती है उस नियमावली का पालन कुछ अपवाद स्वरूप पत्रकारों को छोड़कर कोई नहीं करता। शासनादेश में राज्य सम्पत्ति अधिकारी को ऐसे पत्रकारों से मकान खाली करवाने के लिए अधिकार दिए गए हैं, लेकिन अधिकारी पत्रकारों से बैर नहीं लेना चाहते। अधिकारी ऐसे पत्रकारों को बेईमान बताकर अपनी भड़ास निकाल लेते हैं तो दूसरी ओर बकाएदार पत्रकार ‘चोरी और ऊपर से सीनाजोरी’ की तर्ज पर पूरे राज्य सम्पत्ति विभाग को ही भ्रष्ट बताकर पल्ला झाड़ रहे हैं।

जनवरी माह में इलाहाबाद उच्च न्यायालय की खण्डपीठ ने पत्रकारों को सरकारी आवास उपलब्ध कराए जाने के मामले में राज्य सरकार से जवाब-तलब किया था। अधिवक्ता हरिशंकर जैन की ओर से दायर जनहित याचिका पर न्यायमूर्ति इम्तियाज मुर्तजा और न्यायमूर्ति देवेन्द्र कुमार उपाध्याय की खण्डपीठ ने राज्य सरकार से पूछा था, ‘बताएं किस नियम के तहत पत्रकारों को सरकारी भवन अथवा आवास आवंटित किए जाते हैं’। पीठ ने राज्य सम्पत्ति विभाग सहित अन्य पक्षकारों से भी जवाब-तलब किया था। उत्तर-प्रदेश सरकारी कर्मचारी नियमावली 1980 में कहीं भी पत्रकारों को सरकारी आवास मुहैया कराए जाने का प्राविधान अंकित नहीं है। इस याचिका के खिलाफ सरकार की ओर से पक्ष रखते हुए कहा गया था कि पत्रकारों के हितार्थ पूर्व मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी के कार्यकाल में 1985 में पत्रकार आवास आवंटन नियमावली बनायी गयी थी। उसी के आधार पर पत्रकारों को सरकारी आवासों की सुविधा प्रदान की जाती है। राज्य सरकार ने याचिका के खिलाफ राहत तो पा ली लेकिन नियमावली का उल्लंघन करने वाले पत्रकारों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की।

यह आर्टकिल लखनऊ से प्रकाशित दृष्टांत मैग्जीन से साभार लेकर भड़ास पर प्रकाशित किया गया है. इसके लेखक तेजतर्रार पत्रकार अनूप गुप्ता हैं जो मीडिया और इससे जुड़े मसलों पर बेबाक लेखन करते रहते हैं. वे लखनऊ में रहकर पिछले काफी समय से पत्रकारिता के भीतर मौजूद भ्रष्‍टाचार की पोल खोलते आ रहे हैं.

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Comments on “अरबपति संपादक संजय गुप्‍ता के पास नहीं हैं किराए के 77 हजार रुपए!

  • मीडिया कभी भी पूरा सच नही दिखाती अगर दिखाती तो चंद साल पहले हजारों की नौकरी करे वाले पत्रकार मीडिया हाउस नहीं चला पाते

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